प्रवासी मज़दूर संकट: क्या खाने-पीने की कमी से हालात बिगड़ सकते हैं?
इमेज स्रोत, NurPhoto
....में
Author, अनंत प्रकाश
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार के कटिहार रेलवे स्टेशन पर प्रवासी कामगारों के बीच खाने के पैकेट्स के लिए छीना झपटी, पंजाब के लुधियाना में प्रवासी कामगारों का विरोध प्रदर्शन और मध्य प्रदेश महाराष्ट्र सीमा पर खाने की कमी को लेकर अशांति का माहौल.
ये कुछ चुनिंदा मामले नहीं हैं जिनमें प्रवासी कामगारों का ग़ुस्सा फूटते हुए दिख रहा है.
क़रीब से देखें तो क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे प्रवासी कामगारों के बीच ग़ुस्सा धीरे-धीरे बढ़ता दिख रहा है.
कहीं, इस ग़ुस्से की वजह खाना न मिलना है तो कहीं इस ग़ुस्से का कारण ख़राब खाना मिलना है.
बिहार के कई ज़िलों में क्वारंटीन सेंटरों पर प्रवासी कामगारों और स्थानीय प्रशासन के बीच हाथापाई तक की नौबत आ चुकी है.
ऐसे में सवाल उठता है कि ये छिटपुट घटनाएं किस ओर इशारा कर रही हैं?
इमेज स्रोत, NOAH SEELAM
विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
स्टैंडिंग कमिटी ऑफ़ इकोनॉमिक स्टैटिस्टिक्स के चीफ़ प्रणब सेन ने कुछ हफ़्ते पहले ही चेतावनी जारी की थी.
उन्होंने कहा था, "अगर प्रवासी कामगारों की खाने-पीने से जुड़ी ज़रूरतें पूरी न हुईं तो वो हो सकता है जो इस देश में पहले हुआ है. हमारे यहां सूखे या अकाल के दौरान खाने पीने के सामान को लेकर दंगे हुए हैं. अगर खाने-पीने का सामान उपलब्ध नहीं कराया गया तो ये दोबारा हो सकते हैं. इसे लेकर स्पष्टता होनी चाहिए."
"अगर खाने-पीने का सामान उपलब्ध कराए जाने के तंत्र में ख़ामियां होती हैं, अगर बिना आमदनी वाले लोगों की ज़रूरतें पूरी न हुईं तो खाने-पीने के सामान को लेकर दंगे होना संभव है."
प्रणब सेन ने ये चेतावनी लगभग 45 दिन पहले दी थी. तब इस पलायन की शुरुआत हुई थी.
इसके बाद से अब तक लाखों कामगार शहरों में अपने ठिकानों को छोड़कर गाँवों की ओर चल पड़े हैं.
नक्शे पर
दुनिया भर में पुष्ट मामले
देखें
पूरा इंटरैक्टिव देखने के लिए अपने ब्राउज़र को अपग्रेड करें
गोले प्रत्येक देश में कोरोना वायरस के पुष्ट मामलों की संख्या दर्शाते हैं.
स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां
आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST
नोटबंदी की मार जारी
इन प्रवासी कामगारों की आर्थिक क्षमता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि इनमें से ज़्यादातार लोगों ने अपनी आख़िरी तनख़्वाह या कमाई मार्च के शुरुआती हफ़्तों में की थी.
इनमें से ज़्यादातर की मासिक आमदनी 7 से 20 हज़ार रुपये के बीच होती है जिससे झुग्गी के किराए और खाने-पीने का ख़र्च निकलता रहता है.
ये लोग साल भर में दो बार होली और दीवाली पर अपने घर जाते हैं. तब बीते छह महीने में जमा किया हुआ पैसा घरवालों को देकर आते हैं.
ऐसे में इन कामगारों के पास शहरों में नाम मात्र की बचत होती है. और जो बचत दशकों से चली आ रही थी वो साल 2016 के दौरान नोटबंदी में ख़त्म हो गई.
सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक़, भारत में 50 फ़ीसदी लोगों को आमदनी के मुक़ाबले अपनी पारिवारिक और घरेलू ख़र्चों को पूरा करने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
ऐसे में नोटबंदी के बाद से ये वर्ग किसी तरह दोबारा नोटबंदी से पहले की आर्थिक स्थिति में पहुंचने की कोशिशों में लगा हुआ था.
लेकिन लॉकडाउन होने के बाद से इस वर्ग की कमाई पूरी तरह ख़त्म हो गई और देश की एक बड़ी आबादी अचानक से ग़रीबी रेखा के नीचे पहुंच गई.
पलायन की इस मानवीय त्रासदी के शुरुआती दौर यानी मार्च में जो लोग अपने गाँवों की ओर रवाना हुए, उनके पास फिर भी कुछ हज़ार रुपये थे.
लेकिन लॉकडाउन के महीने भर बाद जो लोग अपने गाँवों के लिए निकल रहे हैं, उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वे आने वाले दिनों में खाना खा सकें.
बीबीसी से बात करते हुए कई कामगारों ने बताया है कि वो किस तरह मजबूरी में अपने गाँवों की ओर निकल रहे हैं.
यहां ये समझना ज़रूरी है कि शहर में रहने वाले इनमें से ज़्यादातर लोगों की गृहस्थी उनके गाँवों में नहीं है.
कई लोगों के पास उनका अपना घर और ज़मीन नहीं है. कई लोगों के पास गाँव में राशन कार्ड, चूल्हे-चौके और किसी तरह की कमाई की व्यवस्था नहीं है.
एक तरह से ये लोग बिन-बुलाए मेहमान के रूप में अपने सगे-संबंधियों के पास जा रहे हैं.
ऐसे में ये समझना ज़रूरी है कि आने वाले दिन इन लोगों के लिए क्या लेकर आने वाले हैं.
इमेज स्रोत, NOAH SEELAM
पलायन का सामाजिक पहलू
80 के दशक में पहाड़ों से उतरकर दिल्ली आए एक ऑटो चालक राम जी ने बीबीसी को अपनी मानसिक व्यथा बताई है.
वो कहते हैं, "शुरुआत में उनके पास कुछ पैसा था. लेकिन बीते दो महीने से खाली बैठने की वजह से उनके पास अब मात्र तीन हज़ार रुपये बचे हैं. और मकान मालिक भी किराया मांगने आ रहा है. ऐसे में अब उनके पास दो विकल्प हैं. पहला उधार लेकर किराया देना और दूसरा गाँव जाना."
राम जी की उम्र 55 पार कर गई है लेकिन लॉकडाउन से पहले तक वो रोज़ाना 10 घंटे से ज़्यादा समय तक ऑटो चलाते थे.
ताकि अपने बच्चों को बढ़िया खान-पान और शिक्षा दे सकें.
राम जी कुछ हद तक अपने को सफल भी मानते हैं. अब उनकी बस एक ख़्वाहिश है कि उनकी एक बेटी और एक बेटा ठीक से पढ़ाई कर लें तो वे एक सफल व्यक्ति के रूप में अपने गाँव लौटें.
ये सब कहने के बाद राम जी बीबीसी संवाददाता से दरख़्वास्त करते हैं कि उनका नाम बदल दिया जाए ओर यहां पर उनका नाम बदला गया है.
संभवत: ये दरख़्वास्त इसलिए थी ताकि सालों की मेहनत से शहर पहुंचकर सफल होने वाले एक व्यक्ति की बनी छवि को धक्का न लगे.
राम जी जिस वर्ग से आते हैं, वह शहर के अर्थशास्त्र में अपर लोअर क्लास और ग्रामीण अर्थशास्त्र में अपर मिडिल क्लास माना जाता है.
शहरों के ढांचे में ये वर्ग ईंटों के बीच छिपे हुए सीमेंट की तरह काम करता है.
इनमें दर्ज़ी, धोबी, डिलीवरी मैन, बिजली सही करने वाले, पिज़्ज़ा और तंदूरी चिकन बनाने वाले, सिक्योरिटी गार्ड, फल-सब्ज़ी बेचने वाले, फ्रूट चाट-पानी के बताशे (या गोल-गप्पे) बेचने वाले और बाज़ार चलाने वाले लोग शामिल हैं.
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने हाल ही में कुछ ऐसे ही लोगों से बात की है.
वो बताते हैं, "इन लोगों की हालत ऐसी है कि वे जहां से जो मिल रहा है, बस लेते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं. कहीं दया मिल रही है तो उसे भी सर-आंखों पर और कहीं क्रूरता मिल रही है, तो वो भी सिर-माथे."
सलमान रावी से बात करते हुए ऐसे ही एक प्रवासी कामगार अपनी आपबीती बताते हुए फ़फ़क-फ़फ़क कर रोने लगते हैं.
वो कहते हैं, "हम निकल जाएंगे, मर जाएंगे. जैसे भी होगा. हम निकल जाएंगे, बच्चों को लेकर. क्या क्या बताएं. यहां से भगा दिया, फिर वहां से भगा दिया. हम अंबाला से आ रहे हैं. छह दिन हो गए चलते-चलते. किसी की टूटी हुई साइकिल ली थी."
इन प्रवासी कामगार को रोता देखकर आसपास खड़े दूसरे कामगारों की आंखें भी नम हो जाती हैं.
इन जैसे लाखों प्रवासी कामगारों के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट कोरोना वायरस नहीं भूख है.
भारत में कोरोनावायरस के मामले
यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.
राज्य या केंद्र शासित प्रदेश
कुल मामले
जो स्वस्थ हुए
मौतें
महाराष्ट्र
1351153
1049947
35751
आंध्र प्रदेश
681161
612300
5745
तमिलनाडु
586397
530708
9383
कर्नाटक
582458
469750
8641
उत्तराखंड
390875
331270
5652
गोवा
273098
240703
5272
पश्चिम बंगाल
250580
219844
4837
ओडिशा
212609
177585
866
तेलंगाना
189283
158690
1116
बिहार
180032
166188
892
केरल
179923
121264
698
असम
173629
142297
667
हरियाणा
134623
114576
3431
राजस्थान
130971
109472
1456
हिमाचल प्रदेश
125412
108411
1331
मध्य प्रदेश
124166
100012
2242
पंजाब
111375
90345
3284
छत्तीसगढ़
108458
74537
877
झारखंड
81417
68603
688
उत्तर प्रदेश
47502
36646
580
गुजरात
32396
27072
407
पुडुचेरी
26685
21156
515
जम्मू और कश्मीर
14457
10607
175
चंडीगढ़
11678
9325
153
मणिपुर
10477
7982
64
लद्दाख
4152
3064
58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह
3803
3582
53
दिल्ली
3015
2836
2
मिज़ोरम
1958
1459
0
स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
11: 30 IST को अपडेट किया गया
क्यों पैदा हो सकता है खाने-पीने का संकट?
सालों तक दिल्ली में पत्रकारिता करने के बाद बिहार के पूर्णियां ज़िले में खेती किसानी कर रहे गिरींद्र नाथ झा मानते हैं कि इन शहरों से आए इन लोगों के सामने कमाने-खाने का संकट जारी है.
वो कहते हैं, "मैं कई ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जो कि बड़े शहरों में काम करते थे और संकट के दिनों में अपने गाँव वापस आए हैं. लेकिन ये लोग सिर्फ ईंट-मिट्टी गारा ढोने वाले मज़दूर नहीं हैं. ये स्किल्ड लेबर की कैटेगरी में आते हैं. ये वो लोग हैं जो एक तरह से शहर को चलाते हैं. अब सवाल ये है कि इन लोगों के लिए गाँवों में किस तरह का रोज़गार पैदा हो सकता है?"
गिरींद्र झा की तरह प्रवासी कामगारों के साथ बीते तीन महीनों से चल रहे एनडीटीवी के पत्रकार रवीश रंजन शुक्ल ने भी अपने अनुभव बीबीसी के साथ साझा किए हैं.
रवीश बताते हैं कि इटावा ज़िले में उनकी मुलाक़ात ऐसे कई लोगों से हुई जो कि बड़ी संख्या में अपने गाँव पहुंचे हैं.
रवीश कहते हैं, "कई ऐसे लोग हैं जो बीते पच्चीस-तीस सालों से शहरों में पानी-पूरी (पानी के बताशे) बेच रहे थे. इन लोगों के बच्चों का जन्म भी शहर में हुआ था और दूसरी पीढ़ी भी नौकरी की तलाश में है. ऐसे में ये लोग गाँव में रहने वाले अपने सगे-संबधियों के भरोसे शहर छोड़कर आए हैं. अब सवाल उठता है कि सगे-संबंधी आख़िर कितने दिनों तक इनके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठा पाते हैं?"
"ऐसे में अगर सरकार ने जल्द ही कोई मज़बूत क़दम नहीं उठाया तो ये स्थिति भयावह हो सकती है."
सरकार की ओर से कई क़दम उठाए गए हैं. लेकिन इनमें वे क़दम शामिल नहीं हैं जो सड़क पर चल रहे इन प्रवासी कामगारों को तत्काल मदद पहुंचा सकें.
20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद अर्थशास्त्री अरुण कुमार इसे लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं.
वो कहते हैं, "इस समय सरकार की प्राथमिकता ये होनी चाहिए थी कि किसी तरह इन प्रवासी कामगारों की जान बचाई जा सके. सरकार को इस वर्ग, जिसकी इस समय आमदनी नहीं है, का संरक्षण करना चाहिए. इनके गुज़र-बसर की चीज़ें उपलब्ध करानी चाहिए. क्योंकि ऐसा नहीं होने पर इन चीज़ों की कमी समाज में एक अशांति को जन्म दे सकती है."
प्रवासी कामगारों के लिए इंतज़ामों में लगे एक शख़्स नाम न बताने की शर्त पर बताते हैं कि सरकार जितना भी कहे लेकिन इन लोगों तक कम मदद ही पहुंच पा रही है.
ये शख़्स कहते हैं, "शहरों से आए कुछ लोगों ने मनरेगा के तहत काम भी कर लिया. लेकिन उन्हें अब तक तनख़्वाह नहीं मिली है. और जाने कब मिलेगी. क्योंकि उनके जॉब कार्ड बनने में कई तरह की दिक़्क़तें आ रही हैं."
रवीश रंजन शुक्ल भी इसी समस्या की ओर इशारा करते हैं.
वो कहते हैं, "मेरी बात एक गाँव के प्रधान से हुई जो कि इस बात से परेशान थे कि शहरों से आए इतने सारे लोगों का जॉब कार्ड इस तरह अचानक से कैसे बनवाया जाए. क्योंकि ज़्यादातर के काग़ज़ात आदि सब कुछ शहर का है."
सरकार की ओर से डायरेक्ट बैंक ट्रांसफ़र के तहत लोगों के खातों में डाले गए पैसों की बात की गई.
लेकिन हाइवे पर चल रहे लाखों प्रवासी कामगारों के लिए ये पैसा किस तरह मदद कर सकता है.
इसके साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना, राशन देने की व्यवस्था और रेहड़ी वालों के लिए क़र्ज़ आदि से जुड़ी योजनाओं को अमल में आने में कई हफ़्तों से महीनों लग सकते हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार इन प्रवासी कामगारों की मदद के लिए तत्काल क़दम क्यों नहीं उठा रही है.
कुछ विशेषज्ञ यहां तक कह रहे हैं कि किसी प्राकृतिक आपदा के समय सरकार जिस द्रुत गति से एनडीआरएफ़ की टीमें भेजती है, उस तरह के क़दम इस समय क्यों नहीं उठाए जा सकते हैं.
इस समय इन प्रवासी कामगारों की ज़िंदगी बचाने के लिए एनडीआरएफ़ की देखरेख में हाइवे किनारे उच्च स्तर के शिविर क्यों नहीं लगाए जा सकते हैं?
आख़िर क्यों गाड़ियां लगाकर उन्हें उनके घरों तक नहीं पहुंचाया जा सकता है?
लेकिन सरकार की ओर से एक नया फरमान आया है कि प्रवासी कामगारों को सड़कों और रेल पटरियों पर चलने से रोका जाए.
बीते काफ़ी समय से इस तरह के आदेशों की वजह से कामगार पुलिस की लाठी खाने और रेल पटरियों से होकर गुज़रने को मजबूर हो रहे हैं.
इमेज स्रोत, NOAH SEELAM
क्या दंगे भड़क सकते हैं?
भारत एक ऐसा देश है जो बीते कई दशकों से अनाज के मामले में सरप्लस में चल रहा है.
इसके मायने ये हैं कि सरकारी गोदामों में इतना अनाज भरा हुआ है कि एक लंबे समय तक खाद्दान्न आपूर्ति की जा सकती है.
अर्थशास्त्री ज़्यां द्रेज़ ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में खाने-पीने के सामान में कमी नहीं होने की बात कही थी.
ज़्यां द्रेज़ के मुताबिक़, "भारत के गोदामों में इस समय साढ़े सात करोड़ टन अनाज है. इतना अनाज पहले कभी नहीं रहा. यह बफ़र स्टॉक के नियमों से तीन गुना अधिक है. जब अगले कुछ हफ़्तों में रबी की फसल कट जाएगी तो यह स्टॉक और बढ़ जाएगा. सरकार कृषि मंडियों में पैदा हुए व्यवधान को समझते हुए और अधिक मात्रा में अनाज खरीदेगी. राष्ट्रीय आपदा के समय इस भंडार के एक हिस्से का इस्तेमाल करना ही समझदारी होगी."
ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि प्रवासी कामगारों तक खाना और ज़रूरी सामान पहुंचाना कितना मुश्किल है?
प्रणब सेन ने भी अपनी चेतावनी में यही साफ़ किया था कि खाने के सामान की वितरण व्यवस्था ढीली होने से संकट पैदा हो सकता है.
भारत सरकार जिन राशन की दुकानों के ज़रिए ग़रीबों तक राशन पहुंचाने की कोशिश कर रही है, वो तंत्र ही भ्रष्टाचार और ख़ामियों से भरा पड़ा है.
देशभर में कई जगहों पर दस किलो की बोरी में तीन किलो राशन निकलने से जुड़ीं ख़बरें सामने आ चुकी हैं.
बिहार सरकार भी कई दुकानों के ख़िलाफ़ कदम उठा चुकी है.
यहां ये बात ध्यान देने की है कि सरकार के गोदाम अनाज से भरे हुए हैं.
कई बार राशन की दुकानवाले सिर्फ़ इसलिए राशन नहीं दे रहे हैं क्योंकि परिवार का मुखिया राशन लेने के लिए मौजूद नहीं है.
आने वाले दिनों पर बात करते हुए रवीश कहते हैं कि सवाल इस बात का है कि जिसने जीवन भर पानी-पूरी और चाट बनाना सीखा है, वो अचानक से गड्ढा खोदना कैसे शुरू कर सकता है.
और शहर से आए इन कामगारों को इनके रिश्तेदार कितने दिन तक ख़ुशी-ख़ुशी खाना खिला पाएंगे?
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.