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कोरोना संकट: मोदी सरकार के आर्थिक पैकेज में ज़रूरतमंदों के लिए क्या है?
- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड-19 की महामारी से पैदा हुए संकट से निबटने के लिए 12 मई को 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी.
मोदी ने इस आर्थिक पैकेज की घोषणा के साथ कहा था कि इस पैकेज के जरिए देश के विभिन्न वर्गों को सहायता मिलेगा और यह 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' को नई गति देगा.
इसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच प्रेस ब्रीफिंग में 20 लाख करोड़ रुपये का लेखा-जोखा दिया कि किन-किन मदों में कितनी राशि ख़र्च की जाएगी.
उन्होंने पहली ब्रीफिंग में 5.94 लाख करोड़ रुपये की रकम मुख्य तौर पर छोटे व्यवसायों को क़र्ज़ देने और ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और बिजली वितरण कंपनियों की मदद के नाम पर आवंटित करने की घोषणा की.
दूसरी ब्रीफिंग में 3.10 लाख करोड़ रुपये प्रवासी मज़ूदूरों को दो महीने तक मुफ्त में अनाज देने और किसानों को क़र्ज़ देने में इस्तेमाल करने की बात कही.
'रिलीफ़ कम रिफॉर्म ज़्यादा'
तीसरी ब्रीफिंग में 1.5 लाख करोड़ रुपये खेती के बुनियादी ढांचे को ठीक करने और कृषि से जुड़े संबंधित क्षेत्रों पर ख़र्च करने की बात कही.
चौथी और पांचवी ब्रीफिंग में कोयला क्षेत्र, खनन, विमानन, अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर शिक्षा, रोज़गार, व्यवसायों की मदद और सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों के लिए सुधार की बात कही.
वित्त मंत्री की ये घोषणाएँ क्या वाकई में किसी राहत पैकेज की तरह है या फिर यूं कहें कि सबसे ज्यादा प्रभावित हुए लोगों को राहत पहुंचानी वाली है.
आईआईएम अहमदाबाद की एसोसिएट प्रोफेसर रीतिका खेड़ा कहती है कि ये जो घोषणाएँ की गई हैं ये रिलीफ़ कम रिफॉर्म के कदम ज्यादा लगते हैं.
"इससे जब फायदा होगा तब होगा लेकिन अभी तत्काल राहत देने वाली इसमें बात कम हुई है. बुरी तरह से प्रभावित जरूरतमंद लोगों को सीधे फायदा पहुँचाने वाली घोषणाएं बहुत कम हुई है."
राहत देने वाले कदम बहुत कम
अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा कहती हैं, "ग़रीब तबके के लिए 26 मार्च से लेकर आज तक जो घोषणाएँ हुई हैं उसमें उस समय 31,000 करोड़ रुपये जनधन योजना के तहत अकाउंट में देने की बात कही गई थी. 3000 करोड़ वृद्धा पेंशन के तहत देने की बात कही गई थी. ये दोनों ही मिलाकर 34000 करोड़ हुए."
"इसमें अब मनरेगा के तहत 40000 करोड़ रुपये जोड़ा गया है. इसके अलावा कहा गया था कि राशन कार्ड जिनके पास है उन्हें तीन महीनों तक दोगुना राशन मिलेगा. पिछले हफ्ते इसमें आठ करोड़ और लोगों को जोड़ने की बात कही गई लेकिन सिर्फ दो महीने के लिए. तो गरीबों के सिर्फ इतनी ही घोषणाएँ हुई हैं."
"ये सब मिलाकर जीडीपी का एक फ़ीसदी भी नहीं होता है. सरकार ने तत्काल राहत देने वाले कदम ना के बराबर उठाए हैं. दूसरी देशों से तुलना करे तो ये बेहद कम है. तीन महीनों तक दोगुना राशन करने के फैसले को और तीन महीने तक किए जाने की जरूरत थी."
"फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया में जितना स्टॉक होना चाहिए उसका तीन गुना स्टॉक पड़ा हुआ है. भंडारण की समस्या आ रही है. अभी और आनाज खरीदे जाने हैं और उसके बाद बारीश का मौसम शुरू हो जाएगा फिर भंडारण की समस्या और बढ़ेगी."
"इन सब के बावजूद अगर सरकार गरीबों में पर्याप्त राशन नहीं बांट रही है और राज्यों से कह रही है कि आप 21 रुपये में गेहूँ और 22 रुपये में चावल खरीदें तो अभी भी सरकार पैसा बनाने में लगी हुई है."
बैंकों का एनपीए
सरकार ने ज्यादातर राहत की घोषणाएँ लोन की शक्ल में व्यवसायों को देने वाली की है.
इस पर रीतिका खेड़ा का मानना है कि सरकार समझती है कि व्यवसाय जब चलेंगे तो फिर उससे रोज़गार पैदा होगा और इस तरह से जिन्हें रोज़गार मिलेगा उन्हें फायदा होगा. लेकिन बैंकों का एनपीए पहले से काफी बढ़ा हुआ है. इसलिए अब अगर लोन बांटे जाएँगे तो फिर उनके एनपीए के बढ़ने की गुंजाइश और ज्यादा होगी.
वो इसके अलावा एक और समस्या की तरफ ध्यान दिलाती है कि जब बाज़ार में मांग ही नहीं है इस वक्त तो फिर कंपनियां लोन लेंगी क्यों. इसलिए जबतक सरकार बाज़ार में मांग को बढ़ाने को लेकर नहीं सोचेगी तब तक बिना बाज़ार में मांग पैदा हुए व्यवसाय करने वाले लोग भी लोन लेने के पहले हिचकेंगे. इसलिए जरूरी था कि लोगों के हाथ में पैसा पहुँचाने की योजना पर काम किया जाए जो कि इस राहत पैकेज में बहुत कम है.
वो कहती हैं अगर सरकार को लोगों की मदद ना करने के बजाए सिर्फ अर्थव्यवस्था ही संभालना है तब भी लोगों के हाथ में पैसे देने की जरूरत पड़ेगी.
बाज़ार में सुधार
योजना आयोग के पूर्व सदस्य संतोष मेहरोत्रा भी इस बात से इत्तेफाक़ रखते हुए कहते हैं कि लोन देने की इन घोषणाओं से गरीब तबकों को कोई फ़ायदा नहीं होने जा रहा है.
वो कहते हैं, "एमएसएमई (सूक्षम, लघु और मध्यम उद्योग) तब लोने लेंगी जब उन्हें लगेगा कि वो अपना प्रोडक्शन और व्यवसाय छह महीने पहले के स्तर पर ले जा सकते हैं. लेकिन जब डिमांड इतनी कम हो गई है तो वो लोन क्यों लेंगे. तीन लाख करोड़ सरकार एमएसएमई को जो देना चाहती है उसकी सीमा अक्टूबर तक खत्म हो जाएगी."
संतोष मेहरोत्रा का कहना है, "जो रिलीफ़ की बात कही गई है वो बैंकिंग गतिविधियों के तहत कही गई है. इसमें वित्तीय प्रोत्साहन बहुत कम या फिर ना के बराबर है. इससे बाज़ार में सुधार नहीं आएगा. 2008 के आर्थिक संकट के दौरान आरबीआई ने अपने जेब से खर्चा बढाया और टैक्स घटाया."
"अभी तो टैक्स घटाया नहीं जबकि अभी का संकट 2008 की तुलना में कई गुना बड़ी है. खर्च बढ़ाने के लिए जो करना था वो किया नहीं. वित्तीय प्रोत्साहन टैक्स कम करके और खर्च बढ़ा कर दिया जा सकता है और सरकार ने ये दोनों ही काम नहीं किए हैं तो फिर हालत कहाँ से सुधरेगी. सरकार ने अपनी सारी जिम्मेदारी बैंकों पर डाल दी है."
"आरबीआई ने बैंकों की लिक्विडिटी बढ़ाई है लेकिन बैंकों ने भी होशियारी के साथ वापस आरबीआई के पास जमा कर ब्याज कमा रहे हैं जिसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं. इसलिए बैंक आगे रकम लोन पर नहीं दे रहे हैं. अब सरकार बैंकों पर क़र्ज़ बांटने को लेकर कितना दबाव बना पाती है, ये तो देखने वाली बात होगी."
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