प्रवासी मज़दूर संकट: क्या खाने-पीने की कमी से हालात बिगड़ सकते हैं?

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार के कटिहार रेलवे स्टेशन पर प्रवासी कामगारों के बीच खाने के पैकेट्स के लिए छीना झपटी, पंजाब के लुधियाना में प्रवासी कामगारों का विरोध प्रदर्शन और मध्य प्रदेश महाराष्ट्र सीमा पर खाने की कमी को लेकर अशांति का माहौल.

ये कुछ चुनिंदा मामले नहीं हैं जिनमें प्रवासी कामगारों का ग़ुस्सा फूटते हुए दिख रहा है.

क़रीब से देखें तो क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे प्रवासी कामगारों के बीच ग़ुस्सा धीरे-धीरे बढ़ता दिख रहा है.

कहीं, इस ग़ुस्से की वजह खाना न मिलना है तो कहीं इस ग़ुस्से का कारण ख़राब खाना मिलना है.

बिहार के कई ज़िलों में क्वारंटीन सेंटरों पर प्रवासी कामगारों और स्थानीय प्रशासन के बीच हाथापाई तक की नौबत आ चुकी है.

ऐसे में सवाल उठता है कि ये छिटपुट घटनाएं किस ओर इशारा कर रही हैं?

मज़दूर

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विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

स्टैंडिंग कमिटी ऑफ़ इकोनॉमिक स्टैटिस्टिक्स के चीफ़ प्रणब सेन ने कुछ हफ़्ते पहले ही चेतावनी जारी की थी.

उन्होंने कहा था, "अगर प्रवासी कामगारों की खाने-पीने से जुड़ी ज़रूरतें पूरी न हुईं तो वो हो सकता है जो इस देश में पहले हुआ है. हमारे यहां सूखे या अकाल के दौरान खाने पीने के सामान को लेकर दंगे हुए हैं. अगर खाने-पीने का सामान उपलब्ध नहीं कराया गया तो ये दोबारा हो सकते हैं. इसे लेकर स्पष्टता होनी चाहिए."

"अगर खाने-पीने का सामान उपलब्ध कराए जाने के तंत्र में ख़ामियां होती हैं, अगर बिना आमदनी वाले लोगों की ज़रूरतें पूरी न हुईं तो खाने-पीने के सामान को लेकर दंगे होना संभव है."

प्रणब सेन ने ये चेतावनी लगभग 45 दिन पहले दी थी. तब इस पलायन की शुरुआत हुई थी.

इसके बाद से अब तक लाखों कामगार शहरों में अपने ठिकानों को छोड़कर गाँवों की ओर चल पड़े हैं.

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

नोटबंदी की मार जारी

इन प्रवासी कामगारों की आर्थिक क्षमता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि इनमें से ज़्यादातार लोगों ने अपनी आख़िरी तनख़्वाह या कमाई मार्च के शुरुआती हफ़्तों में की थी.

इनमें से ज़्यादातर की मासिक आमदनी 7 से 20 हज़ार रुपये के बीच होती है जिससे झुग्गी के किराए और खाने-पीने का ख़र्च निकलता रहता है.

ये लोग साल भर में दो बार होली और दीवाली पर अपने घर जाते हैं. तब बीते छह महीने में जमा किया हुआ पैसा घरवालों को देकर आते हैं.

ऐसे में इन कामगारों के पास शहरों में नाम मात्र की बचत होती है. और जो बचत दशकों से चली आ रही थी वो साल 2016 के दौरान नोटबंदी में ख़त्म हो गई.

सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक़, भारत में 50 फ़ीसदी लोगों को आमदनी के मुक़ाबले अपनी पारिवारिक और घरेलू ख़र्चों को पूरा करने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

ऐसे में नोटबंदी के बाद से ये वर्ग किसी तरह दोबारा नोटबंदी से पहले की आर्थिक स्थिति में पहुंचने की कोशिशों में लगा हुआ था.

लेकिन लॉकडाउन होने के बाद से इस वर्ग की कमाई पूरी तरह ख़त्म हो गई और देश की एक बड़ी आबादी अचानक से ग़रीबी रेखा के नीचे पहुंच गई.

पलायन की इस मानवीय त्रासदी के शुरुआती दौर यानी मार्च में जो लोग अपने गाँवों की ओर रवाना हुए, उनके पास फिर भी कुछ हज़ार रुपये थे.

लेकिन लॉकडाउन के महीने भर बाद जो लोग अपने गाँवों के लिए निकल रहे हैं, उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वे आने वाले दिनों में खाना खा सकें.

बीबीसी से बात करते हुए कई कामगारों ने बताया है कि वो किस तरह मजबूरी में अपने गाँवों की ओर निकल रहे हैं.

यहां ये समझना ज़रूरी है कि शहर में रहने वाले इनमें से ज़्यादातर लोगों की गृहस्थी उनके गाँवों में नहीं है.

कई लोगों के पास उनका अपना घर और ज़मीन नहीं है. कई लोगों के पास गाँव में राशन कार्ड, चूल्हे-चौके और किसी तरह की कमाई की व्यवस्था नहीं है.

एक तरह से ये लोग बिन-बुलाए मेहमान के रूप में अपने सगे-संबंधियों के पास जा रहे हैं.

ऐसे में ये समझना ज़रूरी है कि आने वाले दिन इन लोगों के लिए क्या लेकर आने वाले हैं.

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पलायन का सामाजिक पहलू

80 के दशक में पहाड़ों से उतरकर दिल्ली आए एक ऑटो चालक राम जी ने बीबीसी को अपनी मानसिक व्यथा बताई है.

वो कहते हैं, "शुरुआत में उनके पास कुछ पैसा था. लेकिन बीते दो महीने से खाली बैठने की वजह से उनके पास अब मात्र तीन हज़ार रुपये बचे हैं. और मकान मालिक भी किराया मांगने आ रहा है. ऐसे में अब उनके पास दो विकल्प हैं. पहला उधार लेकर किराया देना और दूसरा गाँव जाना."

राम जी की उम्र 55 पार कर गई है लेकिन लॉकडाउन से पहले तक वो रोज़ाना 10 घंटे से ज़्यादा समय तक ऑटो चलाते थे.

ताकि अपने बच्चों को बढ़िया खान-पान और शिक्षा दे सकें.

राम जी कुछ हद तक अपने को सफल भी मानते हैं. अब उनकी बस एक ख़्वाहिश है कि उनकी एक बेटी और एक बेटा ठीक से पढ़ाई कर लें तो वे एक सफल व्यक्ति के रूप में अपने गाँव लौटें.

ये सब कहने के बाद राम जी बीबीसी संवाददाता से दरख़्वास्त करते हैं कि उनका नाम बदल दिया जाए ओर यहां पर उनका नाम बदला गया है.

संभवत: ये दरख़्वास्त इसलिए थी ताकि सालों की मेहनत से शहर पहुंचकर सफल होने वाले एक व्यक्ति की बनी छवि को धक्का न लगे.

राम जी जिस वर्ग से आते हैं, वह शहर के अर्थशास्त्र में अपर लोअर क्लास और ग्रामीण अर्थशास्त्र में अपर मिडिल क्लास माना जाता है.

शहरों के ढांचे में ये वर्ग ईंटों के बीच छिपे हुए सीमेंट की तरह काम करता है.

इनमें दर्ज़ी, धोबी, डिलीवरी मैन, बिजली सही करने वाले, पिज़्ज़ा और तंदूरी चिकन बनाने वाले, सिक्योरिटी गार्ड, फल-सब्ज़ी बेचने वाले, फ्रूट चाट-पानी के बताशे (या गोल-गप्पे) बेचने वाले और बाज़ार चलाने वाले लोग शामिल हैं.

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किन हालातों को रह रहे हैं ये लोग?

बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने हाल ही में कुछ ऐसे ही लोगों से बात की है.

वो बताते हैं, "इन लोगों की हालत ऐसी है कि वे जहां से जो मिल रहा है, बस लेते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं. कहीं दया मिल रही है तो उसे भी सर-आंखों पर और कहीं क्रूरता मिल रही है, तो वो भी सिर-माथे."

सलमान रावी से बात करते हुए ऐसे ही एक प्रवासी कामगार अपनी आपबीती बताते हुए फ़फ़क-फ़फ़क कर रोने लगते हैं.

वो कहते हैं, "हम निकल जाएंगे, मर जाएंगे. जैसे भी होगा. हम निकल जाएंगे, बच्चों को लेकर. क्या क्या बताएं. यहां से भगा दिया, फिर वहां से भगा दिया. हम अंबाला से आ रहे हैं. छह दिन हो गए चलते-चलते. किसी की टूटी हुई साइकिल ली थी."

इन प्रवासी कामगार को रोता देखकर आसपास खड़े दूसरे कामगारों की आंखें भी नम हो जाती हैं.

इन जैसे लाखों प्रवासी कामगारों के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट कोरोना वायरस नहीं भूख है.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

क्यों पैदा हो सकता है खाने-पीने का संकट?

सालों तक दिल्ली में पत्रकारिता करने के बाद बिहार के पूर्णियां ज़िले में खेती किसानी कर रहे गिरींद्र नाथ झा मानते हैं कि इन शहरों से आए इन लोगों के सामने कमाने-खाने का संकट जारी है.

वो कहते हैं, "मैं कई ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जो कि बड़े शहरों में काम करते थे और संकट के दिनों में अपने गाँव वापस आए हैं. लेकिन ये लोग सिर्फ ईंट-मिट्टी गारा ढोने वाले मज़दूर नहीं हैं. ये स्किल्ड लेबर की कैटेगरी में आते हैं. ये वो लोग हैं जो एक तरह से शहर को चलाते हैं. अब सवाल ये है कि इन लोगों के लिए गाँवों में किस तरह का रोज़गार पैदा हो सकता है?"

गिरींद्र झा की तरह प्रवासी कामगारों के साथ बीते तीन महीनों से चल रहे एनडीटीवी के पत्रकार रवीश रंजन शुक्ल ने भी अपने अनुभव बीबीसी के साथ साझा किए हैं.

रवीश बताते हैं कि इटावा ज़िले में उनकी मुलाक़ात ऐसे कई लोगों से हुई जो कि बड़ी संख्या में अपने गाँव पहुंचे हैं.

रवीश कहते हैं, "कई ऐसे लोग हैं जो बीते पच्चीस-तीस सालों से शहरों में पानी-पूरी (पानी के बताशे) बेच रहे थे. इन लोगों के बच्चों का जन्म भी शहर में हुआ था और दूसरी पीढ़ी भी नौकरी की तलाश में है. ऐसे में ये लोग गाँव में रहने वाले अपने सगे-संबधियों के भरोसे शहर छोड़कर आए हैं. अब सवाल उठता है कि सगे-संबंधी आख़िर कितने दिनों तक इनके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठा पाते हैं?"

"ऐसे में अगर सरकार ने जल्द ही कोई मज़बूत क़दम नहीं उठाया तो ये स्थिति भयावह हो सकती है."

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क्या कर रही है सरकार?

सरकार की ओर से कई क़दम उठाए गए हैं. लेकिन इनमें वे क़दम शामिल नहीं हैं जो सड़क पर चल रहे इन प्रवासी कामगारों को तत्काल मदद पहुंचा सकें.

20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद अर्थशास्त्री अरुण कुमार इसे लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं.

वो कहते हैं, "इस समय सरकार की प्राथमिकता ये होनी चाहिए थी कि किसी तरह इन प्रवासी कामगारों की जान बचाई जा सके. सरकार को इस वर्ग, जिसकी इस समय आमदनी नहीं है, का संरक्षण करना चाहिए. इनके गुज़र-बसर की चीज़ें उपलब्ध करानी चाहिए. क्योंकि ऐसा नहीं होने पर इन चीज़ों की कमी समाज में एक अशांति को जन्म दे सकती है."

प्रवासी कामगारों के लिए इंतज़ामों में लगे एक शख़्स नाम न बताने की शर्त पर बताते हैं कि सरकार जितना भी कहे लेकिन इन लोगों तक कम मदद ही पहुंच पा रही है.

ये शख़्स कहते हैं, "शहरों से आए कुछ लोगों ने मनरेगा के तहत काम भी कर लिया. लेकिन उन्हें अब तक तनख़्वाह नहीं मिली है. और जाने कब मिलेगी. क्योंकि उनके जॉब कार्ड बनने में कई तरह की दिक़्क़तें आ रही हैं."

रवीश रंजन शुक्ल भी इसी समस्या की ओर इशारा करते हैं.

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वो कहते हैं, "मेरी बात एक गाँव के प्रधान से हुई जो कि इस बात से परेशान थे कि शहरों से आए इतने सारे लोगों का जॉब कार्ड इस तरह अचानक से कैसे बनवाया जाए. क्योंकि ज़्यादातर के काग़ज़ात आदि सब कुछ शहर का है."

सरकार की ओर से डायरेक्ट बैंक ट्रांसफ़र के तहत लोगों के खातों में डाले गए पैसों की बात की गई.

लेकिन हाइवे पर चल रहे लाखों प्रवासी कामगारों के लिए ये पैसा किस तरह मदद कर सकता है.

इसके साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना, राशन देने की व्यवस्था और रेहड़ी वालों के लिए क़र्ज़ आदि से जुड़ी योजनाओं को अमल में आने में कई हफ़्तों से महीनों लग सकते हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार इन प्रवासी कामगारों की मदद के लिए तत्काल क़दम क्यों नहीं उठा रही है.

कुछ विशेषज्ञ यहां तक कह रहे हैं कि किसी प्राकृतिक आपदा के समय सरकार जिस द्रुत गति से एनडीआरएफ़ की टीमें भेजती है, उस तरह के क़दम इस समय क्यों नहीं उठाए जा सकते हैं.

इस समय इन प्रवासी कामगारों की ज़िंदगी बचाने के लिए एनडीआरएफ़ की देखरेख में हाइवे किनारे उच्च स्तर के शिविर क्यों नहीं लगाए जा सकते हैं?

आख़िर क्यों गाड़ियां लगाकर उन्हें उनके घरों तक नहीं पहुंचाया जा सकता है?

लेकिन सरकार की ओर से एक नया फरमान आया है कि प्रवासी कामगारों को सड़कों और रेल पटरियों पर चलने से रोका जाए.

बीते काफ़ी समय से इस तरह के आदेशों की वजह से कामगार पुलिस की लाठी खाने और रेल पटरियों से होकर गुज़रने को मजबूर हो रहे हैं.

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क्या दंगे भड़क सकते हैं?

भारत एक ऐसा देश है जो बीते कई दशकों से अनाज के मामले में सरप्लस में चल रहा है.

इसके मायने ये हैं कि सरकारी गोदामों में इतना अनाज भरा हुआ है कि एक लंबे समय तक खाद्दान्न आपूर्ति की जा सकती है.

अर्थशास्त्री ज़्यां द्रेज़ ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में खाने-पीने के सामान में कमी नहीं होने की बात कही थी.

ज़्यां द्रेज़ के मुताबिक़, "भारत के गोदामों में इस समय साढ़े सात करोड़ टन अनाज है. इतना अनाज पहले कभी नहीं रहा. यह बफ़र स्टॉक के नियमों से तीन गुना अधिक है. जब अगले कुछ हफ़्तों में रबी की फसल कट जाएगी तो यह स्टॉक और बढ़ जाएगा. सरकार कृषि मंडियों में पैदा हुए व्यवधान को समझते हुए और अधिक मात्रा में अनाज खरीदेगी. राष्ट्रीय आपदा के समय इस भंडार के एक हिस्से का इस्तेमाल करना ही समझदारी होगी."

ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि प्रवासी कामगारों तक खाना और ज़रूरी सामान पहुंचाना कितना मुश्किल है?

प्रणब सेन ने भी अपनी चेतावनी में यही साफ़ किया था कि खाने के सामान की वितरण व्यवस्था ढीली होने से संकट पैदा हो सकता है.

भारत सरकार जिन राशन की दुकानों के ज़रिए ग़रीबों तक राशन पहुंचाने की कोशिश कर रही है, वो तंत्र ही भ्रष्टाचार और ख़ामियों से भरा पड़ा है.

देशभर में कई जगहों पर दस किलो की बोरी में तीन किलो राशन निकलने से जुड़ीं ख़बरें सामने आ चुकी हैं.

एक सर्वे में सामने आया है कि देश की राजधानी दिल्ली में सिर्फ़ 30 फ़ीसदी राशन की दुकानें राशन दे रही हैं.

बिहार सरकार भी कई दुकानों के ख़िलाफ़ कदम उठा चुकी है.

यहां ये बात ध्यान देने की है कि सरकार के गोदाम अनाज से भरे हुए हैं.

कई बार राशन की दुकानवाले सिर्फ़ इसलिए राशन नहीं दे रहे हैं क्योंकि परिवार का मुखिया राशन लेने के लिए मौजूद नहीं है.

आने वाले दिनों पर बात करते हुए रवीश कहते हैं कि सवाल इस बात का है कि जिसने जीवन भर पानी-पूरी और चाट बनाना सीखा है, वो अचानक से गड्ढा खोदना कैसे शुरू कर सकता है.

और शहर से आए इन कामगारों को इनके रिश्तेदार कितने दिन तक ख़ुशी-ख़ुशी खाना खिला पाएंगे?

सवाल और जवाब

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आपके सवाल

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    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

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    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

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    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

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  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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