कोरोना काल और पुरी की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा के थमते पहिए

    • Author, सुब्रत कुमार पति
    • पदनाम, भुवनेश्वर से, बीबीसी हिंदी के लिए

"ये मेरे लिए दुख और पीड़ा की बात है. हर साल हम रथयात्रा में शामिल होते थे. इस दुनिया में जो होता है वो भगवान जगन्नाथ की इच्छा से होता है. अगर वो नहीं चाहते कि हम उनके दर्शन करने जाएँ तो हम उनकी अनुमति का इंतज़ार करेंगे."

भुवनेश्वर के फणी भूषण रथ अपने परिवार के साथ हर साल रथयात्रा देखने पुरी जाते थे. लेकिन इस साल ऐसा नहीं हो पाएगा.

यह मुश्किल केवल फणी भूषण रथ की ही नहीं है. पुरी के पथुरिआ साही में रहने वाली 24 वर्षीया ज्योतिर्मयी के परिवार में भी रथयात्रा हर साल एक महीने तक चलने वाला उत्सव का माहौल लेकर आता था.

उनके घर में कई मेहमान आते थे और सब मिलकर रथयात्रा देखने जाते थे. लेकिन इस बरस उनके आंगन में उदासी का डेरा रहेगा.

ज्योतिर्मयी की तरह ही पुरी शहर के बहुत से लोग उदास हैं क्योंकि पिछले 284 सालों में एक भी बरस बिना रथयात्रा देखे आज तक नहीं गुज़रा.

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

इसी गुरुवार को एक ऐतिहासिक फ़ैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कोविड-19 की महामारी के मद्देनज़र भगवान जगन्नाथ के सदियों पुरानी वार्षिक रथयात्रा पर रोक लगा दी.

चीफ़ जस्टिस एसए बोबडे की अगुवाई वाली बेंच ने इस साल की रथयात्रा को रद्द करने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फ़ैसला सुनाया.

कोर्ट का कहना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिकों की सुरक्षा के लिए रथयात्रा आयोजित नहीं की जाएगी.

ओडिशा विकास परिषद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ़ जस्टिस ने कहा, "अगर हम इसे जारी रखने की अनुमति देते हैं तो भगवान जगन्नाथ हमें माफ़ नहीं करेंगे."

रथयात्रा के भव्य आयोजन के लिए ओडिशा सरकार द्वारा शुरू की गई युद्ध-स्तर की तैयारियों के लगभग एक महीने के बाद सर्वोच्च अदालत का ये आदेश आया.

कोरोना महामारी को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण जगन्नाथ धाम के लिए प्रसिद्ध पुरी शहर की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुज़र रही है.

शहर का एक बहुत बड़ा तबका रोज़ी-रोटी के लिए यहां आने वाले श्रद्धालुओं पर निर्भर रहता है और अब उसकी फ़िक्र बढ़ रही है.

श्रद्धालुओं के दान से होने वाली जगन्नाथ मंदिर की कमाई भी कम हो गई है. वहीं, रथयात्रा बंद करने के फ़ैसले से स्थानीय लोग नाराज़ भी दिख रहे हैं.

कैसी थी तैयारी?

इस महीने की 23 तारीख़ को रथयात्रा होनी थी और इसके लिए तैयारियां भी ज़ोर पकड़ चुकी थीं.

हिंदुओं के अराध्य भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर ले जाने वाले तीनों रथ भी लगभग तैयार हो चुके थे.

तीनों रथ का काम 90 प्रतिशत ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कपड़े की सजावट के बाद रथ पूरी तरह से तैयार हो जाता.

कोरोना लॉकडाउन के चलते अक्षय तृतीया उत्सव के दिन से शुरू होने वाला रथ निर्माण कार्य लगभग एक सप्ताह बाद शुरू हुआ.

ओडिशा उच्च न्यायालय ने भी 23 जून तक राज्य सरकार को युद्धस्तर पर रथ निर्माण पूरा करने के लिए कहा था. रथ निर्माण अंतिम चरण में पहुंच गया था और एक या दो दिन में पूरा होने वाला था.

रथयात्रा की शुरुआत

स्नान पूर्णिमा की रस्म को कोरोना के प्रकोप के मद्देनज़र अनुशासित तरीक़े से पूरा किया गया था.

भक्तों की उपस्थिति के बिना इस आयोजन को संपन्न करने के लिए प्रशासन की तरफ़ से पुरी शहर में धारा 144 लगा दी गई थी.

जगन्नाथ मंदिर के वरिष्ठ सेवायत हलधर दास महापात्र ने बताया कि "रथ को खींचने की रस्म काफ़ी हद तक उसी तरह पूरी हो सकती थी, जिस तरह से कोरोना महामारी के बीच इस साल स्नान यात्रा को पूरा किया गया था."

क्यों हो रहा है विरोध?

वरिष्ठ सेवायत विनायक दास महापात्र ने बीबीसी से कहा, "ये पूर्व नियोजित है. क्योंकि अक्षय तृतीया के बाद से ओडिशा सरकार रथ यात्रा को रोकने की कोशिश कर रही थी. सदियों पुराने वार्षिक उत्सव की सभी तैयारियाँ बेकार हो गई हैं. पिछली कई शताब्दियों में जो नहीं हुआ था वह आज एक यथार्थ बन गया है. अगर रथयात्रा नहीं करनी थी तो रथ का निर्माण नहीं करना चाहिए था. यह करोड़ों जगन्नाथ भक्तों के भावनाओं के साथ खिलवाड़ है."

उन्होंने कहा कि भक्तों की भागीदारी के बिना रथ यात्रा का आयोजन किया जा सकता था.

इस फ़ैसले के विरोध में जगन्नाथ सेना और श्रीक्षेत्र सुरक्षा वाहिनी के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए हैं. शुक्रवार को पुरी में 12 घंटे की हड़ताल बुलाई गई.

जगन्नाथ सेना के प्रमुख एडवोकेट प्रियदर्शन पटनायक का कहना है कि शीर्ष अदालत में ओडिशा सरकार का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि रथयात्रा का आयोजन भारी संख्या में लोगों का इकट्ठा होना और क़ानून व्यवस्था की स्थिति पैदा कर सकता है. लेकिन उन्होंने हाथियों या मशीनों से रथ खींचने जैसा कोई वैकल्पिक उपाय नहीं बताया.

पटनायक ने रथयात्रा को रद्द करने के पीछे ओडिशा सरकार की साज़िश का आरोप लगाया.

बीजेपी विधायक और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रदीप नायक का कहना है, "केंद्र सरकार ने ओडिशा सरकार के ऊपर रथयात्रा का निर्णय छोड़ दिया था. और इस मामले को अदालत में नहीं ले जाना चाहिए था. यह एक भावनात्मक मुद्दा है, इतनी देरी के बाद इसे रोकना उचित नहीं है. राज्य सरकार को उत्सव आयोजित करने के लिए एक रास्ता खोजना चाहिए था."

कोरोना संकट से जूझती जगन्नाथपुरी

ओडिशा में अब तक कोरोना के 4677 मामले पाए गए हैं.

पुरी में अब तक कोरोना के 211 मामले पॉज़िटिव पाए गए हैं. इनमे से 108 लोग स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं. और 103 लोगों का इलाज अलग-अलग अस्पतालों में चल रहा है.

कोरोना से पुरी में अब तक किसी की भी मौत नहीं हुई. और पुरी शहर अभी ग्रीन ज़ोन में है.

ओडिशा सरकार का पक्ष

गुरुवार को हुई कैबिनेट मीटिंग के बाद राज्य सरकार ने एक प्रेस रिलीज़ जारी कर कहा कि 'मंदिर प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करने के लिए कहा गया है. ये फ़ैसला हर ओड़िया और जगन्नाथ प्रेमी को निश्चय दुख देगा. जगन्नाथ ओड़िया लोगों की आत्मा हैं, प्रत्येक ओड़िया के सुख दुख के पथप्रदर्शक हैं. उनके इच्छा के बगैर कुछ भी संभव नहीं है. उनके इच्छा को समर्पित होकर ग्रहण करना जीवन को आगे बढ़ाना ही सही भक्ति है. आज इन कठिन परिस्थितियों में जब पूरा विश्व कोरोना के खिलाफ़ लड़ रहा है, हमने उनके पास खुद को समर्पित कर दिया है.'

राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी बीजू जनता दल के प्रवक्ता प्रमीला मल्लिक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश न मानकर रथयात्रा का आयोजन भयानक हो सकता है. इससे कोरोना संक्रमण फैलने और कम्युनिटी ट्रांसमिशन का भी ख़तरा हो सकता है. इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

वरिष्ठ बीजेडी नेता और ओडिशा विधानसभा के स्पीकर सूर्ज्य नारायण पात्र ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद इस पर और चर्चा की ज़रूरत नहीं रह गई है.

ओडिशा सरकार के मेडिकल ट्रेनिंग और एजुकेशन विभाग के निदेशक डॉक्टर सीबीके मोहंथी ने कहा, "रथ यात्रा में बड़ी तादाद में लोगों का आना स्वाभाविक है. यहां सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन सम्भव नहीं है. यहां कोविड-19 की गाइडलाइंस का पालन करना संभव नहीं हो पाएगा. यहाँ आने वाले सारे श्रद्धालुओं की स्क्रीनिंग भी संभव नहीं है. रथयात्रा को बंद करना एहतियाती तौर पर उठाया गया क़दम है."

सुप्रीम कोर्ट मान जाता तो कैसे होती रथयात्रा?

कोरोना संकट के मद्देनज़र 'श्री जगन्नाथ टेम्पल मैनेजिंग कमिटी' की तरफ़ से रथयात्रा आयोजन को लेकर ओडिशा सरकार को एक प्रस्ताव दिया गया था.

पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंहदेव इस कमिटी के अध्यक्ष हैं. मंदिर के मुख्य प्रशासक आईएएस कृष्ण कुमार, ज़िलाधिकारी बलवंत सिंह, पुलिस सुपरिटेंडेंट उमाशंकर दास और कई वरिष्ठ सेवायत इस कमिटी के सदस्य हैं.

इस कमिटी के अध्यक्ष गजपति महाराज दिव्य सिंह देव ने बताया, "बिना भक्तों के इस बार रथयात्रा करने की इस कमिटी ने सिफ़ारिश की थी. कम से कम सेवायतों के साथ रथयात्रा करने का प्रस्ताव दिया गया था. कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने और रथयात्रा परंपरा को निर्वाह करने की व्यवस्था करने के इरादे से ये प्रस्ताव दिया गया था. हाल ही में रथयात्रा में हिस्सा लेने वाले सेवायतों का कोविड टेस्ट भी किया गया था. लेकिन राज्य सरकार ने टेम्पल मैनेजिंग कमिटी के प्रस्ताव पर कोई जवाब नहीं दिया. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अब राज्य सरकार ने टेम्पल मैनेजिंग कमिटी को रथयात्रा की कुछ रस्म जो मंदिर के अंदर की जा सकती है, उसे करने का निर्देश दिया है."

पर्यटन और रथयात्रा

पर्यटन की दृष्टि से देखें तो पुरी ओडिशा का सबसे महत्वपूर्ण शहर है. भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने, विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर घूमने, मरीन ड्राइव और सागर तट का आनंद लेने यहाँ देश-विदेश से लोग आते रहते है.

पूरे साल यहाँ तीर्थ यात्रियों की भीड़ लगी रहती है. रथयात्रा के दौरान कम से कम 10 लाख लोग पुरी आते हैं.

लॉकडाउन और रथयात्रा न होने से यहाँ के होटल और ट्रेवल इंडस्ट्री पर बुरा असर पड़ रहा है.

शहर की अर्थव्यवस्था पर असर

पुरी शहर में छोटे-बड़े मिलाकर कुल 800 होटल हैं. यहाँ 40 हज़ार लोगों के रहने की सुविधा है. रथयात्रा के दौरान हर साल सारे होटल भर जाते हैं.

राज किशोर पात्र पुरी होटल एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "18 मार्च से पुरी के सारे होटल बंद हैं. तब से होटल इंडस्ट्री का हाल बहुत ज़्यादा ख़राब है. होटल बंद होने के कारण ज़्यादातर होटल अपने कर्मचारियों को तनख़्वाह नहीं दे पा रहे हैं. शहर के होटलों में काम कर रहे 10 हज़ार से ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी अब ख़तरे में है."

पुरी में लगभग 4 हज़ार से ज़्यादा टैक्सी और ऑटो रिक्शा पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए चल रहे हैं. लॉकडाउन के चलते इनका हाल ख़राब है.

युगब्रत कर पुरी ट्रैवल एजेंट एसोसिएशन से जुड़े हुए हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा की ऐसे बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनकी सिर्फ़ एक या दो गाड़ी है. ऐसे लोग गाड़ी खुद चलाकर अपने परिवार की रोज़ी रोटी का इंतज़ाम करते हैं.

वो कहते हैं, "अब टैक्सी की डिमांड बहुत कम हो गई है. बहुत सारे टैक्सी मालिक बैंक का लोन नहीं चुका पा रहे हैं. बैंक की तरफ़ से दी गयी तीन महीने की मोरेटोरियम अवधि ख़त्म होने को है. इसीलिए वे अपने गाड़ी बेच देना चाहते हैं, पर हालत ऐसी है कि कोई ख़रीददार भी नहीं मिल रहा है. रथयात्रा होती तो शायद पुरी शहर लॉकडाउन से उबर जाता, पर अब इसकी कोई गुंजाइश भी नहीं रही."

छोटे व्यापारियों का बुरा हाल

जगन्नाथपुरी मंदिर के बाहर और शहर के कई हिस्सों में बहुत सारे व्यापारियों की छोटी-छोटी दुकानें हैं. इन दुकानों में पूजा सामग्री, सस्ते अलंकार जैसी चीज़ें मिलती हैं.

रथयात्रा के समय पुरी में दूसरे बड़े मेले भी लगते हैं. रथयात्रा बंद होने के साथ-साथ ये सब भी इस साल बंद होंगे. और इन पर निर्भर रहने वाले कई परिवार चिंता में हैं.

पुरी बड़दांड में अविनाश मोहंती की एक ऐसा ही दुकान है जो पिछले तीन महीने से बंद पड़ी है. वो यहाँ भगवान जगन्नाथ की छोटी-छोटी मूर्तियां और तरह-तरह की सामग्री बेचते हैं.

दुकान बंद हो जाने से अविनाश की मुश्किलें बढ़ गई हैं. हाल ही में उन्होंने अपनी दुकान खोली थी. पर रथयात्रा न होने से वो निराश हैं. उनकी बचत के पैसे ख़त्म हो चुके हैं और आगे का रास्ता वो खोज नहीं पा रहे हैं.

कम हुई मंदिर की कमाई

लॉकडाउन और रथ यात्रा न होने के कारण मंदिर की कमाई में भारी कमी देखने को मिल रही है.

क़ानून मंत्री प्रताप जेना ने फ़रवरी 18 को राज्य विधानसभा में बताया था कि इस साल जनवरी के अंत तक भक्तों से 187.01 करोड़ रुपये का दान मिला है.

इसके अलावा जगन्नाथ मंदिर में 17.76 किलोग्राम सोना और 277.95 किलो चांदी भी मिली है.

मंदिर कार्यालय से मिली सूचना के अनुसार पिछले साल रथयात्रा के दौरान मंदिर के दान पात्र में 64 लाख रुपये का दान मिला था.

रथयात्रा के महीने में हर दिन दो से तीन लाख तक का डोनेशन मिलता है. इस साल यह घट कर 200 से 300 रुपये तक पहुँच गया है.

इससे पहले रथयात्रा कब बंद हुई थी?

जगन्नाथपुरी के इतिहास की जानकारी रखने वाले लोगों की मानें तो 1736 के बाद पिछले 284 साल में रथयात्रा कभी बंद नहीं हुई थी.

साल 1876 में पड़े सूखे में इस प्रान्त के लगभग 33 प्रतिशत लोगों के मरने के बावजूद भी रथयात्रा नहीं रुकी थी. अंग्रेज़ों के शासन के समय भी रथयात्रा नहीं रुकी.

इतिहास के जानकार नरेश दास ने बीबीसी को बताया कि साल 1568 से 1735 के बीच 32 बार रथयात्रा नहीं हो पाई. मुग़लों के दौर में जगन्नाथ पुरी मंदिर पर बार-बार हमले हुए थे.

इसके कारण तीनो देवताओं के बिग्रह को मंदिर से बाहर किसी गुप्त स्थान पर ले जाया गया था. और रथयात्रा बंद हो गई थी. 1692 में हुए एक आक्रमण के समय मंदिर के अंदर ही रथयात्रा का आयोजन हुआ था.

हालांकि शुक्रवार को पुरी रथयात्रा की अनुमति दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कुछ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं हैं और 23 जून को ये रथयात्रा हो पाएगी या नहीं, इसका फ़ैसला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट को ही करना है.

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