कोरोना वायरस ने भारत में जाति की दीवार को ढहा दिया है?

    • Author, बद्री नारायण
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

कोरोना ने भारतीय समाज में जाति को थोड़ा पीछे ढकेल कर 'संक्रमण की चिंता से ग्रसित देह' को केन्द्र में ला दिया है.

गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज की अपनी शोध टीम के साथ हम लोगों ने 'आपात स्थिति में जातिभाव' का अध्ययन करने की कोशिश की.

कोरोना काल में अनेक प्रवासी मज़दूर लॉकडाउन के बाद अपनी नौकरी खोकर दिल्ली, मुंबई, सूरत जैसे बड़े शहरों से पैदल, माल ढोने वाले ट्रक से और अंत में सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई ट्रेन-बसों से लौटे हैं.

गांव पहुंचने के बाद उन्होंने सामूहिक क्वारंटीन में 14 दिन बिताए और जो होम क्वारंटीन में अपना समय बिताकर अपनी-अपनी बस्तियों में रहने लगे हैं, उनके साक्षात्कार से निकले निष्कर्षों के आधार पर हम कह सकते हैं कि अब सामाजिक दूरी तय करने का आधार ऊंच-नीच में विभाजित जातीय अलगाव की जगह इस वक़्त 'देह और देह' के बीच होने लगा है.

छुआछूत अब जाति के आधार पर नहीं हो रहा

जाति आधारित अछूतपन भारतीय समाज में फ़िलहाल द्वितीय किस्म का विलगाव हो गया है. आज संक्रमण के समय जाति से परे एक दूसरे के बीच सामाजिक दूरी आदमी के एक देह से दूसरे देह के बीच की दूरी के रूप में हमारे सामने आ गयी है.

प्रवासी मज़दूर जिसे गांवों में 'परदेसी' कहा जाता है, आज गांवों में कोरोना का प्रतीक हो गया है, वो चाहे जिस जाति का हो, लोग उसके पास आने और छुआने से कम से कम 14 दिन और उसके बाद भी बचते रहते हैं.

प्रवासी मज़दूर स्वयं भी लोगों से दूरी बनाकर रहता है. सुबह खेत में, बाग़ में जाते वक़्त भी कहीं वो सामने न पड़ जाये, यह भय सबको खाता रहता है.

कई जगहों पर यह देखने को मिला है कि पत्नी परदेसी पति को होम क्वारंटीन में भी थाली हाथ से नहीं देती, बल्कि कुछ दूर रखकर हट जाती है.

वो नहीं चाहती कि उसका बेटा अपने बाप से छू जाए. यह एक विचित्र मानवीय अनुभव है, जिससे भारतीय समाज आज गुज़र रहा है.

ब्राह्मण जाति के युवक ने अपनी ही जाति वालों से सुनी बातें

उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के एक गांव में मुंबई से आकर ब्राह्मण जाति का एक युवक होम क्वारंटीन में था.

उसने अपना अनुभव बताया कि अगर वो घर से कहीं बाहर निकल गया तो उसी की बस्ती और जाति के भाई-बन्धु डांटने लगते थे.

बाहर क्यों निकल रहे हो? तुम कोरोना फैला रहे हो.

उसने बातचीत में हमारे शोध सहयोगी को बताया कि हम शाम को खेत की तरफ़ निकलते थे तो लोग हमें 'कोरोना-कोरोना' कहने लगते थे.

पत्नी को हैंडपम्प से पानी भरने से रोका

हमारे एक शोधार्थी ने अपनी फ़ील्ड डायरी में उसकी पत्नी का अनुभव दर्ज किया है कि अगर वो हैंडपम्प पर पानी भरती थी, तो उसी की जाति के लोग रोक देते थे कि अभी तुम्हारा पति क्वारंटीन में है, 'चापाकल' छुओगी तो कोरोना बस्ती में फैल सकता है.

अगर गहराई से सोचें तो यह अछूतपन भले ही थोड़े दिन के लिए हो, किन्तु जाति आधारित अछूतपन से कहीं कम गहरा घाव नहीं दे जाता है.

इसमें लोगों को किसी प्रवासी मज़दूर की देह या संक्रमण की आशंका में रहने वाली देह से मृत्यु का भय होता है.

यह 'मृत्यु का भय' क्या 'जाति आधारित शुद्धता के खोने' के भय से कम मारक घृणा को जन्म देता होगा, यह सोचने की बात है.

आपातकाल में बदलती रूढ़ियां

किसी भी ऐसे विपदा जनित आपातकाल में बनी बनाई सामाजिक रूढ़ियां थोड़ी ढीली होती हैं, कुछ टूटती-फूटती हैं, कुछ नये स्वरूप ग्रहण कर आती हैं.

कोरोना के भय ने भारतीय गांवों के जातीय समीकरण को छिन्न-भिन्न किया है.

भले ही यह टूट-फूट अस्थायी हो, परन्तु यह ऐसे सामाजिक अनुभव को पैदा करेगी जो भारतीय समाज में जातीय भाव को शायद थोड़ा कम करे.

जातीय भाव आधारित ऊंची-पिछड़ी एवं नीची जैसी कोटियां इस प्रक्रिया में या तो टूट रही हैं या आहत हो रही हैं.

बिहार के समस्तीपुर ज़िले के एक गांव में एक सवर्ण युवक कलकत्ता से लॉकडाउन काल में लौटा.

वो लौटने के बाद बिना सामूहिक क्वारंटीन के अपने घर में रहने लगा. उसके ऐसे बस्ती में आने का विरोध उसी गांव के दलित सामाजिक समूह के कुछ लोगों ने किया.

उनके इस विरोध का उस गांव के अन्य सवर्णों ने भी समर्थन किया. क्योंकि संक्रमण जाति नहीं देखती और 'संक्रमण का भय' लोगों में एकजुटता भी पैदा करता है.

खाने का पैकेट देने वाले की जाति नहीं देखी

यही नहीं कुछ प्रवासियों ने अपना अनुभव बयान करते हुए कहा कि जब यह संकट शुरू हुआ तो सिर्फ़ जान बचाकर गांव पहुंचने की ही चिंता हम सबकी एक मात्र चिंता रह गई थी.

हम लोगों के एक प्रश्न के जवाब में ज़्यादातर सवर्ण, पिछड़ी एवं दलित जाति के परदेसी मज़दूरों ने कहा कि जब लॉकडाउन के बाद हम विपत्ति में घिर गए तो जाति की जगह सिर्फ़ गांव और गांव में छूटा परिवार याद आता था.

पैदल चलते वक़्त जो भी खाना या पानी कहीं देता था, खाकर हम लोग अपनी जान बचाते थे. खाने का पैकेट देने वाला किस जाति का है, किस धर्म का है, इसका हमें कोई ख़याल नहीं होता था.

उन्हीं प्रवासियों में से एक ने कहा - तब तो एक ही जाति थी, संकट में पड़े 'कमेरों की जाति.'

क्या फिर लौटेंगी जातिगत रूढ़ियां

प्रश्न उठता है कि क्या संक्रमण का भय ख़त्म होते ही जातिगत रूढ़ियों में आई यह सकारात्मक टूट-फूट, लचीलापन ख़त्म हो जाएगा.

बहुत संभव है ऐसा हो. क्योंकि यह सामाजिक अनुभव विपतकाल का सामाजिक अनुभव है.

किन्तु कोई भी ऐसा सामाजिक अनुभव हमारी स्मृतियों में एक ऐसी पूंजी जमा कर जाता है जो हममें ज़रूरत पड़ने पर नकारात्मक बोध वाली जातीय विभाजन और विलगाव की भावना को कमज़ोर कर उस पर आदमीयत के भाव को प्रभावी बनाता है.

यह ठीक है कि कुछ जगहों पर कोरोना काल में जातिगत अछूतपन के भाव अभिव्यक्त करने वाली घटनाएं हुई हैं.

किन्तु साथ में जातिगत अछूतपन के गौण होने की और आदमियत की भाव से भरी अनेकों घटनाएं हमारे आस-पास इसी कोरोना काल में घटित हो रही हैं.

इन्हें भी संचित और संकलित कर हम भारतीय समाज को बने बनाए आसान फ्ऱेम से थोड़ा अलग हटकर भी देख और समझ सकते हैं.

(बद्री नारायण, जी.बी पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट के निदेशक हैं. ये इंस्टिट्यूट, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की एक घटक संस्था है.)

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