गोरखपुर के डॉक्टर कफ़ील ख़ान की जेल से रिहाई क्यों नहीं हो पा रही है?

कफ़ील ख़ान

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए

तीन साल पहले गोरखपुर में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत के मामले से चर्चा में आए डॉक्टर कफ़ील ख़ान कथित तौर पर भड़काऊ भाषण देने के मामले में पिछले छह महीने से जेल में बंद हैं. उन्हें सीजेएम कोर्ट से ज़मानत भी मिल गई थी लेकिन रिहाई से पहले ही उनके ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून तामील कर दी गई.

डॉक्टर कफ़ील के भाई अदील अहमद बताते हैं कि उनकी गिरफ़्तारी और एनएसए की कार्रवाई के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाख़िल की गई है लेकिन अब तक उन्हें ज़मानत नहीं मिल सकी है.

अदील अहमद बताते हैं कि हाईकोर्ट में ज़मानत पर सुनवाई अब तक 11 बार टल चुकी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में डॉक्टर कफ़ील की ज़मानत पर सुनवाई अब 27 जुलाई को होगी.

पिछले साल दिसंबर महीने में नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के ख़िलाफ़ डॉक्टर कफ़ील ख़ान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कथित तौर पर भड़काऊ भाषण दिया था. इस मामले में कफ़ील के ख़िलाफ़ अलीगढ़ के सिविल लाइंस थाने में केस दर्ज किया गया था. 29 जनवरी को यूपी एसटीएफ़ ने उन्हें मुंबई से गिरफ़्तार किया था.

मथुरा जेल में बंद डॉक्टर कफ़ील को 10 फ़रवरी को ज़मानत मिल गई लेकिन तीन दिन तक जेल से उनकी रिहाई नहीं हो सकी और इस दौरान अलीगढ़ ज़िला प्रशासन ने उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा दिया.

यूपी एसटीएफ़ डॉक्टर कफ़ील को अब तक दो बार गिरफ़्तार कर चुकी है. यूपी एसटीएफ़ के आईजी अमिताभ यश ने बीबीसी को बताया, "कफ़ील के ख़िलाफ़ अलीगढ़ में मामला दर्ज था और वो वांछित अपराधी थे. उन्हें हमने मुंबई से गिरफ़्तार करके अलीगढ़ पुलिस को सौंप दिया था. इससे पहले उन्हें गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज मामले में भी एसटीएफ़ गिरफ़्तार कर चुकी है."

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि कोर्ट से ज़मानत मिलने के बावजूद कफ़ील ख़ान की रिहाई में तीन दिन का वक़्त कैसे लग गया और ज़मानत के बाद भी उन पर रासुका कैसे लगा दिया गया.

कफ़ील के परिजन सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर आरोप लगाते हैं कि राज्य सरकार के इशारे पर यह कार्रवाई हुई है जबकि कोर्ट का आदेश है कि ज़मानत मिलने के बाद रासुका नहीं लगाई जा सकती है.

वीडियो कैप्शन, डॉक्टर कफ़ील ख़ान अब तक जेल से बाहर क्यों नहीं आ पाए

रासुका की अवधि तीन महीने और बढ़ाई गई

कफ़ील के भाई अदील ख़ान कहते हैं, "दस फ़रवरी को शाम चार बजे कोर्ट ने कफ़ील ख़ान को तत्काल रिहा करने के निर्देश दिए थे लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद भी रिहा नहीं किया गया. ज़मानत के बाद रासुका तामील नहीं की जा सकती, ये सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला है."

"डॉक्टर कफ़ील के ख़िलाफ़ जो भी मामले हैं, सभी में उनको ज़मानत मिल चुकी है. फिर भी रासुका कैसे लगा दिया गया, समझ से परे है."

अलीगढ़ ज़िला प्रशासन इस मामले में सिर्फ़ यही कहता है कि उनके ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण देने का मामला दर्ज किया गया है और अब हाईकोर्ट ही इस बारे में सही ग़लत का फ़ैसला करेगा.

लेकिन इस मामले में सरकारी वकील मनीष गोयल बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "एनएसए बढ़ाने की संस्तुति एडवाइज़री बोर्ड करती है, अकेले सरकार का फ़ैसला नहीं होता है. एडवाइज़री बोर्ड में वरिष्ठ लोग होते हैं, क़ानूनी विशेषज्ञ होते हैं. एनएसए सिर्फ़ तीन महीने के लिए होता है. उसके बाद उसे तीन-तीन महीने के लिए बढ़ाया जाता है. हर बार बढ़ाने का फ़ैसला एडवाइज़री बोर्ड की स्वीकृति से ही होता है. कफ़ील ख़ान के मामले में एनएसए एक बार बढ़ाया जा चुका है. इसका मतलब आरोप में गंभीरता होगी तभी ऐसा हुआ है."

गृह मंत्रालय का उत्तर

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इमेज कैप्शन, एक अप्रैल को ही एडवाइज़री बोर्ड ने रासुका की अवधि तीन महीने और बढ़ाने की संस्तुति कर दी

डॉक्टर कफ़ील ख़ान की रासुका में गिरफ़्तारी की अवधि 13 अप्रैल को ख़त्म होने वाली थी लेकिन एक अप्रैल को ही एडवाइज़री बोर्ड ने रासुका की अवधि तीन महीने और बढ़ाने की संस्तुति कर दी. डॉक्टर कफ़ील के परिजनों ने उनकी गिरफ़्तारी और एनएसए की कार्रवाई के ख़िलाफ़ बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस केस को इलाहाबाद हाईकोर्ट में भेज दिया.

अदील ख़ान बताते हैं, "हमने 22 फ़रवरी को सुप्रीम कोर्ट में रिट डाली थी लेकिन वहां से इसे 18 मार्च को यह कहकर हाईकोर्ट भेज दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट की व्यस्तता ज़्यादा है और इसकी सुनवाई हाईकोर्ट में भी हो सकती है. लेकिन यहां किसी न किसी वजह से सरकारी वकील तारीख़ पर तारीख़ ले रहे हैं और डॉक्टर कफ़ील की रिहाई पर सुनवाई ही नहीं हो पा रही है. 14 मई से अब तक कुल 11 तारीख़ें पड़ चुकी हैं."

जेल से कफ़ील ख़ान का ख़त

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम यानी एनएसए सरकार को किसी भी व्यक्ति को हिरासत में रखने की शक्ति देता है. इस क़ानून के तहत किसी भी व्यक्ति को एक साल तक जेल में रखा जा सकता है. हालांकि तीन महीने से ज़्यादा समय तक जेल में रखने के लिए सलाहकार बोर्ड की मंज़ूरी लेनी पड़ती है.

रासुका उस स्थिति में लगाई जाती है जब किसी व्यक्ति से राष्ट्र की सुरक्षा को ख़तरा हो या फिर क़ानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो.

कफ़ील ख़ान की रिहाई के लिए प्रदर्शन

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जेल में बंद रहने के दौरान डॉक्टर कफ़ील ने एक पत्र भी लिखा था जिसमें उन्होंने जेल के भीतर कथित तौर पर अमानवीय स्थितियों का ज़िक्र किया था. डॉक्टर कफ़ील का यह पत्र सोशल मीडिया में भी वायरल हुआ था.

पत्र में डॉक्टर कफ़ील ने लिखा था कि 150 क़ैदियों के बीच में सिर्फ़ एक शौचालय है जहां सामान्य स्थितियों में कोई अंदर भी नहीं जा सकता है. उन्होंने जेल में खान-पान जैसी व्यवस्था और सोशल डिस्टेंसिंग की कथित तौर पर उड़ रही धज्जियों का भी ज़िक्र किया था.

अदील ख़ान कहते हैं, "समझ में नहीं आता कि लॉकडाउन के दौरान और कोरोना के इस दौर में कफ़ील किस तरह से शांति और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ सकते हैं? उन्हें सिर्फ़ राजनीतिक कारणों के चलते निशाने पर लिया गया है. कफ़ील को कार्डियक संबंधी दिक़्क़तें हैं लेकिन कई बार निवेदन के बावजूद उन्हें सही इलाज नहीं दिया जा रहा है."

रिहाई के लिए प्रदर्शन

डॉक्टर कफ़ील की रिहाई के लिए पिछले दिनों सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाया गया था और महज़ कुछ घंटों में एक लाख से ज़्यादा ट्वीट किए गए थे. बुधवार को लखनऊ में कुछ वकीलों ने भी उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन किया था.

वहीं कांग्रेस पार्टी के अल्पसंख्यक सेल ने कफ़ील की रिहाई के लिए प्रदेशव्यापी अभियान चलाने का फ़ैसला किया है जिसके तहत 15 दिनों तक घर-घर जाकर रिहाई के लिये हस्ताक्षर अभियान, सोशल मीडिया अभियान, मज़ारों पर चादरपोशी, रक्तदान और कुछ अन्य कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे.

कफ़ील ख़ान के जेल की शेड्यूल

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इमेज कैप्शन, कफ़ील ख़ान का पत्र

डॉक्टर कफ़ील का नाम उस वक़्त चर्चा में आया था जब साल 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से 60 बच्चों की मौत हो गई थी.

उत्तर प्रदेश सरकार ने लापरवाही बरतने, भ्रष्टाचार में शामिल होने सहित कई आरोप लगाकर डॉ. कफ़ील को निलंबित कर जेल भेज दिया था. हालाँकि कई मामलों में बाद में उन्हें सरकार से क्लीन चिट मिल गई थी लेकिन उनका निलंबन रद्द नहीं हुआ था.

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