कोरोना: LG साहब के आदेश ने दिल्ली के लोगों के लिए समस्या और चुनौती पैदा कर दी है- केजरीवाल

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- Author, ब्रजेश मिश्र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के उस फ़ैसले को पलट दिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली के अस्पतालों में केवल दिल्लीवालों का ही इलाज होगा.
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार अनिल बैजल ने अधिकारियो को आदेश दिया है कि वो इस बात को सुनिश्चित करें कि किसी भी मरीज़ को स्वास्थ्य सेवाएं देने से इस आधार पर मना नहीं किया जा सकता है क्योंकि वो दिल्ली का निवासी नहीं है.
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एलजी अनिल बैजल के इस फ़ैसले को मुख्यमंत्री केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के लिए बड़ी समस्या क़रार दिया है.
अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा, "LG साहब के आदेश ने दिल्ली के लोगों के लिए बहुत बड़ी समस्या और चुनौती पैदा कर दी है. देशभर से आने वाले लोगों के लिए कोरोना महामारी के दौरान इलाज का इंतज़ाम करना बड़ी चुनौती है. शायद भगवान की मर्ज़ी है कि हम पूरे देश के लोगों की सेवा करें. हम सबके इलाज का इंतज़ाम करने की कोशिश करेंगे."
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दिल्ली के अस्पताल अब सिर्फ़ दिल्लीवालों के लिए - ये हेडलाइन रविवार शाम से चर्चा में बनी हुई थी. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इस ऐलान को लेकर ख़ूब प्रतिक्रियाएँ आ रही थीं.
ये फ़ैसला राजनीतिक रंग लेता जा रहा था और उनके विरोधी लगातार उनपर हमले कर रहे थे.
बहुजन समाज पार्टी नेता मायावती, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम, उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य समेत कई नेताओं ने केजरीवाल पर निशाना साधा था.
कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने ट्वीट कर केजरीवाल के फ़ैसले की क़ानूनी वैधता पर सवाल उठाए.
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चिदंबरम ने कहा, "मुझे लगा कि अगर किसी व्यक्ति ने जन आरोग्य योजना / आयुष्मान भारत में नामांकित किया है, तो वह भारत में कहीं भी, किसी भी अस्पताल, सार्वजनिक या निजी अस्पताल में इलाज करा सकता है? क्या केजरीवाल ने घोषणा करने से पहले क़ानूनी राय ली?".
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वहीं उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि इस फ़ैसले को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए.
मौर्य ने एक टीवी चैनल से कहा, "दिल्ली देश का दिल है और देश का कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रदेश में अगर किसी भी बीमारी से ग्रसित है तो वो इलाज करा सकता है. जिस तरह से डॉक्टरों के लिए मरीज़ केवल मरीज़ होता है, उसी प्रकार से सरकारों के लिए किसी भी प्रदेश का नागरिक देश का नागरिक होता है. दिल्ली में सरकार ने एक ग़लत शुरूआत की है, इसके लिए उन्हें माफ़ी माँगनी चाहिए और इसे वापस लेना चाहिए."
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने फ़ैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इस मामले में केंद्र से हस्तक्षेप की माँग की है.
आइए देखें कि क्या है ये मुद्दा और क्यों हो रही है इसपर चर्चा.
केजरीवाल ने क्या कहा और क्यों कहा?
अरविंद केजरीवाल ने रविवार को एक वीडियो संदेश में बताया कि उनकी कैबिनेट ने ये फ़ैसला लिया है कि दिल्ली के अस्पताल केवल दिल्ली के लोगों के लिए रिज़र्व होने चाहिए.
केजरीवाल ने कहा कि सोमवार से दिल्ली की सीमाएँ खोली जा रही हैं, ये सीमाएँ एक हफ़्ते पहले सील की गई थीं क्योंकि सरकार को लगा था कि अगर सीमा खुली तो देश भर से मरीज़ दिल्ली आएँगे और ऐसे में अगर वो दिल्ली के अस्पतालों में गए तो क्या कोरोना का इलाज कर रहे ये अस्पताल इस दबाव को बर्दाश्त कर पाएँगे?
केजरीवाल ने बताया कि महामारी फैलने से पहले तक किसी भी वक़्त में दिल्ली के अस्पतालों में 60 से 70 फ़ीसदी मरीज़ दूसरे राज्यों के होते थे. लेकिन इस वक़्त दिल्ली ख़ुद बहुत बड़ी समस्या में है. दिल्ली में कोरोना के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं जिससे निपटने के लिए सरकार बेड्स का इंतज़ाम कर रही है. ऐसी स्थिति में दिल्ली के अस्पतालों को अगर पूरे देश के लिए खोल दिया गया तो दिल्ली के लोगों को कोरोना हुआ तो वो कहाँ जाएँगे?

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उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ने पिछले सप्ताह इस बारे में जनता से राय माँगी थी जिसके बाद साढ़े सात लाख लोगों ने अपने सुझाव भेजे और 90% से ज़्यादा लोगों का कहना था कि जब तक कोरोना है तब तक दिल्ली के अस्पताल दिल्ली वालों के लिए रिज़र्व होने चाहिए.
मुख्यमंत्री ने बताया कि साथ ही सरकार की ओर से गठित पाँच डॉक्टरों की एक समिति ने भी यही सुझाव दिया कि दिल्ली में कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, जून के अंत तक यहाँ 15,000 बेड्स की ज़रूरत होगी. इसलिए कुछ महीनों के लिए दिल्ली के सारे अस्पताल केवल दिल्ली के लोगों के लिए होने चाहिए.
कितने बेड हैं दिल्ली के अस्पतालों में?
केजरीवाल ने बताया कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में कोविड रोगियों के लिए 9000 बेड्स हैं और डॉक्टरों की समिति ने कहा कि अगर दिल्ली के अस्पतालों को सारे भारत के लिए खोल दिया गया तो ये बेड्स तीन दिन में भर जाएँगे.
दिल्ली सरकार की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक़, दिल्ली सरकार के 37 अस्पतालों में कोरोना मरीज़ों के लिए कुल 8,270 बेड हैं जिनमें से 4510 फ़िलहाल भरे हुए हैं और 3760 बेड फ़िलहाल ख़ाली हैं.
इसके अलावा दिल्ली के अस्पतालों में कुल 490 वेंटिलेटर हैं. इनमें से 238 वेंटिलेटर इस्तेमाल में हैं और 252 फ़िलहाल ख़ाली हैं.

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दिल्ली में रहने वाले दूसरे राज्यों के लोग अगर बीमार हुए तो कहाँ जाएँगे?
केजरीवाल ने कहा कि राजधानी में दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले अस्पतालों में 10,000 बेड हैं, और केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले अस्पतालों में भी 10,000 बेड हैं.
उनका कहना था कि दिल्ली के बाहर के रहने वाले लोग केंद्र सरकार के अस्पतालों में आकर अपना इलाज करवा सकते हैं. केंद्र के अस्पताल सबके लिए खुले रहेंगे.
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के राज्य सचिव डॉ. अरविंद चोपड़ा ने बीबीसी से कहा, 'हमारे पास केंद्र सरकार के तीन बड़े अस्पताल हैं- एम्स, सफ़दरजंग और राम मनोहर लोहिया अस्पताल. तो बाहर से आने वाले लोग यहाँ इलाज के लिए जा सकते हैं. बाहर के लोग केंद्र के अस्पतालों में जाएं. लेकिन जो लोग दिल्ली में किराए में रह रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, वो दिल्ली के ही माने जाएंगे.''

क्या प्राइवेट अस्पतालों में सभी लोग जा सकेंगे? नहीं. केजरीवाल ने बताया कि कोरोना संकट तक निजी अस्पताल केवल दिल्ली के लोगों का इलाज कर सकेंगे.
मगर कुछ निजी अस्पतालों में जहाँ ख़ास तरह के ऑपरेशन होते हैं, जो सर्जरी देश में कहीं और नहीं होती, और लोगों को दिल्ली आना पड़ता है, जैसे कैंसर की सर्जरी, ट्रांसप्लांटेशन, न्यूरोसर्जरी आदि, तो वो अस्पताल पूरे देश के लोगों के लिए खुले रहेंगे.
इस फ़ैसले के आलोचक क्या कह रहे हैं?
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विरोधी दलों ने इस फ़ैसले पर आपत्ति जताई है.
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष आदेश कुमार गुप्ता ने केजरीवाल से सवाल किया, "चुनाव से पहले इंसान से इंसान का हो भाईचारा कहने वाले मुख्यमंत्री ने सारी इंसानियत को ही शर्मसार कर दिया. लाखों लोग दूसरे राज्य में रोज़गार के लिए जाते हैं. दिल्ली में भी हैं. इनमें से किसी को संक्रमण हुआ तो वो कहाँ जाएगा केजरीवाल जी? उसको अगर कुछ हुआ तो ज़िम्मेदारी किसकी होगी?"
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चौधरी अनिल कुमार ने कहा कि केजरीवाल सरकार को ये बताना होगा कि बाहरी व्यक्ति है कौन.
उन्होंने कहा, "आख़िर वो प्रवासी जिन्होंने इस शहर को चुना, जो यहाँ मज़दूरी करते थे, जिनके पास अपने गाँव की आईडी है, जो इस आपदा में अपने घरों की ओर निकल गए, या जो बचे हुए हैं, अगर वो संक्रमित हुए तो कहाँ जाएँगे?"
चौधरी अनिल कुमार ने ये भी आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल लोगों को गुमराह कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "सात अप्रैल को प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में 30,000 बेड तैयार होने का दावा किया था, कि प्रतिदिन 1,000 मरीज़ आएँगे तो दिल्ली में 30,00 बेड उपलब्ध हैं. दो दिन पहले कहा कि हमारे पास 8,000 बेड हैं. और अब कह रहे हैं कि हमारे पास 10,000 और केंद्र के अस्पतालों में 10,000 बेड हैं. और फिर डॉक्टर महेश वर्मा कमेटी के सुझाव में कह रहे हैं कि जून के अंत तक 15,000 बेड की ज़रूरत पड़ेगी. तो जब 30,000 थे तो आप 15,000 मरीज़ों की बात सुनकर ही सरकार ने हाथ खड़े कर दिए?"
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बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने फ़ैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इस मामले में केंद्र से हस्तक्षेप की माँग की है.
मायावती ने ट्वीट किया, "दिल्ली देश की राजधानी है. यहाँ पूरे देश से लोग अपने ज़रूरी कार्यों से आते रहते हैं. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अचानक बीमार पड़ जाता है तो उसको यह कहकर कि वह दिल्ली का नहीं है इसलिए दिल्ली सरकार उसका इलाज नहीं होने देगी, यह अति-दुर्भाग्यपूर्ण है. केन्द्र को इसमें ज़रूर दख़ल देना चाहिए."
दिल्ली के डॉक्टरों का क्या कहना है?
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए) ने इस फ़ैसले को सही बताते हुए स्पष्ट किया है कि ये आदेश सिर्फ़ कोरोना मरीज़ों के लिए है.
डीएमए के अध्यक्ष डॉ. गिरीश त्यागी ने बीबीसी से कहा, ''फ़िलहाल दिल्ली में आईसीयू बेड और सामान्य बेड की स्थिति ठीक नहीं है. निजी अस्पतालों में भी बेड की दिक़्क़तें हैं. साथ ही डॉक्टरों की कमी भी दिखती है. जो भी आएगा उसका इलाज करना डॉक्टरों की ज़िम्मेदारी है. दिल्ली के लोगों के लिए यह सही फ़ैसला है.''




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