तेल की लगातार बढ़ती क़ीमतों के बीच कैसे संभलेगी अर्थव्यवस्था?

    • Author, तारेंद्र किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी जारी है. पिछले पाँच दिनों में हर दिन पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में इज़ाफ़ा किया गया है. 11 जून को पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में 60 पैसे की वृद्धि हुई है. तेल की क़ीमतों में यह वृद्धि उस वक़्त हो रही है जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँचने के बाद अब धीरे-धीरे सुधर रही है. हाल में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत क़रीब माइनस 37.63 डॉलर तक चली गई थी लेकिन अब यह क़रीब प्रति बैरल 40 डॉलर से अधिक हो गई है.

कोरोना वायरस की वजह से पैदा हुए संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की खपत में भारी कमी आई है. वैश्विक तेल उद्योग जगत के मुताबिक़ दुनिया में तेल की खपत में 35 प्रतिशत से ज़्यादा गिरावट दर्ज की गई है.

समाचार एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार सामान्य दिनों में भारत में रोज़ाना 46-50 लाख प्रति बैरल तेल की खपत होती है. लेकिन भारतीय तेल बाज़ार का अनुमान है कि कोविड-19 महामारी की वजह से भारत में तेल की खपत लगभग 30 प्रतिशत कम हो गई है.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है.

क्यों बढ़ रही हैं तेल की क़ीमतें

तेल की क़ीमतों में हो रही इस बढ़ोतरी को लेकर हमने बीजेपी नेता और तेल मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा से बातचीत की.

उनका कहना है कि पिछले दो हफ्तों में कच्चे तेल की क़ीमत में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन भारत में तेल की क़ीमतों का निर्धारण कच्चे तेल की क़ीमत से नहीं होता. एक छोटा सा हिस्सा कच्चे तेल की क़ीमत का ज़रूर होता है लेकिन यहाँ क़ीमतों का निर्धारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोल की क़ीमत से तय होती है. अगर भारत की कंपनी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोल-डीज़ल ख़रीदने जाती है तो उसकी क्या क़ीमत है इस पर निर्भर करता है और यह रिफ़ाइनिंग की क्षमता वग़ैरह दूसरे कारकों पर निर्भर करता है.

वो आगे बताते हैं कि भारत में लॉकडाउन के कारण तेल की माँग में भारी कमी आ गई थी. यह माँग घटकर 50-60 फ़ीसदी रह गई थी. इसमें अब बढ़ोतरी आई है. अब भारत की रिफ़ाइनरीज़ 82 फ़ीसदी उत्पादन कर रही है. इसका मतलब कि जो माँग घट कर 50-60 फ़ीसदी रह गई थी, वो अब क़रीब 70 फ़ीसदी तक पहुँच गई है. राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों ने जब कच्चे तेल की क़ीमत कम हो गई थी तो उन्होंने टैक्सेज़ बढ़ाई थीं. वो अब दोनों ही सरकारें घटा नहीं रही हैं. तो इसकी वजह से यह पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में यह बढ़ोतरी देखी जा रही है.

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पूर्व सचिव एससी त्रिपाठी तेल की क़ीमतों में वृद्धि को लेकर कहते हैं कि कच्चे तेल की क़ीमत जब कम हुई थी तब सरकार ने तेल पर टैक्स बढ़ा दिया था. 22 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल पर टैक्स को बढ़ाकर 32 रुपये के क़रीब कर दिया था और डीज़ल पर जो टैक्स 19 रुपये प्रति लीटर था उसे बढ़ाकर 28 रुपये कर दिया था. केंद्र सरकार का टैक्स और तेल का दाम दोनों मिलकर इसका बेस प्राइस होता है. इस पर राज्य सरकार 25-30 प्रतिशत अपना टैक्स लगा दिया. इस तरह से कच्चे तेल की क़ीमत कम होने पर भी पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत घटी नहीं. अब तो फिर से कच्चे तेल की क़ीमत क़रीब 40 डॉलर के क़रीब पहुँच गई. अब बेस प्राइस उसके हिसाब से बढ़ गया और टैक्स घटा नहीं तो फिर पट्रोल-डीज़ल की क़ीमत में बढ़ोतरी तो होगी ही.

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिशों पर असर

तेल की क़ीमतों में यह बढ़ोतरी तब हो रही है जब देश की अर्थव्यस्था संकट के दौर से गुज़र रही है. इसका अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की संभावनाओं पर क्या असर पड़ेगा.

यह सवाल हमने जब नरेंद्र तनेजा से पूछा तो उनका कहना था, "सरकार की अभी जो आय है वो एक्साइज़ ड्यूटी पर निर्भर है. केंद्र सरकार की निर्भरता इसके लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर है. क्योंकि पचास फ़ीसद एक्साइज़ ड्यूटी पेट्रोल-डीज़ल से आती है. वैसे ही राज्य सरकारों की जो आय है वो बड़े पैमाने पर पेट्रोल-डीज़ल से मिलने वाले टैक्स पर निर्भर करती है. राज्य सरकारों के पास टैक्स के तीन सबसे बड़े स्रोत होते हैं उनमें शराब, ज़मीन की ख़रीद बिक्री से मिलने वाली स्टाम्प ड्यूटी और पेट्रोल-डीज़ल शामिल होते हैं. अब चूंकि केंद्र और राज्य सरकारों की स्थिति अभी बहुत अच्छी नहीं है इसलिए उनकी निर्भरता इन टैक्सेज़ पर और बढ़ गई है. ऐसी स्थिति में कोई सरकार टैक्स कम कर पाएगी, इसकी संभावना नहीं लगती. लेकिन दूसरी तरफ़ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत बढ़ गई है."

एससी त्रिपाठी इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "डीज़ल की क़ीमतों का असर अर्थव्यवस्था पर ज्यादा पड़ता है क्योंकि ट्रांसपोर्टेशन में डीज़ल का इस्तेमाल ही ज्यादा होता है. सरकार का मानना यह है कि लॉकडाउन में छूट के बाद भी जो पेट्रोल-डीज़ल की खपत है, उसका स्तर अभी पर्याप्त स्तर तक नहीं पहुंचा है. वो अभी भी 40-45 फ़ीसद पर ही है. लेकिन जब लॉकडाउन पूरी तरह से खुलेगा और आर्थिक गतिविधियाँ फिर से पटरी पर आएंगी तब खपत भी पर्याप्त स्तर पर होने लगेगा. सरकार की नज़र में क़ीमतों में वृद्धि इतनी नहीं जिसकी वजह से खपत पर कोई ख़ास असर पड़े."

वो आगे कहते हैं कि पेट्रोल-डीज़ल किसी भी सरकार के लिए टैक्स कमाने के इतने अच्छे स्रोत हैं कि वो कोई भी मौक़ा गंवाना नहीं चाहते.

वो बताते हैं, "सरकार के राजस्व कर में अनुमान के मुताबिक़ इस साल पाँच-छह लाख करोड़ का नुक़सान होगा. कुछ की भारपाई तो ये लोन लेकर करेंगे लेकिन इसका असर आगे चलकर अच्छा नहीं होता इसलिए टैक्स बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प सरकार के पास नहीं है. जीएसटी, इनकम टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स सभी टैक्स में कमी आने वाली है और अर्थव्यवस्था की हालत ठीक नहीं है. तो यही एक टैक्स जिसकी मदद से यह कुछ भारपाई कर सकते हैं क्योंकि ट्रांसपोर्ट तो करना ही पड़ेगा. अब डीज़ल प्रति लीटर 70 का है या 75 का या फिर पेट्रोल 70 से बढ़कर 80 का हो जाए जिसको चलना होगा उसे तो चलना ही होगा."

लॉकडाउन में महंगाई की दोहरी मार

तेल की क़ीमतों के बढ़ने के साथ महंगाई बढ़ने की संभावना भी तेज़ हो जाती है. लॉकडाउन की वजह से लाखों लोगों का काम बंद हो गया है और लोगों की आय पर बुरा असर पड़ा है. इस वक़्त क्या महंगाई बढ़ने से लोगों पर दोहरी मार नहीं पड़ने वाली.

नरेंद्र तनेजा इस पर कहते हैं, "आने वाले चार-पाँच हफ्तों में महंगाई पर इस वृद्धि का असर नहीं पड़ने वाला है क्योंकि अभी लॉकडाउन पूरी तरह से नहीं खुला है और अर्थव्यवस्था भी पूरी तरह से चालू नहीं हुई है. अभी आपूर्ति और माँग दोनों की ही चुनौतियां बनी हुई हैं. जब लॉकडाउन पूरी तरह से खुल जाएगा और आर्थिक गतिविधियाँ तेज़ होंगी तब फिर इसका असर पड़ेगा है लेकिन अभी नहीं क्योंकि अभी तो न बाज़ार में माँग है और न ही आपूर्ति."

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