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लॉकडाउन में झारखंड में बच्ची की मौत, परिवार ने बताया भूख से मरी बच्ची, प्रशासन का इनकार
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, लातेहार (झारखंड) से बीबीसी हिंदी के लिए
'गेलक नहाए. छूछे पेटे हइए हलक. मार देलक लूक. दू दिन से ना खइलक रहे. बोललक माई घूमल लगइत हउ. ओकरा बाग फेर कुछ न कहलक. शनिचरवे के घटना हई. खाना घर में रहले न रहे. गेली चाउर खोजे ओने. सोचली पईंचा खोजे. केकरो घर से मांग के बनबई. गेल तबतक दुर्घटना हो गेलक. खाना हइले न रलक, त का खियाऊ. तबीयत ओकर ना रलक खराब. भूखे वईसन भेल रहे. उ बहुते उल्टी कईले रलक. पानिये खाली.'
'वो नहाने गई थी. भूखे पेट. लू मार दिया. आकर बोली, सिर चक्कर खा रहा है. उसके बाद कुछ नहीं कह सकी. शनिवार की बात है. घर में खाना नहीं था. मैं चावल खोजने गई थी कि किसी से उधार मिल जाए. तबतक यह सब हो गया. खाना था ही नहीं तो क्या खिलाते. वह बीमार नहीं थी. भूख से यह सब हुआ. वो बहुत उल्टी कर रही थी. उल्टियां भी पानी की हो रही थी.'
कलावती देवी बीबीसी से यह कहते हुए कई दफ़ा खुद को रोने से रोकती हैं.
वे उस नेमनी कुमारी की मां है, जिसकी महज पांच साल की छोटी उम्र में मौत हो गई है. गांव के लोग, परिवार वाले और उपलब्ध साक्ष्य उसकी मौत भूख से होने की तस्दीक करते हैं. लेकिन, सरकार और उसके प्रशासनिक अमले को यह मौत भूख से नहीं होने (प्रथम दृष्टया) की बात पता चली है. हालांकि, इसकी सरकारी जांच रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है.
लातेहार के उपायुक्त (डीसी) जीशान कमर ने कहा है कि उन्हें इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट का इंतज़ार है हालांकि, पहली नजर में यह मामला भूख का नहीं लगता. उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह भूख से मौत का मामला इसलिए नहीं लगता क्योंकि उस परिवार को इसी महीने चावल देने की बात डाक्यूमेंटेड है."
इस परिवार के पास नेमनी की निशानी के तौर पर फटा हुआ फ्राक, आधार कार्ड और टिकट साइज एक तस्वीर है. इसमें वह पीले रंग का फ्राक पहनी है. बड़ी-बड़ी आंखें हैं और माथे पर चोटी. कलावती देवी ईंट-भट्ठे में काम करने वाले मजदूर जगलाल भुईयां की पत्नी हैं. इस दंपति के कुल आठ बच्चे हैं. छह बेटियां, दो बेटे. सबसे छोटी चंपा भी सिर्फ़ तीन महीने की है. नेमनी भाई-बहनों में पांचवे नंबर पर थी.
कलावती देवी से मैंने 3-4 बार बातचीत की. वे थोड़े दबाव में दिखीं. हमारी बातचीत के वक्त गांव के कई लोग वहां पहुंच गए और पुलिस जवान भी, जिन्हें नेमनी की मौत के अगले दिन से हेसातू में प्रतिनियुक्त कर दिया गया है. इसलिए मैंने उनके घर के कई चक्कर लगाए ताकि कुछ बातचीत अकेले में संभव हो.
यह गांव लातेहार जिले के मनिका प्रखंड की दोनकी पंचायत का हिस्सा है. मनिका प्रखंड कार्यालय परिसर में इन दिनों एक होर्डिंग लगा है. इसपर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की तस्वीर के साथ लिखा है - कोई ग़रीब भूखा न रहे. 4523 पंचायतों में 6103 मुख्यमंत्री दीदी किचेन.
करीब 200 घरों वाले हेसातू गांव में दलितों (भुईयां) की अच्छी आबादी है.
आधी रात घर आए बीडीओ साहब
नेमनी की मां कलावती ने बीबीसी को बताया कि शनिवार (16 मई) की शाम नेमनी की मौत के बाद रात 12 बजे मनिका के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) मेरे घर आए थे. वे पांच हज़ार रुपये, छह झोला चावल, दाल और नमक देकर गए हैं. उनके साथ कुछ और लोग थे.
तब मैं अपने घर में बच्चों के साथ थी. मेरे पति (जगलाल भुईयां) तब तक घर नहीं पहुंच पाए थे. वे अगली सुबह आए, उससे पहले ही नेमनी को दफ़नाया जा चुका था. मैं रातभर उसकी लाश के साथ थी.
कहां थे जगलाल भुईयां
नेमनी के पापा और कलावती देवी के पति जगलाल भुईयां लातेहार के सासंग इलाक़े में उलकट्ठा स्थित एक ईंट-भट्ठा में ईंट पाथते हैं. वे वहीं रहते हैं. उन्हें 1000 ईंटें पाथने (बनाने) के बाद 600 रुपये का मेहनताना मिलता है. अभी ये पैसे नहीं मिले हैं. क्योंकि, पैसों का हिसाब सीजन (काम) ख़त्म होने के बाद एकमुश्त किया जाता है. उनके पास न तो राशन कार्ड है और न मनरेगा का जॉब कार्ड.
तीन भाईयों में सबसे बड़े जगलाल के पास संपति के नाम पर दो कमरों का एक टूटा खपरैल घर है. इनमें अरगनी (तार) पर लटके कुछ कपड़े हैं. एक गंदी-सी मशहरी. गेनरा (पुराने कपड़ों से बना गद्दा), चटाई, अल्युमिनियम के कुछ बरतन, टूटी झाड़ू और मास्क (नया-नया मिला है) है. इन बरतनों में मोटे दाने वाले चावल से बना भात भी रखा है. जब हम उनके घर गए तो उनकी बेटियां वही खा रही थीं.
वे भूमिहीन हैं. उनके पिता का देहांत हो चुका है. मां छोटे भाई के साथ रहती हैं.
जगलाल भुईयां ने बीबीसी से कहा, "मैं और मेरा छोटा भाई एक ही जगह काम करते हैं. होली में घर आए थे, तब नेमनी ठीक थी. इतवार (रविवार, 17 मई) को ठेकेदार दोचकवा (बाइक) से गांव लेकर आए, तो हम उसकी लाश भी नहीं देख सके. शनिचर (शनिवार) को ठेकेदार के नंबर पर मेरी वाइफ़ ने फ़ोन करवाया, तब हमको नेमनी के मरने की बात पता चली. कोई साधन नहीं था. इसलिए आने में देर हुई."
ज्यां द्रेज का तर्क
मशहूर अर्थशास्त्री व सोशल एक्टिविस्ट ज्यां द्रेज और उनक टीम के पचाठी सिंह व दिलीप रजक इस मौत की सूचना के बाद से हेसातू में हैं. इनकी टीम अभी गांव के लोगों का मनरेगा जॉब कार्ड और मनरेगा के तहत काम मांगने का आवेदन इकट्ठा कर रही है, ताकि उसे प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाकर गांव के लोगों को रोज़गार दिलाया जा सके. इस टीम ने नेमनी की मौत से जुड़े तथ्यों की जांच के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट भी जारी की है.
भूख से हुई मौत
ज्यां द्रेज ने बीबीसी से कहा, "देखिए, मेन फैक्ट ये है कि यह परिवार अति ग़रीब है. उनके घर में कुछ भी नहीं है. खाने के लिए उनके पास कुछ खास नहीं है. इधर-उधर से मांग के खाते हैं. उस स्थिति मे कभी भी किसी को कुछ हो सकता है. यह समझना मुश्किल नहीं है. सिर्फ़ इस परिवार की बात नहीं है. इस गांव में मुझे 30 वैसे परिवार मिले हैं, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. उन्हें कोई अनाज नहीं मिला है इसका मुझे दुख है. ये सबलोग दलित हैं."
बकौल ज्यां द्रेज, सिमैंटिक डिबेट में जाने की ज़रुरत नहीं है. फैक्ट ये है कि यह मौत भूख से हुई है. इसमें स्थानीय प्रशासन, केंद्र और राज्य सरकार का टोटल फेल्योर है. केंद्र सरकार के पास इतना सारा अनाज है, फिर इनलोगों को क्यों नहीं मिल रहा है. राज्य सरकार भी अनाज दे सकती है. उसने ऐसा वादा भी किया है. लेकिन इसका कोई सिस्टम नहीं है.
समाधान क्या है
ज्यां द्रेज ने कहा, "ऐसे लोगों को टेम्पररी राशनकार्ड देकर उन्हें अनाज दिया जाए. उनका राशन कार्ड बनाया जाए. हर महीने समय पर प्रति व्यक्ति दस किलो अनाज दिया जाए. ताकि, कोई और भूख से नहीं मरे. यह आसान-सा उपाय है."
डीसी जीशान कमर ने बीबीसी हिंदी से बताया, "मूलत: यह परिवार सतबरवा के पास कहीं रहता था. वे लोग हेसातू आते-जाते थे. छह महीने से वे लगातार यहाँ रह रहे हैं. इस कारण उनका राशन कार्ड नहीं बन सका था. उन्होंने इसका आवेदन भी नहीं दिया था. अब हमने उन्हें राशन कार्ड दिला दिया है. उनके गाँव से 4 किलोमीटर की परिधि में मुख्यमंत्री दीदी किचेन, दाल भात केंद्र और थाना में सामुदायिक किचेन संचालित है."
"यहाँ लोगों को मुफ्त में खिलाया जा रहा है. ऐसी कई बातें प्रमाणित करती हैं कि उसकी मौत का कारण भूख नहीं है. फिर भी मैं जाँच रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहा हूँ. मंगलवार शाम तक यह रिपोर्ट मुझे मिल जाएगी, तो सारा तथ्य सामने आ जाएगा."
झूठ बोल रहे हैं डीसी
हेसातू गांव के लोगों को डीसी की बात झूठी लगती है. नेमनी के पिता जगलाल ने बताया कि पिछले महीने आंगनबाड़ी से सिर्फ़ ढाई किलो अनाज मिला था. उनकी पड़ोसी महिला ने भी बताया कि उन्होंने कई बार चावल और बना हुआ खाना उस परिवार को दिया था. जिस दिन नेमनी की मौत हुई, वे बाज़ार गई थीं. लौटीं तो देखा कि वह बेसुध थी. उसकी मां ने कुछ भी नहीं बताया था. वरना, मैंने उन्हें मदद की होती. वह बच्ची खेलते-खेलते मर गई.
गांव में नहीं है आंगनबाड़ी केंद्र
उस गांव की एएनएम संगीता कुमारी ने बताया कि हेसातू में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है. इस गांव के लोगों को बगल के गांव नैहरा जाना पड़ता है. वहां आंगनबाड़ी केंद्र है. मैंने कई बार आंगनबाड़ी से मिलने वाला लाभ इस परिवार को दिलाया था. नेमनी (अब मृत) और उसके भाई-बहनों का टीकाकरण भी किया था लेकिन मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनके घर में अनाज नहीं है. इस गांव में दाल-भात केंद्र या मुख्यमंत्री दीदी किचेन संचालित नहीं किया जा रहा है.
अब इस गांव के सभी बच्चों की स्वास्थ्य जांच कर उन्हें दवाईयां दी जा रही हैं. गांव में कई लोगों का आना-जाना बढ़ा है. मौत भूख से हुई या नहीं, इसको लेकर दावे-प्रतिदावे किए जा रहे हैं.
न्यायिक जांच की माँग
इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इस मामले की न्यायिक जांच कराने की माँग की है. उन्होंने बीबीसी से कहा कि अगर मुख्यमंत्री को उनके अधिकारियों की बात पर ज़्यादा यक़ीन है, तो इस मामले की जाँच हाईकोर्ट के किसी रिटायर्ड जस्टिस के नेतृत्व में कमेटी बनाकर करानी चाहिए. इससे सच सामने आ सकेगा. क्योंकि, अब उस परिवार पर दबाव बनाए जाने की बातें भी सामने आ रही हैं.
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