वाराणसीः काशी विश्वनाथ के महंत को क्यों किया गया बेदख़ल?

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

वाराणसी यानी बनारस में विश्वनाथ कॉरिडोर से जुड़े विवाद अभी समाप्त भी नहीं हो पाए थे कि अब मंदिर से जुड़ा एक और विवाद सुर्ख़ियों में आ गया है. वर्षों से यहां शाम को होने वाली सप्तर्षि आरती को संपन्न कराने वाले महंत परिवार को इस कार्य से प्रशासन ने बेदख़ल कर दिया है और अब यह ज़िम्मा प्रशासन की ओर से नियुक्त 'पंडितों' को सौंप दिया गया है.

विश्वनाथ मंदिर में हर दिन शाम को होने वाली सप्तर्षि आरती को संपन्न कराने वाले महंत परिवार का आरोप है कि प्रशासन ने उन लोगों को अचानक मंदिर परिसर में जाने से रोक दिया.

महंत परिवार के सदस्य और सप्तर्षि आरती को संपन्न कराने वाले पंडितों की टीम के एक सदस्य राजेंद्र तिवारी ने बीबीसी को बताया, "गुरुवार को हम लोग जब आरती के लिए मंदिर जाने लगे तो एंट्री पास होने के बावजूद हमें रोका गया. पुलिस और प्रशासन के लोग एक-दूसरे पर इसकी ज़िम्मेदारी टालते रहे और आख़िरकार हम लोगों को अंदर नहीं जाने दिया गया. विवश होकर हमने सड़क पर ही बाबा विश्वनाथ जी की प्रतीकात्मक मूर्ति स्थापित करके वहीं आरती की."

महंत राजेंद्र तिवारी कहते हैं कि सप्तर्षि आरती न कराकर मंदिर प्रशासन ने तीन सौ साल से चली आ रही परंपरा को खंडित कर दिया. हालांकि मंदिर में आरती हुई लेकिन उसे कराने वाले वे लोग नहीं थे जो परंपरागत तरीक़े से अब तक आरती करते आ रहे थे. महंत परिवार के सदस्यों का आरोप है कि जिन लोगों से आरती संपन्न कराई गई वो मंदिर के कर्मचारी थे न कि प्रशिक्षित कर्मकांडी पंडित. मंदिर प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया है.

काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी यानी सीईओ विशाल सिंह ने बीबीसी को बताया कि मंदिर के सभी विद्वान अर्चकों की देखरेख में आरती संपन्न कराई जा रही है. उनका कहना था, "विश्वनाथ मंदिर की किसी भी परंपरा को न तो रोका जाएगा न ही उसमें बदलाव किया जाएगा. परंपरा के निर्वहन के लिए जिस भी व्यवस्था की ज़रूरत पड़ेगी मंदिर प्रशासन उसे समय पूर्व तैयारी करके उस परंपरा को सम्पन्न कराएगा."

बताया जा रहा है कि मामले की शुरुआत तब हुई जब कुछ दिन पहले काशी विश्वनाथ मंदिर के पास ही स्थित कैलाश मंदिर की एक दीवार के टूटने की ख़बर आई. यह मंदिर महंत परिवार के ही लोगों का है.

राजेंद्र तिवारी बताते हैं, "विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर महंत परिवार के सभी सदस्यों के मकान प्रशासन ने ज़बरन ले लिए. मंदिर को लेने की कोशिश लगातार हो रही है लेकिन यह अब तक नहीं ले पाए हैं. इस मंदिर को भी प्रशासन अपने कब्ज़े में लेकर वैसे ही ध्वस्त कर देना चाहता है जैसे कि कॉरिडोर के नाम पर सैकडों मंदिर यहां ढहा दिए गए. मंदिर की दीवार ख़ुद प्रशासन के लोगों ने ही ढहाई है और अब हमें नोटिस दिया जा रहा है कि हम अफ़वाह फैला रहे हैं."

इस ख़बर के बाद बड़ी संख्या में लोग लॉकडाउन के बावजूद मंदिर परिसर के आस-पास जुट गए. सीईओ विशाल सिंह बताते हैं, "मैं ख़ुद वहां गया था लेकिन ऐसी कोई बात नहीं हुई थी. लॉकडाउन के वक़्त लोगों को भड़काने और माहौल ख़राब करने के लिए कुछ लोगों को हमने नोटिस भेजा है. नोटिस में यही कहा कया है कि आप इसका जवाब दीजिए, उसके बाद ही मंदिर में जाने दिया जाएगा. हमें अभी भी जवाब का इंतज़ार है."

काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत परिवार के कई लोगों के घर मंदिर के आस-पास ही हैं. विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने के लिए बड़ी संख्या में जो मकान प्रशासन ने लिए हैं उनमें इन लोगों के भी मकान हैं.

वाराणसी के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार विक्रांत दुबे कहते हैं, "यहां जब मकानों को गिराने के नोटिस मिले थे और मंदिर गिराए गए थे तो उस मामले में भी महंत परिवार के लोग काफ़ी मुखर होकर विरोध कर रहे थे. प्रशासन से उनकी लड़ाई तभी से चल रही है. दूसरे, सिर्फ़ सप्तर्षि आरती ही अब तक एकमात्र ऐसा कर्मकांड था जिसे महंत परिवार संपन्न करा रहा था. इस काम से बेदख़ल होने के बाद अब पूरी तरह से मंदिर पर प्रशासन का वर्चस्व हो जाएगा."

महंत परिवार पर लगा है चोरी का आरोप?

विक्रांत दुबे बताते हैं कि महंत परिवार और काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन की लड़ाई क़रीब चार दशक पुरानी है. वो बताते हैं, "साल 1983 में बाबा दरबार में चोरी की एक बड़ी घटना हुई थी जिसमें मंदिर में लगे सोने को चोर चुरा ले गए थे. जांच पड़ताल में आरोपों की आंच महंत परिवार और उनसे जुड़े पंडों तक पहुंची. मामला कोर्ट में भी गया. इसके बाद मंदिर की व्यवस्था और पूजा से महंत परिवार को हटाने का निर्णय लिया गया. लेकिन उस समय के एक बड़े कांग्रेसी नेता के हस्तक्षेप से सप्त ऋषि आरती महंत परिवार के लोगों को करने की छूट दे दी गई."

राजेंद्र तिवारी बताते हैं कि यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है और प्रशासन को सिर्फ़ मंदिर की व्यवस्था सुधारने के लिए लिया गया था. वो बताते हैं, "चालीस साल से व्यवस्था ही नहीं सुधर रही है. मंदिर का प्रशासन चलाने के लिए सरकार ने जो ट्रस्ट बनाया है उसे पब्लिक ट्रस्ट बताया जाता है जबकि उसमें ज़्यादातर प्रशासन और पुलिस के अधिकारी शामिल हैं."

महंत परिवार और मंदिर प्रशासन के बीच पिछले दो-तीन साल से विवाद गहराने लगा है, ख़ासकर जब से विश्वनाथ कॉरिडर परियोजना की शुरुआत हुई है. मंदिर से जुड़े लोग बताते हैं कि इस साल की शुरुआत में ही मंदिर प्रशासन ने महंत परिवार को पूरी तरह से किनारे लगाने के लिए रणनीति बनानी शुरू की.

होली के ठीक पहले रंगभरी एकादशी के दिन जिस रजत जड़ित पालकी में बैठकर बाबा विश्वनाथ गौना के लिए जाते हैं, उस पालकी को मंदिर प्रशासन ने रोक लिया, जबकि यह पालकी महंत परिवार को वापस कर दी जाती थी. काफ़ी हंगामे के बाद प्रशासन ने पालकी वापस कर दी. हालांकि मंदिर के सीईओ विशाल सिंह इसे महंत परिवार का आपसी विवाद बताते हैं.

बहरहाल, मंदिर प्रशासन और महंत परिवार का विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा है. महंत परिवार जहां प्रशासन पर मंदिर और मंदिर परिसर की प्राचीनता को नष्ट करके व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बनाने का आरोप लगा रहा है, वहीं प्रशासन का कहना है कि वह इस परिसर का सुंदरीकरण करने में लगा है. इस टकराव के बीच, सड़क पर आरती करने के मामले में वाराणसी ज़िला प्रशासन ने महंत परिवार के कुछ लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है. इसमें मुख्य महंत शशिभूषण तिवारी उर्फ़ गुड्डू महराज के अलावा बीस अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत चालान किया गया है.

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