भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में बड़ा रोल निभाएंगी निजी कंपनियां?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए
भारत के अंतरिक्ष सेक्टर में निजी क्षेत्र की भागीदारी अब और बढ़ेगी. देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी सेक्टर की भूमिका बढ़ाने वाले सरकार के फ़ैसले से अब ज़्यादा कम्यूनिकेशन सैटेलाइट बन सकेंगे.
कोविड-19 के बाद की दुनिया में इनका रोल बेहद अहम होगा. इन सैटेलाइट्स की बदौलत लोग अब शहरों के बजाय अपने होमटाउन (गृह नगरों) में ही घर से बैठ कर काम (वर्क फ्रॉम होम) कर सकेंगे.
प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां अभी तक सैटेलाइट की असेंबलिंग, इंटिग्रेशन और टेस्टिंग का काम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के प्लेटफॉर्म पर ही करती रही हैं. एक निजी कंपनी के बनाए दो सैटेलाइट GSAT-30 और IRNSS-1i इसरो से ही लॉन्च किए गए हैं.
इसरो में चंद्रयान-1 के पूर्व परियोजना निदेशक माइलस्वामी अन्नादुरई ने बीबीसी हिंदी से कहा, "इसरो ने निजी कंपनियों को अपने साथ काम करने का मौक़ा दिया है. इसके लिए पूरा इको-सिस्टम तैयार किया है. इस इको-सिस्टम में हमने निवेश किया है. अब वे अपना पूरा प्रोडक्ट इसरो में लाकर टेस्टिंग कर सकते हैं."
सैटेलाइट बनाएंगी निजी कंपनियां
सरकार ने अब 2017 में प्रस्तावित एक क़ानून के आधार पर अंतरिक्ष के क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने का फ़ैसला किया है. इसके तहत एक 'लीगल फ्रेमवर्क' मुहैया कराया जा रहा है.
इस फ्रेमवर्क के मुताबिक़ प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां सैटेलाइट बना सकती हैं. इतना ही नहीं वे इसे इसरो से टेस्टिंग कराने के बाद लॉन्च भी कर सकती हैं.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ दिन पहले ऐलान किया था कि सरकार निजी क्षेत्र की कंपनियों को इसरो की सुविधाओं का इस्तेमाल करने की इजाज़त देने के लिए एक तय नीति लाएगी और इसके तहत नियम-क़ानून तैयार होंगे.
लेकिन इसरो, बेंगलुरू स्थित अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजिज जैसी निजी कंपनियों को पहले ही अपनी सुविधाएं मुहैया करा रही है.
इस कंपनी ने यहीं पर 3.75 टन के कम्यूनिकेशन सैटेलाइट जीसेट-30 की असेंबलिंग, इंटिग्रेशन और टेस्टिंग की है. निजी क्षेत्र की कंपनी ने भारत के पहले नेविगेशन सैटेलाइट IRNSS- 1i को तैयार करने के लिए भी इसरो की सारी सुविधाओं का इस्तेमाल किया है.

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अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजिज के प्रबंध निदेशक कर्नल एच एस शंकर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमने सार्क सैटेलाइट के लिए भूटान और मालदीव में ग्राउंड स्टेशन बना लिए हैं. जल्दी ही हम बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में भी ग्राउंड स्टेशन बना लेंगे. सार्क सैटेलाइट पर काम की शुरुआत पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर हुई थी. अब सैटेलाइट से लेकर लॉन्चर और ग्राउंड स्टेशन तक बनाने काम बड़े पैमाने पर प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को दिया जा रहा है."
निजी कंपनियां पहले भी काम कर चुकी हैं
दरअसल भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की भागीदारी कोई नई बात नहीं है.
1985 में जब प्रोफ़ेसर यूआर राव इसरो के चेयरमैन थे, तब इसे एक बड़ा प्रोत्साहन मिला था. इस क़दम के तहत ही उस वक़्त पिन्या इंडस्ट्रियल एस्टेट में सहायक यूनिटों की स्थापना हुई. पिन्या,एशिया के सबसे बड़ी लघु उद्योग एस्टेट में से एक है.
बाद में जब डॉक्टर के राधाकृष्णन इसरो के चेयरमैन ( 2009-2014) बने तब सैटेलाइट और लॉन्चिंग व्हिकल्स बनाने की यूनिट खड़ी करने की योजना तैयार हुई.
डॉक्टर राधाकृष्णन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "तब तक 125 निजी कंपनियां मोटे तौर पर इस काम में लगी हुई थीं. लेकिन अब एक बड़ा फ़र्क़ यह पड़ा है कि निजी कंपनियों ने यह ज़ाहिर करना शुरू किया है कि वे अब एडवांस सैटेलाइट परियोजनाओं को भी आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा कर सकती हैं."
इसरो के एक और पूर्व चेयरमैन डॉक्टर माधवन नायर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "सैटेलाइट बनाने में 60 फ़ीसदी से अधिक का योगदान निजी क्षेत्र की कंपनियां ही करती हैं. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का एक नकारात्मक पहलू यह है कि निजी क्षेत्र की दिलचस्पी लंबे वक्त के निवेश में नहीं होती. हां, अब जो नई नीति बनी है, उससे अंतरिक्ष परियोजनाओं में निश्चित तौर पर बड़े निवेश को बढ़ावा मिलेगा."

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डॉक्टर अन्नादुरई कहते हैं, "भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए नया 'लीगल फ्रेमवर्क' अहम भूमिका अदा करेगा. यह इसरो का बोझ कम कर देगा. इसरो की सर्विस की मांग पड़ोसी देशों में भी बढ़ रही है. इसलिए मुझे लगता है कि कोविड-19 की बाद की दुनिया में कम्यूनिकेशन सैटेलाइटों की मांग बेहद बढ़ जाएगी. इस वक्त जो कनेक्टिविटी है, उससे आप शहर में घर से बैठ कर काम कर सकते हैं. लेकिन अपने गृह नगरों से नहीं."
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के ऐलान से बेलाट्रिक्स (Bellatrix) जैसा स्टार्ट-अप बेहद उत्साहित है. यह रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश करता है और सैटेलाइट का प्रपल्शन (प्रणोदक- सेटेलाइट को ऊपर ले जाने वाला सिस्टम) सिस्टम तैयार करता है.
बेलाट्रिक्स के निदेशक यशस कर्णम ने बीबीसी हिंदी से कहा, "नए ऐलानों पर गौर करने से ऐसा लगता है कि जल्द ही एक अंतरिक्ष नीति आएगी. अगर हम पीएसएलवी (भारत का सेटेलाइट लॉन्चिंग व्हिकल्स) बनाना चाहेंगे तो हम इसरो की सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे. अमरीकि कंपनियां इसी तर्ज पर नासा की सुविधाओं का इस्तेमाल करती हैं."
यह फ्रेमवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे दूसरे सेक्टरों में काम करने वाली निजी कंपनियों को भी इसरो के सैटेलाइट्स से डेटा हासिल करने में मदद करेगा.
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