उमर अब्दुल्लाह पर मोदी सरकार को लेकर लोग शक क्यों कर रहे?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"अरे भाई! किस तरह की डील? मैं ज़्यादा से ज़्यादा ख़ुद को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने की ही डील कर सकता हूँ. जब मैं आपकी असेंबली को ही नहीं मानता, चुनाव लड़ने के लिए ही तैयार नहीं हूँ, जिससे कि आप मुझे केंद्र शासित प्रदेश का मुख्यंमत्री बनाओगे, तो फिर मैंने क्या डील की आप लोगों के साथ.''

''मुझे उस केंद्र शासित प्रदेश की असेंबली में जाना ही नहीं है. मैं बस इतना ही कह सकता हूँ. मैं बस इतना ही कर सकता हूँ. मैं जनता को इतना कह सकता हूँ कि मैं इस केंद्र शासित प्रदेश में किसी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनूँगा. आप हमारा स्टेटहुड वापस करें. पाँच अगस्त को आपने हमारा जो कुछ छीना है, हमें नीचा दिखाने के लिए, उसे वापस करें, उसके बाद ही यहाँ से आगे बढ़ने की बात हो सकती है."

अपनी रिहाई के बाद इंडियन एक्सप्रेस अख़बार को दिए पहले इंटरव्यू में नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्लाह ने ये बातें कहीं. इससे पहले उन्होंने इसी अख़बार में सोमवार को एक लंबा लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने जब तक जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस नहीं मिल जाता, तब तक विधानसभा चुनाव ना लड़ने की बात कही थी. 

इस साक्षात्कार के बाद से ही सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चा शुरू हो गई थी कि उमर अब्दुल्लाह अनुच्छेद 370 पर ख़ामोश हैं और अब बस केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा वापस लिए जाने की माँग पर अड़े हैं. 

क्या कहा उमर अब्दुल्लाह ने?

इंडियन एक्सप्रेस के अपने ताज़ा इंटरव्यू में उन्होंने ये भी कहा है कि अब 370 हटाने और दो नए केंद्र शासित बनाने के सरकार के फ़ैसले के विरोध में सड़क पर प्रदर्शन नहीं करेंगे. वो इसके लिए आगे राजनीतिक और क़ानूनी लड़ाई लड़ेंगे. उमर के मुताबिक़ अब सड़क पर प्रदर्शन करने का वक़्त निकल चुका है.

इस इंटरव्यू में उन्होंने पहली बार विस्तार से बताया कि उन्हें कब और कैसे पाँच अगस्त को सूचित किया गया कि कश्मीर में क्या कुछ बदल गया है.

पाँच अगस्त 2019 को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने न केवल जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A को हटा दिया था, बल्कि जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा ख़त्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था. 

केंद्र सरकार के इस फ़ैसले के कुछ ही घंटे पहले उमर अब्दुल्लाह, उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह, राज्य की एक और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती समेत सैकड़ों नेताओं को नज़रबंद या गिरफ़्तार कर लिया गया था. 

उन्होंने बताया कि किस तरह बिना किसी आरोप के उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन फ़रवरी 2020 में उमर अब्दुल्लाह, महबूबा मुफ़्ती समेत कुछ और नेताओं पर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट लगा दिया गया था.

सात महीनों के बाद 24 मार्च को उमर अब्दुल्लाह को रिहा कर दिया गया था. उसके एक हफ़्ते पहले उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को भी रिहा कर दिया गया था.

हालाँकि महबूबा मुफ़्ती अब तक हिरासत में हैं और मई में उन पर दोबारा पीएसए लगाया गया था.

मार्च में रिहा होने के बाद उमर अब्दुल्लाह ट्विटर पर तो सक्रिय रहे हैं लेकिन पहली बार उन्होंने किसी अख़बार में इतना लंबा लेख लिखा है और इंटरव्यू भी दिया है. 

उमर अब्दुल्लाह से जब पूछा गया कि रिहाई के बाद भी वो सड़कों पर क्यों नहीं उतरे, कोई रैली नहीं की और उनके पार्टी ने केंद्र के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोई अभियान नहीं छेड़ा, तो उन्होंने इसके पीछे तीन तर्क गिनाएँ.

उनके मुताबिक़ जिस दिन वो रिहा हुए, उसी रात से कोरोना लॉकडाउन पूरे देश भर में लागू हो गया था. दूसरा उनके साथी जो अब तक किसी ना किसी तरह की हिरासत में हैं, वो उनके लिए किसी मुसीबत का सबब नहीं बनना चाहते हैं. तीसरा वो बाक़ियों की रिहाई के लिए क़ानूनी और राजनैतिक लड़ाई लड़ना चाहते हैं. 

उमर अब्दुल्लाह ने ये भी स्पष्ट किया कि वो ये साक्षात्कार पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर नहीं बल्कि अपने निजी हैसियत से दे रहे हैं. उनकी पार्टी चुनाव में हिस्सा लेगी और वो पार्टी के लिए वोट करने की भी बात कह रहे हैं. 

कश्मीर से बाहर 370 पर चुप्पी

उनके इस साक्षात्कार की चर्चा ना सिर्फ़ कश्मीर में बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी हो रही है.

उनसे पूछा गया कि अनुच्छेद 370 को हटाने को लेकर बाक़ी पार्टियों के रुख़ को वे कैसे देखते हैं? उनको उनसे क्या उम्मीदें थी? 

इस सवाल के जवाब में उमर अब्दुल्लाह ने कहा कि वो काफ़ी मायूस हुए, जिस तरह बाक़ी पार्टियों ने केंद्र के फ़ैसले पर विरोध किया, उन्होंने आम आदमी पार्टी और टीआरएस का नाम लेकर ज़िक्र किया. लेकिन कांग्रेस और बाक़ी विपक्षी दलों का नाम लिए बिना कहा कि अगर आपको एयरपोर्ट पर कश्मीर जाने से रोक दिया जाता है, तो क्या आपकी ड्यूटी ख़त्म हो जाती है. 

ग़ौरतलब है कि कुछ राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि दल ने पाँच अगस्त के बाद वहाँ जाने की कोशिश की थी, जिनको एयरपोर्ट से ही लौटा दिया गया था. राधा कुमार यूपीए सरकार के समय कश्मीर पर बनी कमिटी की सदस्य थीं. वे 'पैराडाइज ऐट वॉट- ए पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ़ कश्मीर' (2018) की लेखिका हैं.

राधा कुमार ने सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोर्ट में कई दूसरे लोगों के साथ याचिका भी दायर की है, उन्हें उमर अब्दुल्लाह के इस इंटरव्यू से काफ़ी अफ़सोस है.

उनके मुताबिक़ उमर का ये कहना कि कश्मीर के बाहर लोगों ने इसका विरोध नहीं किया, ये बिल्कुल ग़लत है. बीबीसी से बातचीत में राधा कुमार ने कहा कि हम कोर्ट में गए आज भी क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे है. सिविल सोसाइटी ने अपनी तरफ़ से कोशिश की है. अख़बारों में काफ़ी लिखा भी गया है. 

अनुच्छेद 370 पर चुप्पी ?

राधा कुमार कहती हैं, "मैंने भी सोशल मीडिया पर पढ़ा है कि उमर के इस इंटरव्यू से लोग ख़फ़ा हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने 370 की बात नहीं की."

ट्विटर पर लोग लिख रहे हैं कि उमर अब्दुल्लाह की डील हो गई है इसलिए अनुच्छेद 370 पर चुप हैं और इसलिए आज रिहा हैं, महबूबा चुप नहीं रहती इसलिए जेल में बंद हैं.

इसके पहले उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने भी पीटीआई को दिए अपने इंटरव्यू में राज्य का दर्जा वापस मिलने की माँग दोहराई थी और अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलने की बात कही थी.

राधा कुमार कहती हैं, "उमर अब्दुल्लाह ने ये भी कहा है कि कोर्ट में भी उनका केस है और वो क़ानूनी लड़ाई लड़ेंगे. कोर्ट में नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसदों ने अनुच्छेद 370 हटाए जाने को ही चैलेंज किया है. तो एक लिहाज से उन्होंने 370 पर चुप्पी नहीं साधी है." 

लेकिन ये राधा कुमार को भी समझ नहीं आ रहा कि उमर अब्दुल्ला ने 370 पर साफ़-साफ़ क्यों नहीं बात की. वो कहती हैं कि अनुच्छेद 370 पर केवल कोर्ट में ही लड़ाई लड़ने की बात क्यों कर रहे हैं उमर अब्दुल्लाह. ये तो हम सबका संवैधानिक अधिकार है. कुछ ग़लत हुआ है तो वो बात हमें बार-बार दोहरानी पड़ेगी और हर मंच से हर जगह से दोहरानी पड़ेगी, जब तक इस फ़ैसले को दुरुस्त नहीं किया जाता. 

कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने पूरे इंटरव्यू को काफ़ी तफ़सील से पढ़ा है. उनके मुताबिक़ जो शख़्स छह महीने जेल के अंदर रहा, जिसके साथ एक तरह का विश्वासघात हुआ (जैसा कि उन्होंने ख़ुद कहा) हुआ, उसके अंदर एक तब्दीली आ ही जाती है. 

वो मानती हैं कि कश्मीर में उनके इंटरव्यू को लेकर एक अटलबाज़ी चल रही है कि कहीं कोई डील हुई है क्या? आख़िर वो क्यों राजनितिक लड़ाई की बात कर रहे हैं और पॉलिटिक्स में नेशनल कांफ्रेंस ख़ुद को और ज़्यादा झोंकने की बात कर रही है, इसके पीछे की वजह क्या है?

अनुराधा मानती हैं कि सीधे तौर पर कोई इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठाना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन वो साथ ही ये भी कहती हैं- दोनों ही बातें सही हो सकती हैं. कश्मीर के सूरत-ए-हाल को देखते हुए उनके अंदर एक तल्ख़ी आई हो, एक चिंता हो, एक उत्सुकता हो ऐसा भी हो सकता है. दूसरी गुंजाइश है कि एक डील हुई हो, जिसकी संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता है. 

सड़क पर नहीं उतरेंगे उमर

उमर अब्दुल्लाह के मुताबिक़ अब समय नहीं रहा कि केंद्र के फ़ैसले के विरोध में सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किए जाएँ. 

इस पर राधा कुमार उमर अब्दुल्लाह से सहमत नहीं दिखती. राधा कुमार कहती है लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की एक अपनी जगह है. अगर हमें लगता है कि कुछ ग़लत हुआ है तो ये हमारा केवल अधिकार नहीं बल्कि कर्तव्य भी है कि हम इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी करें.

राधा कुमार कहतीं है कि इसलिए मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ. मुझे नहीं मालूम उन्होंने ऐसा क्यों कहा है? 

लेकिन राधा कुमार उमर अब्दुल्लाह के इस बयान को दूसरे नज़रिए से देखती हैं.

उनके मुताबिक़, "नेशनल कॉन्फ्रेंस कोई स्ट्रीट प्रोटेस्ट वाली पार्टी तो थी नहीं. कभी भी सड़कों पर उतरना, पत्थरबाज़ी में ये लोग शामिल भी नहीं रहे. इनका हमेशा से मक़सद सत्ता हासिल करने का रहा था और एक ख़ास राजनीतिक विचारधारा पर बात रखना. वो अक्सर कश्मीर की स्वायत्ता और उसे बहाल करने की लड़ाई ही लड़ते रहे. और अब भी उमर अपने इंटरव्यू में वही बात कह रहे हैं." 

वो आगे कहती हैं, "उमर के इस फ़ैसले से एक सवाल उठता है कि क्या ये आसान रास्ता है इसलिए उन्होंने इसे चुना है? मैं ख़ुद भी यही सोच रही हूँ. इस वक़्त कश्मीर में एक लाल रेखा खींची हुई है. आज केंद्र सरकार या राज्यपाल या फिर प्रशासन किसी भी तरह के विरोध को बर्दाश्त नहीं करना चाहता. तो क्या उमर के लिए भी ये फ़ैसला सहूलियत भरा है कि इस वक़्त वो अनुच्छेद 370 पर बात नहीं करते. या ये भी हो सकता है कि वो ये मानते हैं कि इस ये वक़्त सही नहीं है." 

फ़िलहाल नेशनल कॉन्फ्रेस अपने कुछ नेताओं की रिहाई के लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ रही है. वहीं उमर अब्दुल्लाह का कहना है कि कुछ नेताओं को बिना काग़ज़ी कार्रवाई के नज़रबंद किया हुआ है. उन्हें कहीं आने जाने की छूट नहीं हैं. इसलिए वो राजनीतिक और क़ानूनी दो तरह से अपनी लड़ाई लड़ने की बात साक्षात्कार में कह रहे हैं.

राधा का मानना है कि इस वक़्त उमर को थोड़ा 'बेनिफ़िट ऑफ डाउट' देना की ज़रूरत है. इस वक़्त नहीं मालूम कि साक्षात्कार के पहले उनके ज़ेहन में क्या था, हम सिर्फ़ वो पढ़ पा रहे हैं जो लिखा हुआ है. 

कश्मीर में आगे की राजनीति

अपनी रिहाई के बाद से अब तक की चुप्पी पर उन्होंने काफ़ी कुछ इस इंटरव्यू में बोला है. कोरोना के समय बाहर निकलना, राजनीतिक गतिविधियाँ और मिलना जुलना कितना मुश्किल और जोख़िम से भरा हो सकता है.

उन्होंने इस बात का भी ज़िक्र किया कि उनकी पिता की सेहत की वजह से भी वो बाहर निकलने से परहेज़ कर रहे हैं. इस वजह से कश्मीर में राजनीति लगभग थम सी गई है.

पिछले एक साल से कश्मीर में राजनीति करने वाले ज़्यादातर नेता या तो घर पर नज़रबंद है या फिर उन पर पीएसए लगा हुआ है.

जो लोग बाहर हैं, उन्हें किसी भी तरह के प्रदर्शन की इजाज़त नहीं हैं. ऐसे में राजनीति की गुंजाइश ना के बराबर है. नेशनल कॉन्फ्रेंस की मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी पीडीपी है.

पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती फ़िलहाल पीएसए में बंद है. इसलिए बीबीसी ने उनकी बेटी इल्तज़ा मुफ्ती से उमर के इंटरव्यू पर उनकी राय जाननी चाही पर उन्होंने इस पर टिप्पणी से इनकार कर दिया.

राधा इसे एक साल की ख़ामोशी का नाम देती हैं. उनका कहना है कि पिछले एक साल में केवल राजनीतिक पार्टियों ने ही नहीं भुगता है, बल्कि आम जनता के लिए बुरा दौर रहा है.

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