कोरोना संकट: पीएम नरेंद्र मोदी की चिंता गाँव क्यों बन गए हैं

    • Author, गुरप्रीत सैनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोरोना वायरस को गाँवों में नहीं फैलने देना है.

जिस भारत को गाँवों का देश कहा जाता है और जिसकी 66 फ़ीसदी आबादी गाँवों में रहती है, वहाँ के लिए कोरोना बड़ी चुनौती पैदा कर सकता है.

प्रधानमंत्री की इस चिंता के पीछे की बड़ी वजह ये है कि कोरोना से बुरी तरह प्रभावित हुए राज्यों और शहरों में काम करने वाले प्रवासी मज़दूर बड़ी संख्या में अब अपने गाँव लौट रहे हैं.

रेल मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़ 12 मई तक साढ़े 6 लाख मज़दूरों को श्रमिक ट्रेन से उनके घर भेजा जा चुका है. वहीं कई तो पैदल या साइकिल तक से ख़ुद ही अपने गाँवों की ओर निकल पड़े हैं.

पहले माना जा रहा था कि कोरोना वायरस ग्रामीण भारत को ज़्यादा प्रभावित नहीं कर पाएगा. लेकिन अब डर जताया जा रहा है कि हो सकता है, वापस घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूर अनजाने में अपने साथ वायरस लेकर जा रहे हों. कुछ राज्यों से तो ऐसे मामले सामने आने भी लगे हैं.

समस्या मज़दूरों की

जब श्रमिक ट्रेनों की शुरुआत हुई और एक मई को पहली ट्रेन झारखंड पहुँची, तो झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा भी था, "हम जानते हैं कि अपने लोगों के साथ हम कोरोना को भी ला रहे हैं."

शनिवार को बिहार सरकार के स्वास्थ्य सचिव लेकेश सिंह ने भी कहा कि 21 ज़िलों में कम से कम 96 प्रवासी मज़दूर कोरोना संक्रमित मिले हैं. प्रशासन के मुताबिक़, इनमें से कई वो मज़दूर हैं जो पैदल ही अपने गृह क्षेत्रों में आए.

राजस्थान में ग्रामीण स्वास्थ्य के एडिशनल डायरेक्टर डॉ रवि शर्मा ने भी बीबीसी हिंदी को बताया कि राजस्थान में भी एक-दो ऐसे मामले मिले हैं.

उन्होंने कहा, "प्रवासी मज़दूर ज़्यादातर गाँव के रहने वाले होते हैं और अब वो अपने घर लौट रहे हैं. अभी तक तो इंफेक्शन शहरी इलाक़ों में था. अगर ये माइग्रेंट आबादी संक्रमित होकर ग्रामीण इलाक़ों में जाएगी तो निश्चित तौर पर ग्रामीण इलाक़ों में इंफेक्शन फैलेगा. इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने इसे एक चुनौती बताया."

भारत में कितने गाँव

सरकार की लोकल गवर्नमेंट डायरेक्ट्री के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार भारत में कुल 6 लाख 62 हज़ार 599 गाँव हैं.

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा एक लाख 7 हज़ार 242 गाँव हैं.

उसके बाद मध्य प्रदेश में 55580, ओडिशा में 52141, राजस्थान में 46572, बिहार में 45447, महाराष्ट्र में 44137, कर्नाटक में 33157, छत्तीसगढ़ में 20613 गाँव हैं.

वहीं अगर उन राज्यों की बात करें जहाँ कम गाँव हैं तो उनमें दमन और दीव में 101, दिल्ली में 222, सिक्किम में 454, पुड्डुचेरी में 122 और केरल में 1664 गाँव हैं.

हालांकि सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के संजय कुमार कहते हैं कि गाँवों में सोशल डिस्टेंसिंग शहरों के मुक़ाबले ज़्यादा आसान है, क्योंकि शहरों में आबादी घनी होती और गाँवों में कम लोग रहते हैं.

2001 की जनगणना के आँकड़े भी ऐसा ही बताते हैं, जिनके मुताबिक़, क़रीब डेढ लाख गाँव में महज़ 500 से 999 के बीच आबादी है.

वहीं क़रीब एक लाख तीस हज़ार गाँव में 100 से 1999 के बीच लोग रहते हैं. 1.28 लाख गाँव में 200 से 499 तक लोग रहते हैं. वहीं क़रीब चार हज़ार गाँव ऐसे भी हैं, जहां 10 हज़ार या उससे ज़्यादा लोग रहते हैं.

लेकिन चुनौतियाँ क...

हालांकि संजय कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा कि इसके बावजूद गाँव में ज़्यादा बड़ी चुनौती इसलिए है क्योंकि शहरों में लोग सेंसिटाइज़ेशन की बात को ज़्यादा अच्छे से समझ पा रहे हैं. "इसमें शिक्षा की भी एक भूमिका है. चाहे सोशल डिस्टेंसिंग की बात हो, हाथ धोने की बात हो, मास्क पहनने की बात हो, अगर गाँवों और शहरों की तुलना करें तो इस मामले में गाँव कहीं पिछड़ा हुआ दिखाई पड़ेगा."

वो कहते हैं, "कई गाँव तो ऐसे हैं जहां पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है, उन गाँवों में लोगों से ये उम्मीद करना कि आप जब भी घर से बाहर जाएं और आएं तो वापस आकर साबुन से हाथ धोएं. गाँवों में कई घरों में तो साबुन जैसी चीज़ ही नहीं होगी, सैनिटाइज़र तो दूर की बात है. इसलिए हाथ धोने, मास्क पहनने, सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करने जैसे कोरोना से बचने के बेसिक तरीक़ों का गाँवों में इस्तेमाल कर पाना शहरों की तुलना में मुश्किल होगा."

हालांकि शहरों से गाँवों की तरफ लौट रहे लोगों का अंदर आने से पहले ही टेस्ट किया जा रहा है. कई राज्यों के अधिकारियों ने ग्राम सभाओं से कहा है कि वो वापसी कर रहे मज़दूरों को गाँवों में सीधे आने और लोगों से मिलने से रोकें. उन्हें गाँव के बाहर स्कूलों और खेतों में भी अलग-थलग करके रखा जा रहा है.

लेकिन संजय कुमार कहते हैं कि कई बार बेसिक टेस्ट होने पर संक्रमण का पता नहीं चलता है और लक्षण आने में 12 या 14 दिन का समय लग जाता है. कुछ लोग पैदल या साइकिल से घर निकल गए हैं, वो सीधे अपने घर पहुँच रहे हैं. ऐसे में अगर कुछ लोग संक्रमित हुए और उनकी वक्त पर जाँच नहीं हुई, उन्हें क्वारंटाइन नहीं किया गया तो ग्रामीण भारत में संक्रमण के फैलने की दर बढ़ जाएगी.

निपटने की क्या तैयारी?

ग्रामीण भारत में इस चुनौती से निपटने के लिए क्या तैयारी की गई है?

इस सवाल के जवाब में डॉ रवि शर्मा कहते हैं कि इसके लिए आशा कार्यकर्ताओं और ग्राम स्‍वास्‍थ्‍य और स्‍वच्‍छता समि‍ति (वीएचएससी) की मदद ली जा रही है. अगर उन्हें लोगों में कोई लक्षण दिखते हैं तो वो तुरंत राज्य के स्वास्थ्य विभाग को जानकारी देंगे. जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग कार्रवाई करेगा.

जो गाँव ज़्यादा दूर-दराज़ के हैं, उन्होंने बताया कि वहां मेडिकल मोबाइल वैन भेजी जा रही है. इसमें मौजूद डॉक्टर लोगों की स्क्रीनिंग करते हैं.

इसके अलावा उनके मुताबिक़, हाइ-रिस्क ग्रुप पर खास तौर पर निगरानी रखी जा रही है, जिनमें बुज़ुर्ग और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोग शामिल हैं. उन लोगों में अगर लक्षण दिखते हैं तो उन्हें तुरंत डेडिकेटेड सेंटर में ले जाया जाएगा और वहां उनके सैंपल लेने की सुविधा की जाएगी.

गांवों में बुज़ुर्ग ज़्यादा, इसलिए कोरोना का ख़तरा ज़्यादा

ग्रामीण भारत में कोरोना का ज़्यादा ख़तरा इसलिए भी है, क्योंकि वहां शहरों के मुकाबले रहने वाले बुज़ुर्ग या 60 से ज़्यादा उम्र के लोगों की संख्या ज़्यादा है.

ये बीमारी बुजुर्गों में ज़्यादा ख़तरनाक होती है. ऐसे में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी बार-बार 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को घर में रहने की सलाह भी दी है.

सांख्यिकी मंत्रालय की रिपोर्ट 'एलडर्ली इन इंडिया 2016' के मुताबिक़ 71 प्रतिशत बुज़ुर्ग गाँवों में रहते हैं.

स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चिंता

संजय सिंह ग्रामीण इलाक़ों की स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चिंता जताते हैं.

वो कहते हैं, "शहर में अगर किसी को कोई संदेह होता है और लक्षण दिखाई पड़ते हैं तो आप अस्पताल में जा सकते हैं. चेकअप करा सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर आपको आइसोलेशन में रख दिया जाएगा. लेकिन हर गाँव में तो जाँच की सुविधा होने की संभावना ही नहीं है. तो जाँच नज़दीक के शहर में होगी और गाँव से नज़दीक के शहर में जाने की प्रक्रिया में भी कई बार घंटों लग जाते हैं. तो हो सकता है व्यक्ति आज ना जाकर कल जा पाए या दो तीन दिन बाद जा पाए."

"अगर कोई संक्रमित पाया गया तो शहरों में आइसोलेशन की प्रक्रिया कर पाना मुमकिन है, क्योंकि अगर आपके पास घर में जगह नहीं है तो शहर में सेंटर बने हुए हैं, आप सरकार के सेंटर में जाकर आइसोलेशन में रह सकते हैं. आपको क्वारंटाइन किया जा सकता है. लेकिन हर गाँव में इस तरह की व्यवस्था नहीं होगी. पहले तो गाँव में ऐसे किसी को ले जाना और भर्ती कराना सोशल टैबू होगा. इसलिए लोग आसानी से तैयार नहीं होंगे और अगर तैयार नहीं हुए और उन्हें समय पर ले जाया नहीं गया तो वहां बीमारी फैलने की संभावना शहर के मुक़ाबले तेज़ रहेगी."

पब्लिक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर

ग्रामीण भारत के लिए कोरोना वायरस कितनी बड़ी चुनौती हो सकती है, ये समझने के लिए ग्रामीण भारत के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी नज़र दौड़ानी होगी.

नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल 2019 में जारी किए गए आँकड़ों को देखें तो पाएंगे कि देश में क़रीब 26,000 सरकारी हॉस्पिटल हैं. इनमें से ज़्यादातर 21,000 ग्रामीण इलाकों में हैं.

आँकड़ों की ये तस्वीर देखने पर तो राहतभरी लग सकती है, लेकिन सच्चाई ये है कि मरीज़ और उपलब्ध बेडों की संख्या का अनुपात बेहद चिंताजनक है.

औसत देखा जाए तो पूरे देश में हर 1,700 मरीज़ों के लिए सिर्फ़ एक बेड मौजूद है. ग्रामीण क्षेत्रों में हर बेड पर मरीज़ों की संख्या काफ़ी बढ़ जाती है. इन इलाक़ों में हर एक बेड पर 3,100 मरीज़ आते हैं.

इस रिपोर्ट के आँकड़ों के हिसाब से देखें तो अगर कोरोना वायरस के मामलों में बढ़ोतरी जारी रही तो भारत के ग्रामीण इलाक़ों में आने वाले मरीज़ों के लिहाज से पर्याप्त बेड नहीं होंगे.

बिहार की हालत सबसे ख़राब

अगर हर राज्य की आबादी के हिसाब से बेडों की संख्या की तुलना करें तो बिहार की हालत सबसे ख़राब नज़र आती है.

2011 की जनगणना के मुताबिक, बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में क़रीब 10 करोड़ लोग रहते हैं. हर बेड पर क़रीब 16,000 मरीज़ हैं. इस तरह से बिहार हर 1,000 लोगों पर सबसे कम बेड वाला राज्य है.

तमिलनाडु इस मामले में सबसे अच्छी स्थिति में है. राज्य के ग्रामीण इलाक़ों में कुल 40,179 बेड हैं और कुल 690 सरकारी हॉस्पिटल हैं. इन आँकड़ों के मुताबिक़, तमिलनाडु में हर बेड पर क़रीब 800 मरीज़ हैं.

गांवों में डॉक्टर कितने हैं?

रूरल हेल्थ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक़, ग्रामीण भारत में हर 26,000 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर मौजूद है.

जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) के नियम के मुताबिक़, डॉक्टर और मरीज़ों का यह अनुपात हर 1,000 मरीज़ पर 1 डॉक्टर का होना चाहिए.

राज्यों की मेडिकल काउंसिलों और मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एमसीआई) के यहां रजिस्टर्ड एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या क़रीब 1.1 करोड़ है.

यह आँकड़ा बताता है कि भारत के ग्रामीण इलाक़े न तो हर मरीज़ को बेड मुहैया करा सकते हैं न ही इनमें पर्याप्त संख्या में डॉक्टर हैं जो हर मरीज़ को अटेंड कर सकें.

जिस तरह से हज़ारों प्रवासी मज़दूर अपने घर पहुंच रहे हैं, ऐसे में अगर मामले ज़्यादा बढ़े तो ग्रामीण स्वास्थ्य सिस्टम के लिए इसे संभालना बड़ी चुनौती होगी.

आशा वर्कर

कोरोना संकट के इस दौर में ग्रामीण भारत के अंदर आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका काफ़ी अहम है.

उन्हें अपने-अपने ग्रमीण इलाक़ों की सेहत मॉनिटर करने का काम सौंपा गया है. आशा कार्यकर्ता नियमित रूप से 100 घरों तक में जाती हैं और लोगों की स्वास्थ्य जानकारी इकट्ठा करती हैं और कोविड-19 के मामले या संदिग्ध मामले के बारे में राज्य को बताती हैं.

लेकिन बहुत-सी आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस दौरान उनके पास ख़ुद की सुरक्षा के लिए उपकरण नहीं होते. साथ ही इन सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह भी काफ़ी कम होती है.

मार्च 2019 तक के सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, देश में कुल नौ लाख 29 हज़ार 893 आशा वर्कर हैं.

क्रिटिकल केयर 'ज़ीरो'

संक्रमित व्यक्ति की हालत अगर गंभीर हो जाती है तो उसे क्रिटिकल केयर यानी आईसीयू की ज़रूरत पड़ेगी.

तो ग्रामीण भारत में क्रिटिकल केयर की क्या सुविधा है? इसके जवाब में इंडियन सोसाइटी ऑफ़ क्रिटिकल केयर के अध्यक्ष ध्रुव चौधरी कहते हैं कि इसका एक शब्द में जवाब है- 'ज़ीरो'.

वो विस्तार से बताते हैं, "ग्रामीण इलाक़ों में क्रिटिकल केयर की कोई सुविधा नहीं है. हां, लेकिन अगर पास में कोई मेडिकल कॉलेज है तो वहां ये सुविधा हो सकती है. सरकारी अस्पतालों में तो ये सुविधा नहीं मिलेगी. वहां आपको बेसिक हेल्थकेयर मिल जाए, तो वही बड़ी बात है. क्रिटिकल केयर आपको टियर 1, 2 और 3 शहरों में ही मिलेगी, वो भी डोमिनेंटली प्राइवेट सेक्टर में. पब्लिक सेक्टर में क्रिटिकल केयर देशभर के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट में मिलती है. या फिर एम्स, पीजीआई जैसे बड़े अस्पतालों में."

उनके मुताबिक़, देश में जितने वेंटिलेटर मौजूद हैं. उनमें से अधिकतर मेट्रो शहरों, मेडिकल कॉलेजों और प्राइवेट अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं.

ध्रुव चौधरी कहते हैं कि हालांकि वेंटिलेटर से ज़्यादा ऑक्सीजन सप्लाई की ज़रूरत है. "वेंटिलेटर की पाँच प्रतिशत लोगों को ज़रूरत पड़ेगी."

उनके मुताबिक़, हमारी पहली प्राथमिकता है डायग्नोसिस, दूसरा ज़रूरी है कि पर्याप्त ऑक्सीजन हो, तीसरा पर्याप्त सपोर्टिव स्टाफ और दवाइयां मिल जाएँ.

वो कहते हैं कि ऑक्सीजन स्पलाई की सीएचई यानी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में व्यवस्था करनी पड़ेगी. साथ ही पास के छोटे शहरों में स्थित प्राइवेट अस्पतालों में भी व्यवस्था करनी होगी.

रूरल हेल्थ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक़ देशभर में 5335 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं और एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र औसतन 120 गाँवों या कहें कि क़रीब 560 स्क्वायर किलोमीटर के ग्रामीण इलाक़े को कवर करता है.

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