कोरोना लॉकडाउन: 'भूख से मौत तो नहीं हुई पर एक पहर ही खा पा रहे हैं': ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, जोनाकी मंडल गांव (असम), बीबीसी हिंदी के लिए

"क्वारंटीन के नाम पर पहले 14 दिन अस्पताल में रखा. उसके बाद घर आए तो फिर 14 दिन के लिए होम क्वारंटीन कर दिया. हम मज़दूर हैं. हमारे पास खाने के लिए जमा पैसा थोड़े ही रखा है जो काम नहीं भी करेंगे तो परिवार का पेट चलते रहेगा. आप देखिए मेरे 9 महीने के बच्चे को सिर्फ़ चावल उबाल कर खिला रहे हैं. अगर काम नहीं मिला तो हम सबको भूखा मरना पड़ेगा."

मणिपुर से अपने घर असम लौटे 22 साल के प्रवासी मज़दूर संजय कुर्मी जब ये बातें कहते हैं तो उनके चेहरे पर मायूसी और परेशानी दोनों दिखने लगती है.

भारत में कोरोना वायरस के चलते जारी लॉकडाउन के कारण हज़ारों की तादाद में मज़दूर अपने-अपने घर लौट रहे हैं. बीते कुछ दिनों से देश के अलग-अलग हिस्सों में मज़दूरों के घर लौटने की जो तस्वीरें सामने आई हैं उसके सामने सरकारी इंतज़ामों के दावे काफ़ी कमज़ोर लगते हैं. घर पहुंचे अब इन मज़दूरों की सबसे बड़ी चुनौती रोजी-रोटी कमाने की है और इसके लिए उन्हें अपने ही क्षेत्र में काम मिलना होगा.

असम के जोरहाट ज़िले के जोनाकी मंडल गांव के रहने वाले संजय कुर्मी मज़दूरी करने मणिपुर गए थे लेकिन बीते मार्च में लॉकडाउन शुरू होने से ठीक दो-तीन दिन पहले उनके ठेकेदार ने काम पूरा होने की बात कहते हुए उन्हें घर लौट जाने के लिए कह दिया.

मणिपुर में संजय के साथ उन्ही के गांव के छोटू मोइना कुर्मी भी काम कर रहे. ठेकेदार की बात सुनने के बाद दोनों नागालैंड होते हुए अपने घर लौट आए.

"मेरी पत्नी को पहली बार मज़दूरी करने जाना पड़ा"

मणिपुर में मज़दूरी करने और अपने घर लौटने से जुड़ी परेशानियों के बारे संजय ने बीबीसी से कहा, "मैं पहले गांव के आसपास इलाकों में ही मज़दूरी करता था. लेकिन यहां एक दिन काम मिलता था तो दो दिन घर पर बैठना पड़ता था. दिहाड़ी भी बहुत कम मिलती थी. फिर मैं एक ठेकेदार की मदद से मणिपुर काम करने चला गया. वहां एयरटेल कंपनी के एक प्रोजेक्ट में मज़दूरी कर रहा था और एक महीने में क़रीब 11 हज़ार रुपये कमा लेता था. लेकिन जब कोरोना वायरस को लेकर हल्ला हुआ तब कंपनी ने काम ख़त्म होने की बात कहते हुए हमें घर जाने के लिए कह दिया."

संजय कहते हैं, "घर लौटने के बाद जब आशा कर्मियों को इस बात का पता चला तो वे मुझे और छोटू मोइना को मेडिकल जांच के लिए तिताबर सरकारी अस्पताल ले गईं और वहां हमें 14 दिनों के लिए क्वारांटीन पर रखा गया. घर पर एक पैसा नहीं था. मेरे दोनों बच्चों को घर पर छोड़कर मेरी पत्नी को पहली बार ईंट भट्ठे में मज़दूरी करने जाना पड़ा. अगर वह उस दिन काम पर नहीं जाती तो मेरे बच्चों को भूखा रहना पड़ता."

सरकार ने किया है जॉब कार्ड देने का वादा, तो मिला क्या?

हाल ही में असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बाहरी राज्यों से लौटे प्रवासी मज़दूरों को जॉब कार्ड प्रदान करने के लिए सात दिन की समय सीमा तय की थी.

वित्त मंत्री ने कहा था, "कोविड-19 के चलते जारी लॉकडाउन के कारण जो मज़दूर देश के अन्य हिस्सों से लौट आए है उन्हें अगले सात दिन के भीतर जॉब कार्ड दिया जाएगा."

इसके साथ ही मनरेगा के तहत दिए जाने वाली दैनिक मज़दूरी को भी 182 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये कर दिया गया और प्रवासी मज़दूरों को अगले दो महीने तक प्रति व्यक्ति 5 किलो चावल देने का दावा भी किया गया.

राज्य सरकार की तरफ से किए गए इन तमाम दावों के बारे में संजय कहते हैं, "मुझे घर लौटे एक महीने से ज़्यादा हो गया लेकिन इस दौरान सरकार की तरफ से हमें कोई मदद नहीं मिली. एक बार स्थानीय पुलिस की तरफ से दो किलो आलू और एक किलो प्याज़ देकर गए थे. मुझे नहीं पता जॉब कार्ड कौन देगा और कब तक मिलेगा. अगर सरकार सही में मज़दूरों के बारे में सोच रही है तो हमारे लिए काम की व्यवस्था कर दें. हम मज़दूर है और काम करके खा लेगें. अगर जल्द ही काम नहीं मिला तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी."

"मुझे ईंट भट्ठे में मज़दूरी करने जाना पड़ा"

घर की ऐसी हालत पर संजय की पत्नी बीना कुर्मी कहती हैं, "मेरे पति जब मणिपुर में काम कर रहे थे तो वे हमें हर महीने छह हज़ार रुपये भेजते थे जिससे घर का खर्च आसानी से चल रहा था. लेकिन अब हमें काफी परेशानी हो रही है. बेटी पांच साल की है और बेटा 9 महीने का. हम तो भूखे रह जाएंगे लेकिन बच्चे तो खाना मांगते हैं."

वो कहती हैं, "जब मेरे पति को 14 दिन के लिए क्वारंटीन पर रखा गया, उस समय घर पर एक रुपया भी नहीं था. ऐसे में बच्चे बीमार पड़ जाते तो मैं क्या करती. इसलिए मुझे ईंट भट्ठे में मज़दूरी करने जाना पड़ा. वहां छह दिन काम करके 700 रुपये मज़दूरी मिली थी."

फिलहाल पास के ईंट के भट्ठे में गाड़ियां लोड और अनलोड करने का काम करने वाले संजय को दिनभर में 200 रुपये की कमाई हो जाती है. लेकिन यह काम उन्हें रोज़ नहीं मिलता.

लॉकडाउन ख़त्म होने के इंतज़ार में हैं मोइना

संजय के घर पर ही मौजूद छोटू मोइना कहते हैं, "लॉकडाउन के कारण हम बहुत परेशान है. मज़दूरी के लिए बाहर कहीं जा नहीं सकते और गांव में काम मिलता नहीं है. मणिपुर में काम करके दस 11 हज़ार रुपये महीने में कमा लेता था. कुछ पैसा खाना-खुराकी में खर्च होता था बाकि के रुपये घर भेज देता था. लेकिन अब पूरी तरह बेकार हो गया हूं. घर में बूढ़े माता-पिता और एक बहन है. काम नहीं मिलेगा तो घर का खर्च कैसे चलेगा?"

सरकार की तरफ से अब तक क्या मदद मिली है? इस सवाल के जवाब में छोटू मोइना कहते हैं, "मज़दूरों को जॉब कार्ड देने की बात सुनी थी लेकिन अभी तक कुछ नहीं मिला है. मेरी मां के नाम पर राशन कार्ड है और उसके तहत 30 किलो चावल मिलते हैं. इसके अलावा सरकार की तरफ़ से हमें कोई मदद नहीं मिली है."

संजय और छोटू मोइना को लॉकडाउन पूरी तरह ख़त्म होने का इंतजार है. दोनों का कहना है कि अगर सरकार ने गांव में काम की कोई व्यवस्था नहीं की तो वे फिर से बाहरी राज्यों में काम करने चले जाएंगे.

छोटू मोइना कहते हैं, "गांव में हमारे पास कोई काम नहीं है. दो ईंट के भट्ठे हैं जहां हम कई लड़के एक ट्रक ईंट लोड और अनलोड करते हैं तो दो सौ रुपये मिलते हैं. आप सोचिए दो सौ रुपये को चार-पांच लोग आपसे में बाटेंगे तो क्या हिस्से में आएगा. अगर लॉकडाउन पूरी तरह ख़त्म हो गया तो हम वापस दूसरे राज्यों में काम के लिए जाएंगे."

संजय कुर्मी के गांव जोनाकी मंडल पहुंचने के लिए धोदर अली रोड (मुख्य सड़क मार्ग) से महज दो किलोमीटर अंदर जाना पड़ता है.

लेकिन गांव की तरफ़ जाने वाली इस टूटी फूटी और बेहद ख़राब सड़क को देखने से विश्वास नहीं होता कि इस क्षेत्र से विधायक चुने जाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई 15 साल लगातार राज्य के मुख्यमंत्री रहें हैं.

पूरे गांव में केवल एक ही आदमी सरकारी नौकरी में!

जोनाकी मंडल गांव में सालों पहले आकर बसे बुजुर्ग किसान जगत सिंह कहते हैं, "हमारा गांव एक बाढ़ ग्रस्त इलाका है. बारिश के समय पूरा गांव बाढ़ के पानी में डूब जाता है. इसलिए यहां गिने-चुने लोग ही खेती करते हैं."

वो बताते हैं कि यहां क़रीब साढ़े तीन सौ परिवार हैं और लगभग प्रत्येक घर में ही लोग मज़दूरी करते हैं.

साथ ही वो यह भी कहते हैं कि गांव के काफी लोग बाहर के राज्यों में मज़दूरी करने गए हुए हैं.

जगत सिंह कहते हैं, "लॉकडाउन में कुछ लोग लौट आए हैं लेकिन काफी लोग अभी बाहर के राज्यों में ही फंसे हुए हैं. पूरे गांव में केवल एक लड़का सरकारी नौकरी करता है. बाकि अधिकतर युवक दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. काफी पहले जिन लोगों को सरकार ने जॉब कार्ड दिया था उनको ही काम नहीं मिल रहा है. नए जॉब कार्ड देने की बात तब अच्छी लगेगी जब लोगों को काम मिलेगा."

"बेरोज़गारी से लोग मारे जाएंगें"

सरकारी मदद को लेकर जगत सिंह थोड़ा निराश है. वह कहते हैं, "सरकार की तरफ़ से जो मदद मिलनी चाहिए थी अबतक नहीं मिली है. केवल बीच में एक दिन स्थानीय पुलिस की तरफ़ से 15 से 20 घरों में जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद ख़राब है उन लोगों को थोड़ा राशन बांटा गया था. लॉकडाउन के कारण गांव में हालात काफ़ी ख़राब हो गए हैं.

वे कहते हैं, "भूख से तो गांव में अब तक किसी की मौत नहीं हुई है लेकिन कई घरों में लोग दो टाइम की जगह अब केवल एक टाइम ही खाना खा पा रहें हैं."

"तरुण गोगोई हमारे इलाके के वर्तमान विधायक हैं लेकिन कोरोना वायरस से उत्पन्न हालातों का जायजा लेने वे एक बार भी यहां नहीं आए. जब वे प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो मैं गांव के कई लोगों के साथ गुवाहाटी जाकर उनके सरकारी आवास पर मिला था और गांव की तमाम समस्याओं से उन्हें अवगत कारया था लेकिन हमारे यहां कोई काम नहीं हुआ. मौजूदा बीजेपी सरकार का रवैया भी एक जैसा है. पता नही इस साल बाढ़ में हमारे गांव की क्या हालत होगी. कोरोना से पता नहीं लेकिन बेरोज़गारी और बाढ़ से हमारे गांव में जरूर लोग मारे जाएंगें."

असम सरकार की एक ताजा जानकारी के अनुसार अब तक बाहरी राज्यों से क़रीब 40 हज़ार लोग राज्य में लौटे हैं.

बीते 24 अप्रैल से क़रीब 3 लाख 67 हज़ार लोग दैनिक मज़दूरी में लगे हुए हैं.

हालांकि सरकार की तरफ से यह सुनिश्चित नहीं किया गया है कि इनमें कितने प्रवासी मज़दूर हैं.

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