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कोरोना काल में कैसे बदल रही है उत्तर प्रदेश की राजनीति
- Author, प्रोफ़ेसर बद्री नारायण
- पदनाम, समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों एक बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रही है. ये बदलाव सत्ता पक्ष की राजनीति में न होकर विपक्ष की राजनीति में हो रहा है.
विपक्ष की राजनीति का यह उथल-पुथल एवं हलचल की प्रक्रिया यूं तो कोरोना महामारी के समय के आरम्भ होने के पहले ही हो चुकी थी, किन्तु कोरोना काल में वायरस को रोकने के लिए हो रहे प्रयासों, चिकित्सकीय तैयारी एवं लॉकडाउन से उत्पन्न संकटों के इर्द-गिर्द खड़े हुए राजनीतिक विमर्शों के बाद इस प्रक्रिया में और तेजी आई है.
कोरोना संकट की शुरुआत होने के बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी अपने पत्रों, ट्विटर संवादों, ऑनलाइन गतिविधियों से कोरोना संकट में मजबूर सामाजिक समूहों के प्रश्न उठाकर सत्ता के समक्ष अनेक सुझाव एवं सलाह उठाती रही हैं.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ उनके अनेक सुझावों पर प्रतिक्रिया भी करते रहे हैं.
एक प्रखर विपक्ष एवं सक्रिय सत्ता पक्ष का संवाद जनतंत्र के विकास के लिए बेहतर ही था.
कोरोना संकट
कोरोना संकट में मजलूमों, मजदूरों, प्रवासी श्रमिकों के लिए कल्याणकारी नीतियों एवं सेवा कार्य पर सहमति होने के बावजूद 'बस विवाद' पर सत्ता पक्ष एवं प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में काँग्रेस में अभी हाल ही में अन्तर्विरोध तेज हुआ है.
किन्तु इस पूरी प्रक्रिया में बीजेपी एवं काँग्रेस ने ही जनचर्चाओं में अपनी उपस्थिति दर्शायी है.
बसपा प्रमुख मायावती उत्तर प्रदेश में विपक्ष का एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावी स्वर रही हैं.
लेकिन कोरोना संकट के दिनों में वे ज्यादा सक्रिय होकर अपनी उपस्थिति नहीं दर्ज करा पाई हैं. उत्तर प्रदेश में एवं पूरे देश में प्रवासी मजदूरों का मुद्दा इस वक्त राजनीतिक विमर्शों के केन्द्र में हैं.
लेकिन इस मुद्दे पर मायावती कभी-कभी ही बोलती हैं. प्रवासी मजदूरों में ज्यादा संख्या दलित एवं पिछड़े सामाजिक समूहों से आने वाले लोगों की हैं.
मायावती जिनकी राजनीति का बेस वोट दलित उपेक्षित एवं पिछड़े रहे हैं, वे इस पर मुखर क्यों नहीं हैं?
राजनीति में नया विमर्श
यह प्रश्न राजनीतिक हलकों में बार-बार उठ रहा है. मेरी समझ से इसका मुख्य कारण है- कोरोना संकट के दिनों में राजनीति में नये विमर्श एवं नई भाषा से ताल मेल बिठाने के लिए पहल करने में उनका विलम्ब.
वस्तुतः इस समय में वायरस को रोकने के प्रयास, इसके इर्द-गिर्द जीवन बचाने की तैयारी एवं लॉकडाउन में संकट झेल रहे समुदाय राजनीतिक विमर्शों के केन्द्र में आते जा रहे हैं. इन दिनों राजनीति की भाषा में नया बदलाव आ रहा है.
राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में श्रमिक, मजदूर, जैसे वर्गीय कोटियाँ आती जा रही हैं. दलित एवं पिछड़े जैसे जाति आधारित कोटियाँ इन्हीं के हिस्से के रूप में शामिल मानी जा रही हैं.
मायावती राजनीतिक भाषा में हो रहे इस नये बदलाव से अपने को जोड़ नहीं पा रहीं हैं. फलतः श्रमिक, प्रवासी मजदूर जैसे सामाजिक समूहों के प्रश्न तो वे उठा रही हैं, किन्तु उन्हें अपनी आज की राजनीति में प्रभावी आवाज वे नहीं बना पा रही हैं.
कांग्रेस से नाराज़ मायावती
वे इसे समझने में कहीं चूक कर रही हैं कि कैसे कोरोना संकट में दुख झेल रहे अपने बेस वोट के एक भाग को मरहम लगाया जाए.
वहीं काँग्रेस कोरोना संकट के पहले से ही अपनी राजनीति के गरीब, मजदूर, देहड़ी-पट्टी, दिहाड़ी श्रमिकों के प्रश्नों से अपने को जोड़ने लगी थी.
इस वैश्विक महामारी के बाद जब भारतीय समाज में मजदूरों एवं प्रवासी श्रमिकों का संकट खड़ा हुआ, तो उसे अपनी राजनीति को इनके प्रश्नों से जोड़ने में आसानी हुई.
प्रवासी श्रमिक, मजदूर जिनका एक बड़ा हिस्सा उपेक्षित एवं अनुसूचित जाति के सामाजिक समूहों से आता है, उनके कांग्रेस की तरफ झुकने की आशंका शायद मायावती को तंग कर रही है.
शायद इसीलिए वे बीजेपी से ज्यादा काँग्रेस पर हमलावर नजर आती हैं. वैसे भी दलित एवं अनुसूचित जातियों का यह वर्ग बसपा के उभार के पहले काँग्रेस का वोट बैंक रहा है.
युवा दलित नेता
ऐसे में उनकी अनुभूतियों एवं स्मृतियों में काँग्रेस अभी भी शामिल है.
अतः मायावती के लिए 'आधार मत' (बेस वोट) की राजनीति के सन्दर्भ में अगर सोचें तो उन्हें बीजेपी से ज्यादा काँग्रेस से खतरा महसूस होता है.
इसी लिए 2017 में हुए उत्तरप्रदेश के विधान सभा चुनाव के दिनों एवं 2019 के लोक सभा चुनाव के अपने प्रचार अभियानों में भी वे काँग्रेस पर काफी हमलावर रही है.
प्रियंका गाँधी उत्तर प्रदेश में उभर रहे युवा दलित नेता चन्द्रशेखर के प्रति झुकाव रखती भी दिखती हैं. यह भी मायावती जी को नागवार गुजरता है.
किन्तु इधर काँग्रेस मजदूरों, अप्रवासी श्रमिकों, असंगठित क्षेत्र के कामगार वर्गों के प्रश्नों एवं उनके इर्द-गिर्द अपनी राजनीति को प्रखर कर विपक्ष की राजनीति में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रही है.
उत्तर प्रदेश की विपक्ष की राजनीति में कोरोना संकट के दिनों में चल रहे सक्रिय हस्तक्षेपों एवं सेवा कार्य की राजनीति में एक तरफ काँग्रेस सक्रिय होकर उभर रही है.
आगामी चुनाव
दूसरी तरफ बसपा प्रमुख मायावती एवं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की 'नॉर्मल-रूटीन उपस्थिति' उत्तर प्रदेश में विपक्ष की राजनीति में नये समीकरण विकसित कर रहा है.
यह अब पूरी तरह त्रिकोणात्मक होता जा रहा है. सम्भव है आगामी चुनावी जनतांत्रिक राजनीति में आधार वोटों में अदल-बदल की प्रक्रिया तेज हो.
किन्तु अगर उत्तर प्रदेश में विपक्ष समान रूप से त्रिकोणात्मक होता जाएगा तो इसके मुकाबले में खड़े भारतीय जनता पार्टी की केन्द्रीयता एवं चुनावी शक्ति में इज़ाफा हो सकता है.
सत्ता में होने का लाभ तो उसे मिलेगा ही. योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक सक्रियता का लाभ भी बीजेपी को मिल सकता है.
देखना यह है कि उत्तर प्रदेश के विपक्ष में कौन राजनीतिक दल इस उथल-पुथल से निकल उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुकाबले में अपनी प्रभावी उप स्थिति का दावा मजबूती से कर पाता है.
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