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हथिनी की मौत: विस्फोटकों से भरे अनानास केरल में नई बात नहीं हैं
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिन्दी के लिए
अनानास या मीट में हल्के विस्फोटक पैक करके जानवरों को खेतों में आने से रोकना केरल के स्थानीय इलाक़ों में काफ़ी प्रचलित है. इसे मलयालम में 'पन्नी पड़कम' कहा जाता है जिसका मतलब है ''पिग क्रैकर''.
ये विस्फोटक स्थानीय स्तर पर ही बनाई गई सामग्री या त्योहारों में इस्तेमाल होने वाले पटाख़ों से तैयार किया जाता है.
वाइल्डलाइफ़ एक्सपर्ट्स का मानना है कि विस्फोटक और अलग-अलग तरह के जाल का इस्तेमाल सिर्फ़ केरल में ही नहीं पूरे भारत में किया जाता है.
वाइल्डलाइफ़ साइंस कॉलेज ऑफ़ फॉरेस्ट्री के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉ. जैकब चीरन ने बीबीसी हिन्दी को बताया, ''यह हाथियों के लिए नहीं होता. ये मुख्यरूप से जंगली सुअरों के लिए होता है जो खेतों में घुसकर फ़सलें तबाह कर देते हैं. यह कोई नई बात नहीं है.''
केरल में पल्लकड़ ज़िले के मन्नारकड़ में विस्फोटक से भरा अनानास खाने की वजह से एक गर्भवती हथिनी की मौत हो गई जिससे पूरे देश में लोग ग़ुस्से में हैं. केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने गुरुवार को ट्वीट करके बताया कि इस मामले में जाँच जारी है और इसका फोकस 'तीन संदिग्धों' पर है.
एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी हिन्दी से कहा, ''फ़िलहाल हम दो संदिग्धों से पूछताछ कर रहे हैं. हमने अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं की है.''
फ़सलें बचाने का क्या उपाय?
इसी तरह की एक घटना में क़रीब 18 साल पहले एक हाथी बुरी तरह घायल हो गया था और उसके मुंह में गंभीर जख़्म आए थे. डॉ. चीरन ने उसका ऑपरेशन किया था.
उस वक़्त डॉ. चीरन के साथ अनुभवी पशु चिकित्सक प्रो. केसी पणिक्कर और डॉ. पीबी गिरिदास भी थे जिन्होंने हाथी को ट्रैंक्विलाइज़ किया था.
डॉ. चीरन कहते हैं, ''हम हाथी को बचा नहीं पाए क्योंकि जब ऊपर और नीचे दोनों जबड़े बेहद बुरी तरह जख़्मी हों तो कोई भी जानवर नहीं बच सकता.''
इस तरह विस्फोटक का शिकार हुए हाथियों से जुड़ी आख़िरी घटना अप्रैल में हुई थी जब 8 या 9 साल का एक हाथी कोल्लम ज़िले के पुनालुर फॉरेस्ट डिविजन में पठानपुर के पास विस्फोटक के संपर्क में आया था.
केरल के पूर्व मुख्य वन पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. ईके ऐस्वरन ने बीबीसी हिन्दी को बताया, ''इस तरह हाथियों का मरना आसान नहीं है. लोग जंगली सुअरों को भगाने के लिए ऐसे तरीक़े इस्तेमाल करते हैं. आमतौर पर हाथी कॉफ़ी या दूसरे पौधों को नुक़सान नहीं पहुंचाते. वो सिर्फ़ धान और केले की फ़सलों का रुख़ करते हैं.''
डॉ. ऐस्वरन कहते हैं, ''जंगली सुअर हर तरफ़ हैं लेकिन आजकल हमें जंगली सुअरों के घायल होने की घटनाएं कम ही दिख रही हैं. हाल ही में हाथियों के मरने की घटनाएं बड़ा हादसा हैं. पठानपुरम की घटना में जो विस्फोटक इस्तेमाल हुआ था वो स्थानीय स्तर पर बनाया गया था.''
लेकिन क्या जानवरों से फ़सलें बचाने के लिए सिर्फ़ विस्फोटक ही एक मात्र उपाय है?
इस सवाल पर वाइल्डलाइफ़ फ़र्स्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी प्रवीण भार्गव ने कहा, ''बिल्कुल नहीं. ऐसी कई तरह की चीज़ें हैं जिन्हें बतौर विस्फोटक अंधाधुंध रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा कई तरह के जाल, जबड़े फंसाने वाले जाल, गड्ढे खोदकर बनाए गए जाल और नुकीले जाल भी शामिल हैं. इसके अलावा पौधों पर लगाए जाने वाले कुछ ज़हरीले पदार्थ भी होते हैं जिन्हें कुछ ख़ास लोग ही बनाते हैं. देशभर में इस तरह शिकार का काम बड़े स्तर पर हो रहा है.''
भार्गव इन सभी तरीक़ों और विस्फोटकों के इस्तेमाल को ''साइलेंट किलर'' कहते हैं. यह हाइपरटेंशन की तरह है. अगर गोली चलने की आवाज़ आती है तो गार्ड पता लगाने के लिए उस दिशा की ओर भागेंगे जहां से आवाज़ आई है लेकिन ये साइलेंट हथियार हैं, किसी को इस बारे में पता नहीं चलता. यह सिर्फ़ केरल में ही नहीं, पूरे भारत में बड़े स्तर पर हो रहा है.
इंसानों और वाइल्डलाइफ़ के बीच बढ़ता संघर्ष
इस समस्या की वजह बताते हुए वो कहते हैं, ''जंगल कम होते जा रहे हैं जिससे वाइल्डलाइफ़ और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे यहां ज़मीन के इस्तेमाल को लेकर विशेष नीति नहीं है. हमारे पास ऐसी नीति नहीं है जिससे तय किया जा सके कि जिनको सामाजिक न्याय की ज़रूरत है उन्हें सुविधाएं देकर जंगलों से दूर किया जा सके. उन्हें भी सुरक्षित रहने की ज़रूरत है और जानवरों को भी. इसे लैंडस्केप प्लानिंग कहते हैं जो कि नहीं हो रही.''
प्रवीण भार्गव कहते हैं, ''दो तरह के ख़तरे हैं- पहला शिकार और इस तरह के हथियारों का इस्तेमाल. मौजूदा क़ानून स्थिति से निपटने के लिए काफ़ी है. इसे सही से लागू न करना समस्या है. दूसरी समस्या है हम किस तरह जंगली जानवरों की जगहों पर क़ब्ज़ा कर रहे हैं और इंसानों के दबाव की वजह से उनके आशियाने उजड़ रहे हैं.'' वो यह भी मानते हैं कि इस संघर्ष की समस्या को कम किया जा सकता है लेकिन पूरी तरह ख़त्म नहीं किया जा सकता.
हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने एक साथ कई ट्वीट किए और कहा, ''हम इंसानों और जंगली जीवों के बीच बढ़ रहे संघर्ष की घटनाओं के कारण जानकर उन्हें सुलझाने की कोशिश करेंगे. जलवायु परिवर्तन भी शायद स्थानीय समुदायों और जानवरों पर काफ़ी असर डाल रहा है.''
बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी का नाम लिए बिना मुख्यमंत्री ने एक और ट्वीट किया. उन्होंने लिखा, ''हमें इस बात का दुख है कि इस त्रासदी को भी कुछ लोगों ने नफ़रत भरे अभियान के तौर पर इस्तेमाल किया. बेवजह की झूठी बातें बनाई गईं और सच को दबाने के लिए अधूरी बातें फैलाई गईं. कुछ ने तो इसके ज़रिए कट्टरता को बढ़ाने की कोशिश की. यह ठीक नहीं है.''
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, ''केरल वो समाज है जहां अन्य के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ का सम्मान होता है. इस बारे में अगर कुछ स्पष्ट है तो वह ये है कि अब हम अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ों को सुन सकते हैं. चलिए हम सब मिलकर सभी तरह के अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ते हैं. कहीं भी, कभी भी.''
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