कोरोना वायरस: मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों में कोरोना से जंग लड़ने वाले योद्धाओं की दास्तां
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Author, चिंकी सिन्हा
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
8 मई को शरद उघाड़े की पत्नी का जन्मदिन था, लेकिन वो उन्हें शुभकामनाएं देने के लिए घर के अंदर नहीं जा सके. अपनी पत्नी को देखकर घर के दरवाज़े पर खड़े शरद के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई.
37 साल के उघाड़े मुंबई के जी-साउथ वॉर्ड के वॉर्ड कमिश्नर हैं. इस इलाक़े में अब तक कोरोना वायरस के एक हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं. 26 मार्च से ही वो अपने क़रीब 150 सहयोगियों के साथ होटलों में रह रहे हैं.
मुंबई के जी-साउथ वॉर्ड के वॉर्ड कमिश्नर के तौर पर उनके सामने एक बड़ी चुनौती आ चुकी थी. इस इलाक़े से कोरोना वायरस के मामले आना शुरू हो गए थे. चंद दिनों में ही झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाक़े जीजामाता और जनता कॉलोनी कोरोना वायरस के हॉटस्पॉट बन चुके थे.
उघाड़े ने इलाक़े को पूरी तरह से सील करने का फ़ैसला किया. यह एक घनी आबादी वाला इलाक़ा है और यहां एक कि.मी. के क्षेत्रफल में क़रीब 82,000 लोग रहते हैं.
बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की मुहिम
29 मार्च को उन्होंने इस इलाक़े में दाख़िल होने और बाहर निकलने के सभी रास्तों को बंद कर दिया था. इसके बाद टीमें बनाई गईं. पांच दिनों के भीतर उन्होंने कोलीवाड़ा इलाक़े का सर्वे किया और यहां के लोगों की स्क्रीनिंग की.
इसके बाद इस जगह को ज़्यादा जोखिम और कम जोखिम वाली कैटेगरी में डाला गया. साथ ही ज़्यादा जोखिम वाली जगहों में आने वाले लोगों को सेंटरों में ख़ुद को क्वारंटीन करने के लिए राज़ी किया गया.
इन क्वारंटीन सेंटरों को कुछ दिनों के भीतर तैयार किया गया था. इसके अलावा, किसी तरह से लोगों को आवश्यक सामानों की कमी न हो इसके रास्ते भी तलाशे गए.
झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में वायरस को फैलने से रोकने की रणनीति बनाने के लिए उनके पास न तो पहले से कोई ब्लूप्रिंट था, न ही इसके लिए कोई ख़ास प्लान या ऐसी केस स्टडीज थीं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता.
झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाक़ों में लोगों को बेहद कम जगह में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है. यहां हालात ऐसे हैं कि अगर किसी संकरी गली में आप अपने हाथ फैलाने की कोशिश करें तो हो सकता है कि आपके हाथ किसी के घर की खिड़की से टकरा जाएं.
उघाड़े का बचपन स्लम में ही बीता था
उघाड़े इन परिस्थितियों से अच्छी तरह से वाकिफ़ थे. उन्होंने सोचा कि वो चीज़ों को संभाल सकते हैं.
इसकी एक वजह भी थी. उघाड़े ख़ुद महाराष्ट्र के धुले ज़िले में एक झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाक़े में पले-बढ़े थे. उनके पिता एक मिल में मज़दूर थे और उन्हें लंबी शिफ्टों में काम करना पड़ता था.
उन्होंने 10 फ़ुट लंबे और 10 फ़ुट चौड़े एक कमरे में ज़िंदगी काटी थी. जगह की कमी थी और उघाड़े का बचपन एक घनी बसी कॉलोनी में बीता था.
एक फ़ोन कॉल में उन्होंने बताया, "मुझे इन जगहों के हालातों का अच्छी तरह से अंदाज़ा था."
उनके मुताबिक, झुग्गी-झोपड़ियों वाला कोई भी इलाक़ा अनौपचारिक रिश्तों और विस्तारित परिवारों के नेटवर्क पर आधारित होता है.
2012 में बीएमसी (बृहन्मुंबई नगर निगम) से असिस्टेंट वॉर्ड कमिश्नर के तौर पर जुड़ने के बाद सबसे पहले उन्हें धारावी की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.
इमेज कैप्शन, 37 साल के उघाड़े मुंबई के जी-साउथ वॉर्ड के वॉर्ड कमिश्नर हैं.
'जो डर गया, वो मर गया'
धारावी भारत का सबसे बड़ा स्लम (झुग्गी-झोपड़ियों वाला इलाक़ा) एरिया है. एशिया में सबसे बड़ा स्लम एरिया पाकिस्तान का ओरंगी टाउन है और इसके बाद धारावी का नंबर आता है.
माना जाता है कि धारावी में क़रीब 10 लाख लोग रहते हैं जबकि यह इलाक़ा महज़ 535 एकड़ में सिमटा हुआ है.
अपनी पिछली पोस्टिंगों में अंडरवर्ल्ड और माफ़िया लोगों के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा था. वो कहते हैं कि उन्हें कोरोना वायरस से भी डर नहीं लगता है.
वो बोलते हैं, "कोरोना से जो डर गया, वो मर गया." यह कहते हुए वो ज़ोर से हंसते हैं.
वो एक शेर भी सुनाते हैं, "कुछ इस हालात से गुज़री है ज़िंदगी इन दिनों, अब ज़ख़्म तो होते हैं पर दर्द नहीं होता. मंज़िलें तो हासिल होती हैं पर जश्न नहीं होता."
एक घने स्लम एरिया को सील करने का फ़ैसला
21 मार्च को मुंबई में जब कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया था, तब उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि यह इतनी तेज़ी के साथ फैल जाएगा.
यह मामला वर्ली के वर्ल्ड टावर्स से सामने आया था और जो शख़्स कोरोना पॉज़िटिव निकला था वो हाल में विदेश यात्रा कर वापस लौटा था.
लेकिन, 27 मार्च को वर्ली-कोलीवाड़ा के पड़ोसी इलाक़े में तीन मामले और सामने आए. इसके बाद मामलों में लगातार इज़ाफ़ा होता चला गया.
उघाड़े बताते हैं, "यहां महज़ एक किलोमीटर के दायरे में 80,000 से ज़्यादा लोग रहते हैं." वो जानते थे कि यह एक टाइम बम की तरह से है.
वो कहते हैं, "झुग्गी-झोपड़ियों वाले इलाक़े इसलिए घने बसे होते हैं क्योंकि लोगों के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं होता है. ऐसे में यहां सामाजिक दूरी को लागू करना कल्पना जैसा है."
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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां
आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST
एशिया का दूसरा सबसे बड़ा स्लम
यूएन वर्ल्ड अर्बनाइज़ेशन प्रॉस्पेक्ट्स के मुताबिक़, 2020 में मुंबई की आबादी 2 करोड़ से अधिक रहने का अनुमान है.
मुंबई अभी भी भारत का सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर बना हुआ है. साथ ही यह दुनिया का चौथा सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर है.
मुंबई में बड़ी तादाद में लोग स्लम इलाक़ों में रहते हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक़, देश के सभी बड़े मेट्रो शहरों के मुक़ाबले झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों की तादाद मुंबई में सबसे ज़्यादा है.
जब कोरोना संक्रमण के ऐसे मामले आना शुरू हो गए जिनका एक-दूसरे से कोई वास्ता नहीं था तब यह डर पैदा होने लगा था कि यह संक्रमण अब सामुदायिक फैलाव या लोकल ट्रांसमिशन के दौर में पहुंच चुका है.
ऐसे में वर्ली-कोलीवाड़ा मुंबई का पहला कंटेनमेंट ज़ोन बन गया था.
आवश्यक चीज़ों की सप्लाई बहाल रखने की चुनौती
29 मार्च को वर्ली-कोलीवाड़ा को सील करने का फ़ैसला कोई आसान चीज़ नहीं थी. सबसे पहले उन्होंने दूध की सप्लाई को बहाल रखने का काम किया. सुबह 5 बजे से लेकर 8 बजे तक पुलिस और निगम के कर्मचारी घरों तक दूध पहुंचाने के काम में लगते थे.
इसके बाद उन्होंने कुछ मेडिकल स्टोर खोले. अगले चरण में उन्हें कियोस्क खोलने और स्वाइप मशीनें लगाने की ज़रूरत महसूस हुई ताकि लोग कार्ड्स स्वाइप कर सकें और नकदी हासिल कर सकें.
उन्हें लोगों के लिए राशन का इंतज़ाम करना था. इसके लिए चावल, आटा, तेल, चाय और ऐसी ही दूसरी राशन की चीज़ों की 27,000 किटें बनाई गईं और इन्हें घरों तक पहुंचाया गया.
वो बताते हैं, "हमें कई ऐसी कंपनियां भी मिलीं जो अपने सामाजिक उत्तरदायित्व की गतिविधियों (सीएसआर यानी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के ज़रिए हमारी मदद करना चाहती थीं."
उघाड़े कहते हैं, "जब हमने पहली बार इलाक़े को सील करने के बारे में सोचा तब हमें इस बात का कतई अंदाज़ा नहीं था कि हम लोगों को आवश्वयक सेवाएं कैसे मुहैया कराएंगे. हम यह जान चुके थे कि अगर हम अभी इसे कंट्रोल नहीं कर पाए तो फिर कंट्रोल करने के लिए कुछ बाकी नहीं बचेगा क्योंकि मामले तेज़ रफ़्तार से बढ़ रहे थे."
उन्होंने इटली, चीन, इंग्लैंड और यहां तक कि न्यू यॉर्क शहर में लॉकडाउन की कहानियां टीवी पर सुनी थीं. लेकिन, इनमें से किसी भी जगह पर मुंबई के जी-साउथ वॉर्ड जैसे झुग्गी-झोपड़ियों वाले इलाक़ों की तरह की घनी आबादी की रिहायश नहीं थी.
मुनादी की गई और बैनर लगाए गए. इसके बाद सुबह 10 बजे कंटेनमेंट का ऐलान कर दिया गया.
अगला काम बुख़ार कैंप और चेक पोस्ट लगाने का था. घर-घर जाकर स्क्रीनिंग की गई और लोगों से सहयोग करने की अपील की गई. यह काम आसान नहीं था. कुछ जगहों पर उन्हें विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वो हर किसी को यही बताते रहे कि लक्षणों के हिसाब से उन्हें क्वारंटीन सेंटर या आइसोलेशन वॉर्ड में जाने की ज़रूरत है.
गर्भवती पत्नी को नहीं दे पाए वक़्त
शरद उघाड़े इस दौरान कभी घर नहीं गए. कुछ दिनों तक उनकी व्हॉट्सएप पिक्चर में उनकी पत्नी होती थीं. जबकि कुछ दिनों डिस्प्ले पिक्चर में वह और उनकी पत्नी होते थे.
33 साल की उनकी पत्नी मयूरी अघाड़े छह महीने की गर्भवती हैं और यह उनका दूसरा बच्चा होगा. उनकी नौ साल की बेटी अपने पिता को याद करती है.
कई दफ़ा ऐसा होता है कि उघाड़े घर के पास आते हैं और खिड़की के नीचे खड़े होते हैं. वे लोग एक-दूसरे को देखते हैं और उनके चेहरे खिल जाते हैं. कई दफ़ा वे हाथ हिलाकर हैलो बोलते हैं. उन्हें पता है कि वे व्यस्त हैं.
दस साल पहले उनकी शादी हुई थी और उनका पहला बच्चा एक साल बाद पैदा हुआ था. उस वक्त वो सिविल सर्विसेज़ परीक्षाओं की तैयारियों में लगे थे और ज़्यादातर वक़्त बाहर ही रहते थे. इस बार दोनों लोगों को उम्मीद थी कि वो साथ में वक़्त बिताएंगे.
एक असाधारण परिस्थिति
मयूरी बताती हैं, "मुझे लगता है कि ऐसा शायद ही मुमकिन हो. गुज़रे सालों में हमने कई बार आकस्मिक हालात देखे हैं, लेकिन इस बार हम एक असाधारण परिस्थिति का सामना कर रहे हैं."
घर छोड़ने और होटलों में रहने के अपने फ़ैसले से पहले ही उघाड़े घर पर ख़ुद को क्वारंटीन कर चुके थे, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि घर से दूर रहना ही उन सबके की सुरक्षा के लिहाज़ से बेहतर रहेगा.
शुरुआत में उनकी बेटी अवनी इस बात से ख़ुश थी कि उनके पिता लॉकडाउन में घर पर ही उनके पास रहेंगे.
मयूरी कहती हैं, "उसे लगा कि यह एक छुट्टी जैसा होगा. लेकिन, अब वो जब भी कॉलोनी के लोगों को बग़ैर मास्क लगाए देखती हैं तो उन्हें इसकी तस्वीरें भेज देती हैं. हम उनके साथ वीडियो कॉल्स पर बात करते हैं."
कई बार मयूरी रगड़ा पैटी बनाती हैं और अपने पति को इन्हें पैक करके भेज देती हैं.
वो कहती हैं, "ये उनकी फ़ेवरेट है. वो अपने काम को लेकर बहुत प्रतिबद्ध हैं. मुझे उन पर गर्व है."
अपने होटल के कमरे में उघाड़े अक्सर यह सोचते हैं कि यह सब कब ख़त्म होगा. लेकिन, उन्हें पता है कि यह लंबा चलने वाला है.
श्रृंखला तोड़ने की कोशिश
इस इलाक़े में काम कर रही 20 इंजीनियरों और डॉक्टरों की एक टीम ने शुरुआत में ही फ़ैसला कर लिया था कि वे होटलों और लॉज में रहेंगे और घर नहीं जाएंगे. वे कोशिश कर रहे थे कि इस वायरस से संक्रमित होने वालों की चेन को तोड़ दिया जाए. वे इस वायरस को अपने साथ घर नहीं ले जाना चाहते थे.
इन लोगों में डॉक्टर ओंकार छोछे भी हैं. 31 साल के ओंकार को जीजामाता नगर में ड्यूटी पर लगाया गया था. यह भी एक घना बसा इलाक़ा है जहां पर क़रीब 40,000 लोग रहते हैं.
वो बताते हैं कि इस इलाक़े में संक्रमण का पहला मामला साझा टॉयलेट्स के इस्तेमाल से शुरू हुए लोकल ट्रांसमिशन की वजह से सामने आया था.
इसे रोकने के लिए पहला कदम कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग यानी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों का पता लगाने का था.
वो बताते हैं, "वायरस को फैलने से रोकने का काम इस बात पर निर्भर करता है कि आप इस तरह के झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाके में किस तरह से कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग कर पाते हैं."
इमेज कैप्शन, डॉक्टर ओंकार छोछे को जीजामाता नगर में ड्यूटी पर लगाया गया था
स्वेच्छा से मदद को आगे आए लोग
दस सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों समेत कई लोग इस काम में मदद देने के लिए आगे आए. ये सभी लोग 50 साल से ज़्यादा उम्र वाले थे. ये लोग घर-घर जाकर स्क्रीनिंग कर रही टीम की मदद में जुट गए.
वो बताते हैं, "मेरे लिए यह बेहद ख़ुशी की बात थी. हर किसी ने कड़ी मेहनत की."
डॉ. छोछे इस मुहिम में जुड़ने के बाद से घर नहीं गए हैं. घर पर उनके माता-पिता और एक छोटी बहन हैं.
वो कहते हैं, "मैं संक्रमण को अपने साथ घर नहीं ले जा सकता. जिस तरह से मैं लोगों के संपर्क में आ रहा हूं, आपको नहीं पता कि कब आप ख़ुद भी संक्रमण की चपेट में आ जाएं. अभी काफ़ी कुछ किया जाना बाकी है और ऐसे में मुझे यह नहीं पता कि मैं कब घर जा पाऊंगा."
इमेज कैप्शन, कई स्लम में कोविड-19 की वजह सार्वजनिक शौचालय भी रहे हैं
सार्वजनिक शौचालय के इस्तेमाल से डरे
2 अप्रैल को तेजस मोहिते को बुख़ार आ गया. 25 साल के तेजस अपने छोटे से कमरे में बेचैन थे. इसी कमरे में उनके भाई और मां भी रहते थे.
तेजस एक ऑफ़िस बॉय के तौर पर काम करते हैं और साथ ही कॉलेज भी जाते हैं.
अगली सुबह वो अपनी बाइक पर पड़ोस के डॉक्टर के पास ख़ुद को दिखाने गए. हालांकि, उन्हें डॉक्टर नहीं मिले. इसके बाद वो नायर हॉस्पिटल गए जहां उनका स्वाब लिया गया. 4 अप्रैल को वो कोविड-19 से पॉज़िटिव पाए गए.
जीजामाता नगर स्लम में कई दूसरों की तरह से ही वो भी सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करते रहे थे.
उनका रिज़ल्ट आने के पहले ही बीएमसी स्टाफ़ मोहिते के घर पहुंच चुका था. उनके परिवार और दोस्तों समेत 12 लोगों को चेक किया जा चुका था. इनमें से दो लोगों को आइसोलेशन वॉर्ड में भेजा गया क्योंकि इनमें संक्रमण के लक्षण दिखाई दे रहे थे.
इमेज कैप्शन, तेजस मोहिते ने सार्वजनिक शौचालय का प्रयोग किया था
दूसरी ओर, अस्पताल में मोहिते रो रहे थे. वो दो मौतें देख चुके थे. वो बताते हैं कि वो हॉस्पिटल में चीखते थे कि वो मरना नहीं चाहते हैं.
मोहिते बताते हैं, "मैंने लोगों को वेंटिलेटर्स पर देखा और यह सब बेहद भयानक था."
मोहिते को अस्पताल से डिस्चार्ज किए जाने के दिन तक एक वॉर्ड से दूसरे वॉर्ड और कई हॉस्पिटलों में भेजा जाता रहा.
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि उन्होंने बहुत तेज़ी से काम किया."
"मेरे लिए अब बेहद मुश्किल वक़्त है. मैं काम पर नहीं जा पा रहा हूं और मेरी मां की भी नौकरी जा चुकी है. मेरी मां दूसरे लोगों के घरों में काम करके पैसे कमाती हैं."
मोहिते को अभी भी सार्वजनिक शौचालयों के इस्तेमाल से डर लगता है. वो अब निजी शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं और इसके लिए 3 रुपये चुकाते हैं. वो ऐसे वक़्त पर जाते हैं जब कम लोग वहां होते हैं.
वो कहते हैं, "मैं रात के 12 बजे के बाद या दोपहर में जाता हूं."
इमेज कैप्शन, स्लम में अधिकतर लोग सार्वजनिक शौचालयों का प्रयोग करते हैं
ज़्यादातर लोगों के पास अपने शौचालय नहीं
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र के झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाक़ों में रहने वाले 60 फ़ीसदी परिवारों के पास अपने घरों में शौचालयों की सुविधा नहीं है. ऐसे में इन लोगों को सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल करना पड़ता है.
वर्ली-कोलीवाड़ा इलाक़े के मेडिकल अफ़सर देवेंद्र गोल्हर कहते हैं, "हमने सार्वजनिक शौचालयों को सैनिटाइज़ करना शुरू कर दिया था. हमने गलियों में डिसइनफ़ेक्टेंट्स का छिड़काव शुरू करा दिया था."
मॉनसून सीज़न अब आने वाला है. ऐसे में स्वास्थ्य अधिकारियों के सामने कोविड-19 के साथ ही डेंगू और मलेरिया जैसी दूसरी बीमारियों से निबटने की चुनौती भी पैदा होने वाली है.
रिकवरी की ओर
15 मई को जी-साउथ वॉर्ड में 1,146 केस सामने आए. इसी दौरान 630 से ज़्यादा लोगों को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई. इसका मतलब 50 फ़ीसदी की सबसे ऊंची रिकवरी दर है. जीजामाता नगर में कंटेनमेंट को अब हटा लिया गया है और अब केवल लॉकडाउन की सामान्य शर्तें ही यहां पर लागू हैं.
बीएमसी के संयुक्त कमिश्नर आशुतोष सलिल के मुताबिक, मुंबई जैसे शहर में जहां स्लम इलाक़ों में एक बड़ी आबादी रहती है वहां कंटेनमेंट और आइसोलेशन को लागू करने की अपनी चुनौतियां हैं.
भारत में कोरोनावायरस के मामले
यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.
राज्य या केंद्र शासित प्रदेश
कुल मामले
जो स्वस्थ हुए
मौतें
महाराष्ट्र
1351153
1049947
35751
आंध्र प्रदेश
681161
612300
5745
तमिलनाडु
586397
530708
9383
कर्नाटक
582458
469750
8641
उत्तराखंड
390875
331270
5652
गोवा
273098
240703
5272
पश्चिम बंगाल
250580
219844
4837
ओडिशा
212609
177585
866
तेलंगाना
189283
158690
1116
बिहार
180032
166188
892
केरल
179923
121264
698
असम
173629
142297
667
हरियाणा
134623
114576
3431
राजस्थान
130971
109472
1456
हिमाचल प्रदेश
125412
108411
1331
मध्य प्रदेश
124166
100012
2242
पंजाब
111375
90345
3284
छत्तीसगढ़
108458
74537
877
झारखंड
81417
68603
688
उत्तर प्रदेश
47502
36646
580
गुजरात
32396
27072
407
पुडुचेरी
26685
21156
515
जम्मू और कश्मीर
14457
10607
175
चंडीगढ़
11678
9325
153
मणिपुर
10477
7982
64
लद्दाख
4152
3064
58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह
3803
3582
53
दिल्ली
3015
2836
2
मिज़ोरम
1958
1459
0
स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
11: 30 IST को अपडेट किया गया
वो कहते हैं, "हमने इन सेंटरों में बड़े पैमाने पर व्यवस्थाएं की हैं. हमने स्कूल, बैंक्वेट हॉल्स, होटल, बेड्स जैसी जगहों को अपने नियंत्रण में लिया है और हमने बड़े पैमाने पर इंतज़ाम किए हैं. हम अपनी कैपेसिटी को और बढ़ा रहे हैं. ऐसी ही एक फैसिलिटी हम रेस कोर्स में तैयार कर रहे हैं. एमएमआरडीए एक फैसिलिटी बीकेसी में तैयार कर रहा है. यहां पर 2,000 बेड्स की व्यवस्था की जा रही है."
"यहां तक कि गोरेगांव में नेस्को कनवेंशन सेंटर को भी इस काम में इस्तेमाल किया जा रहा है. हम मुंबई मेट्रो जैसी दूसरी एजेंसियों से भी इस तरह की जंबो फैसिलिटीज़ तैयार करने के लिए कह रहे हैं. हमारे लिए पैसे की कोई किल्लत नहीं है क्योंकि कंपनियां हमें दान दे रही हैं."
सोने, आराम करने के लिए वक़्त नहीं
मुंबई में उनकी पोस्टिंग के पहले साल में ही उन्हें इस महामारी की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
वो कहते हैं, "भूकंप और ऐसी ही दूसरी आपदाओं से निबटने के लिए हमारे पास पहले से योजना होती है. यह पहली बार हो रहा है कि हम एक ऐसी महामारी का सामना कर रहे हैं जिसमें सबकुछ काफ़ी तेज़ी से बदल रहा है."
वो इन दिनों शायद ही किसी दिन सुबह के तीन बजे से पहले बिस्तर पर सोने जा पाते हैं. कोरोना वायरस से पॉज़िटिव पाए गए लोगों के संपर्क में आने के चलते उनमें कुछ लक्षण दिखाई दिए हैं और इसके चलते दो बार उनके टेस्ट भी किए गए हैं.
वो बताते हैं, "यह सब बहुत आगे तक बढ़ गया है और हमें नहीं पता कि यह कब ख़त्म होगा. हमें बिना रुके काम करना पड़ रहा है. आपको हर वक़्त तालमेल बनाने के लिए काम करना पड़ता है. काम करते करते ही आप सो जाते हैं. मैं इतना फ़ोन पर अब से पहले कभी नहीं रहा."
मुझसे बात करने के दौरान ही उनके पास दस मिस्ड कॉल्स आ चुकी थीं. इस वक़्त ऐसे ही हालात बने हुए हैं.
जल्द ही घर जाने की उम्मीद
यह एक ऐसा वक़्त है जिसमें बाकी सब चीज़ें पीछे छूट गई हैं. ज़्यादातर वक़्त पर सभी पुरुष और महिलाएं कई-कई दिनों तक अपने घरों पर नहीं जा पाते हैं. ये लोग थके-मारे अपने होटल के कमरों में पहुंचते हैं और बिस्तरों पर गिर जाते हैं. लेकिन, इनमें से कोई भी शिकायत नहीं कर रहा है.
कई दफ़ा उघाड़े रात में गाना गाते हैं. इसी तरह से वो अपनी रातें काटते हैं. एक गाना, कुछ कॉल्स और एक उम्मीद कि शायद वे जल्द ही अपने घर जा पाएंगे.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
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मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.