विकास दुबे: कुछ ज़रूरी सवाल, जिनके जवाब अब तक नहीं मिले

विकास दुबे

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए

कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की मौत के मामले में ज़िम्मेदार माने जा रहे मुख्य अभियुक्त विकास दुबे को पांच दिन बाद भी पुलिस ढूंढ़ नहीं पाई है.

इस बीच, इस मामले में चर्चा का मुख्य बिंदु यह हो चला है कि इस मुठभेड़ में ख़ुद पुलिसवालों की संलिप्तता कितनी थी. अब तक चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जा चुका है और रडार पर सिर्फ़ चौबेपुर थाने के पुलिसकर्मी ही नहीं बल्कि बड़े अफ़सर भी आ गए हैं.

लेकिन इन सबके बीच, अभी भी कई ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर मिल नहीं सके हैं. न सिर्फ़ इस मुठभेड़ के वक़्त के, बल्कि उसके बाद के भी और उससे पहले के भी जिनकी वजह से मामला यहां तक पहुंचा और विकास दुबे कथित तौर पर इतना दुस्साहसी हो गया कि ऐसी घटना को अंजाम दे दिया.

मध्य रात्रि में विकास दुबे को गिरफ़्तार करने का आदेश किसने दिया था?

लेकिन इन सबके बीच, अभी भी कई ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर मिल नहीं सके हैं. न सिर्फ़ इस मुठभेड़ के वक़्त के, बल्कि उसके बाद के भी और उससे पहले के भी जिनकी वजह से मामला यहां तक पहुंचा और विकास दुबे कथित तौर पर इतना दुस्साहसी हो गया कि ऐसी घटना को अंजाम दे दिया.

आधी रात में विकास दुबे को गिरफ़्तार करने का आदेश किसने दिया था?

विकास दुबे का घर

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विकास दुबे पर यूं तो चौबेपुर थाने में साठ मामले दर्ज थे लेकिन हत्या के प्रयास के एक मामले में पुलिसबल उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए तीन जुलाई को देर रात उनके गांव बिकरू पहुंचता है.

इस मामले में अब तक जो बातें सामने आ रही हैं उनसे पता चलता है कि बिल्हौर के क्षेत्राधिकारी देवेंद्र मिश्र और चौबेपुर के थाना प्रभारी विनय तिवारी के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं था. ऐसी स्थिति में किस अधिकारी की मांग पर, किस अधिकारी ने आनन-फ़ानन में दबिश डालने की अनुमति दी, इस सवाल का जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है.

दबिश डालने के लिए क्या ज़रूरी तैयारी की गई थी?

अब तक मिली जानकारी के मुताबिक़, विकास दुबे के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ चौबेपुर थाने में मुक़दमे दर्ज थे बल्कि कई अन्य थानों में भी मामले दर्ज थे और इनकी संख्या सौ के ऊपर थी.

ऐसे अभियुक्त के बारे में न सिर्फ़ स्थानीय पुलिस बल्कि कानपुर ज़ोन तक की पुलिस को जानकारी न हो, ऐसा हो नहीं सकता.

तो ऐसे अभियुक्त को पकड़ने के लिए जिस टीम को भेजा गया था, उसे देखकर लगता नहीं कि इसके लिए पहले से कोई ख़ास तैयारी की गई थी. या फिर पुलिस वाले अति आत्मविश्वास में रहे हों.

सीओ बिल्हौर समेत तमाम पुलिसकर्मी बिना प्रोटेक्टर और बिना हेलमेट के वहां गए थे क्योंकि ज़्यादातर लोगों के सिर में और सीने में गोलियां लगी हैं.

जानकारों के मुताबिक़, ऐसी किसी भी दबिश में बिना पूरी तैयारी के कोई टीम नहीं जाती है और यह तो एक 'कुख्यात' अभियुक्त को पकड़ने का अभियान था.

दूसरे, छह गाड़ियों में दबिश डालने गए क़रीब 24 पुलिसकर्मियों में तालमेल का भी अभाव था क्योंकि ऑपरेशन के दौरान ग्रुपों में बिखरने की बजाय कुछ पुलिसकर्मी जेसीबी से रोके गए रास्ते को पार करके विकास दुबे के घर की ओर चले गए थे जबकि बाक़ी बचे पुलिसकर्मी जेसीबी के दूसरी ओर ही रह गए.

यही वजह है कि स्थिति बिगड़ते देख कुछ पुलिसकर्मी वहां से भाग खड़े हुए.

वीडियो कैप्शन, यूपी में अपराधी विकास दुबे को पकड़ने गए डीएसपी समेत आठ की मौत
मारे गए डीएसपी देवेंद्र मिश्र

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पुलिस टीम में क्या एक-दूसरे पर भरोसे की कमी थी?

सीओ देवेंद्र मिश्र के नेतृत्व में गई पुलिस टीम में एसओ विनय तिवारी भी शामिल थे.

इन दोनों की कुछ महीने पहले एसएसपी के साथ बातचीत के जो ऑडियो वायरल हो रहे हैं उनके मद्देनज़र यह विश्वास कर पाना बेहद मुश्किल है कि किसी बड़े ऑपरेशन में इन दोनों अफ़सरों के बीच समुचित तालमेल रहता.

यही नहीं, सीओ देवेंद्र मिश्र का तत्कालीन एसएसपी को लिखा गया वह कथित पत्र भी इस बात पर संदेह पैदा करता है कि ये दोनों अफ़सर एक-दूसरे पर इस क़दर भरोसा कर पाते कि किसी बड़े अभियान को अंजाम देते. इसका सही-सही जवाब देना तो मुश्किल है.

लेकिन सीओ देवेंद्र मिश्र अभियान में मारे गए और सीओ विनय तिवारी का बाल भी बांका न हुआ. शक] के आधार पर विनय तिवारी को निलंबित कर दिया गया है और अब एसटीएफ़ भी उनसे पूछताछ कर रही है.

वीडियो कैप्शन, विकास दुबे: कानपुर मुठभेड़ में ज़िंदा बचने वाले पुलिसकर्मी से सुनिए आपबीती

जानकारी के बाद तुरंत ही सीमाएं क्यों नहीं सील की गईं?

घटना के पांच दिन बाद विकास दुबे पर इनामी राशि बढ़ाकर ढाई लाख रुपये कर दी गई है और उनकी तलाश में अब नेपाल से लगी क़रीब 120 किलोमीटर की सीमा भी सील कर दी गई है. लेकिन घटना के तत्काल बाद कानपुर ज़िले की भी सीमा सील नहीं की गई.

यदि ऐसा हुआ होता तो शायद इतनी जल्दी विकास दुबे और उनके साथी ज़िले की सीमा पार न कर पाते और उन्हें आसानी से ढूंढ़ लिया जाता.

अभी इस बात की भी जानकारी नहीं मिल सकी है कि मुठभेड़ के कितनी देर बाद अतिरिक्त पुलिस बल वहां पहुंचा था.

विकास दुबे का घर

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पुलिस का ख़ुफ़िया तंत्र कमज़ोर था या फिर विकास दुबे का ख़ौफ़ था

शनिवार को विकास दुबे का घर तोड़ने के बाद पुलिस ने बताया कि उसे इसलिए तोड़ना पड़ा क्योंकि घर में भारी मात्रा में गोला-बारूद और हथियार थे.

वहीं, मुठभेड़ वाली रात विकास दुबे ने जिस तरह से तैयारी की थी और कथित तौर पर दो दर्जन से ज़्यादा शूटरों को गांव स्थित अपने घर पर बुलाया था, उसकी किसी को जानकारी न होना, आश्चर्य ही नहीं, संदेह भी पैदा करता है.

गांवों में कोई बाहरी व्यक्ति आ जाए और लोगों को पता न चले, ऐसा कम ही होता है लेकिन यहां तो इतनी बड़ी संख्या में लोग आ रहे थे, वो भी हथियारों के साथ. ऐसे में थाने की पुलिस के अलावा लोकल इंटेलिजेंस पर भी सवाल उठ रहे हैं.

पुलिस का एक समानांतर ख़ुफ़िया तंत्र भी तमाम गांवों में मौजूद रहता है लेकिन उसने भी या तो कोई सूचना नहीं दी या फिर सूचना को पुलिस ने नज़रअंदाज़ किया.

वीडियो कैप्शन, कानपुर एनकाउंटर के मुख्य अभियुक्त विकास दुबे का घर तोड़ा गया

विकास दुबे को लेकर कितनी गंभीर थी कानपुर पुलिस

गुरुवार रात की घटना के बाद विकास दुबे के कथित काले कारनामों की चर्चा अब भले ही दुनिया भर में हो रही है, लेकिन उससे पहले तक कानपुर ज़िले की पुलिस उसे लेकर बहुत गंभीर थी, ऐसा लगता नहीं है.

ढाई लाख का इनामी बदमाश घोषित करने के बाद अब वह भले ही राज्य की टॉप लिस्ट में आ गया हो लेकिन अब तक विकास दुबे कानपुर ज़िले के टॉप टेन क्रिमिनल्स में भी शामिल नहीं था.

ज़िले के पुलिस अधिकारियों के साथ कानपुर ज़ोन के अफ़सरों की भी नियमित बैठक होती थी लेकिन उसमें शायद कभी इस पर चर्चा नहीं हुई.

साल 2017 में कानपुर में ही दर्ज दो मामलों में फ़रार चल रहे विकास दुबे को एसटीएफ़ ने लखनऊ के कृष्णानगर स्थित उसके घर से पकड़ा था. बाद में विकास दुबे को इस मामले में कोर्ट से ज़मानत मिल गई थी.

यही नहीं, इससे पहले अन्य अपराध के मामलों में जिस तरह से उनके ख़िलाफ़ कोर्ट में किसी ने गवाही नहीं दी, ज़मानत मिलती गई, उससे भी ये सवाल उठते हैं कि आख़िर ऐसा क्यों और कैसे हुआ?

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