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कोरोना वायरस: सूरत में सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं प्रवासी मज़दूर?
- Author, तेजस वैद्य
- पदनाम, बीबीसी गुजराती सेवा
सूरत में हीरा उद्योग के कामगार राम हरि कहते हैं, "हर दिन दो-ढाई घंटे लाइन में खड़े रहने के बाद भी सिर्फ़ दाल-भात और दो रोटियां ही मिलती हैं."
जब राम हरि ने यह बात कही तब वो दोपहर के भोजन के लिए लाइन में खड़े थे.
तालाबंदी के दूसरे चरण की घोषणा के बाद, सूरत में लगातार दो दिनों तक सैकड़ों मज़दूर सड़कों पर उतरे थे.
मंगलवार शाम को वराछा क्षेत्र में और बुधवार शाम को पंडोल क्षेत्र में बड़ी संख्या में कामगार सड़कों पर उतर आए थे और मांग की कि उन्हें अपना घर लौटने दिया जाए.
कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन की घोषणा के बाद से ही यह कामगार सूरत में फंसे हुए हैं.
इनका कहना है कि उनके पास न तो नौकरी है और न ही पैसा और उन्हें दो वक़्त का भोजन पाने में भी संघर्ष करना पड़ता है.
राम हरि की तरह हर दिन हज़ारों कामगार भोजन के लिए हर रोज़ लाइन में खड़े हो जाते हैं और जो मिलता है उससे वो गुज़ारा कर लेते हैं.
राम हरि कहते हैं, "मेरा परिवार सूरत में मेरे साथ है और हम सभी कष्ट झेल रहे हैं. तालाबंदी के बीच हमें दिन में एक बार खाना मिलता है. हम हर दिन दो या ढाई घंटे तक लाइन में कैसे खड़े रह सकते हैं?"
"हम बड़ी संख्या में यहां इकट्ठे हुए थे क्योंकि हमें यहां पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है. यही कारण है कि हमें ओडिशा में अपने गांव वापस जाना है."
ओडिशा में भी तालाबंदी है. अगर आपको यहां परेशानी हो रही है तो वहां भी नहीं होगी?
इस सवाल का जवाब में उन्होंने कहा, "अपने घर में कम से कम एक रोटी तो मिलेगी.''
"दूसरा, अगर हमारा अपना क्षेत्र है, तो हम अपनी भाषा में बात करेंगे और हमारे पास साहस होगा."
राम हरि आगे कहते हैं, "हम सूरत में एक किराए के घर में रह रहे हैं. अगर हम भोजन की तलाश में बाहर जाते हैं, तो लोग हमें पूछते हैं कि तालाबंदी है, तो हम बाहर क्यों निकलते हैं? हमें भोजन के लिए तो निकलना पड़ता है ना."
ओडिशा के रहने वाले प्रकाश गोंडा, सूरत के लसकाना इलाक़े में रहते हैं और एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करते हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "तालाबंदी के बाद काम बंद हो गया. जो पैसा बचा था वह अब ख़त्म हो गया है. अब कोई पैसा बचा नहीं है."
"जब लॉकडाउन की घोषणा की गई थी तब थोड़े पैसे थे. उससे थोड़े दिन तो काम चल गया था, लेकिन अब पैसा ख़त्म हो गया है. पिछले 12-13 दिनों से हमें जो मिलता है वह खाकर गुज़ारा कर लेते हैं."
"खाने के लिए एक घंटे के लिए धूप में खड़ा होना पड़ता है. फिर भी, जो भी उपलब्ध है, उससे काम चलाना पड़ता है."
"हम महसूस करते हैं कि तालाबंदी आवश्यक है. सरकार ने सटीक क़दम उठाए हैं, लेकिन हमारी सरकार से यही प्रार्थना है कि या तो हमें यहाँ काम दें या हमें अपने गृहराज्य ओडिशा जाने दें."
14 अप्रैल को भी सूरत के वराछा रोड पर बड़ी संख्या में हीरा उद्योग, कपड़ा और कढ़ाई के कामगार सड़क पर उतर आए थे.
उनकी एकमात्र मांग थी कि उनके घर लौटने की व्यवस्था की जाए.
कामगारों के सड़क पर उतरने के बाद पुलिस भी दौड़ पड़ी.
उस घटना के बारे में बीबीसी से बात करते हुए सूरत के पुलिस कमिश्नर आर बी ब्रह्मभट्ट ने कहा, "700-800 कामगार सड़क पर थे. उन्हें घर जाना था. वे अपने गांव जाने की मांग कर रहे थे."
कामगार यह भी शिकायत करते हैं कि कोई भोजन उपलब्ध नहीं है और जो व्यवस्था है उस में भोजन के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है.
इस बारे में आर बी ब्रह्मभट्ट ने कहा, "कुल मिलाकर भोजन प्रणाली अच्छी है. अब सबको घर पर मिलने वाला भोजन तो नहीं मिल सकता है ना."
आरबी ब्रह्मभट्ट ने कहा, "प्रशासन प्रबंध कर रहा है ताकि उन्हें लंबे समय तक लाइन में खड़ा न होना पड़े."
वो कहते हैं, "इसके अलावा जो छोटी-मोटी समस्याएं हैं उनको भी हम हल करेंगे."
देश के अन्य राज्यों में फंसे गुजरात के लोगों को गुजरात वापस लाने की बात चल रही है. इस तरह से ओडिशा या उत्तर प्रदेश, बिहार से मूल निवासियों को वापस भेजने की कोई व्यवस्था हो रही है?
इस सवाल के जवाब में, आर बी ब्रह्मभट्ट ने कहा, "नहीं, ऐसा कोई नियम नहीं है. मेडिकल इमर्जेंसी को छोड़कर, जो जहां है उसे वहीं रहना है. यदि मेडिकल इमर्जेंसी या ऐसा ही कोई आपातकाल मामला है, तो ज़िला कलेक्टर से अनुमति लेनी होगी."
सूरत में 800 लोग सार्वजनिक रूप से एकत्रित हुए थे. ये अधिसूचना का उल्लंघन था और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया गया था. इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई की संभावना है?
इस सवाल के जवाब में आरबी ब्रह्मभट्ट ने कहा, "हम इसके बारे में सोच रहे हैं."
10 अप्रैल की शाम को भी सूरत में प्रवासी कामगार सड़क पर उतरे थे. हिंसक विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ उन्होंने, वेतन और गांव वापसी की मांग भी की थी.
पुलिस ने हिंसक विरोध प्रदर्शन के लिए उस समय 60 लोगों को हिरासत में लिया था. 14 और 15 अप्रैल को फिर से कामगार सड़कों पर उतर आए थे और उन्होने गाँव वापसी की मांग की थी.
श्रमिकों के अधिकारों के लिए कार्यरत गुजरात की मजदूर अधिकार मंच संस्था के महासचिव मीना बहना जादव ने बीबीसी को बताया," प्रधानमंत्री ने 14 अप्रैल को सुबह राष्ट्र को संबोधित किया था और तीन मई तक तालाबंदी की अवधि बढ़ा दी. उसी दिन शाम को सूरत में बड़ी संख्या में श्रमिक सड़क पर उतर आए थे."
"मुझे लगता है कि ये कामगार प्रतीक्षा कर रहे थे कि आज सरकार लॉकडाउन को थोड़ी रियायत देगी और उनके घर जाने की व्यवस्था करेगी."
"ऐसा हुआ नहीं. इस से निराश कामगार सड़क पर उतरे होंगे. सरकार विदेशों में रह रहे भारतीयों को स्वदेश लाने की योजना बना सकती है पर जिन के पसीने से यह देश का दिल धड़कता है उन श्रमिकों की सरकार अनदेखी कर रही है."
वह कहते हैं, "सरकार को कम से कम उनके लिए राशन और आवास उपलब्ध कराना चाहिए. अहमदाबाद जैसे राज्य के कई प्रमुख शहरों के श्रमिक हमें भोजन की व्यवस्था के लिए कहते हैं. हम हर संभव प्रयास करते है."
"यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि प्रशासन तालाबंदी के दौरान श्रमिकों के लिए पर्याप्त फूड पैकेट्स प्रदान करने में विफल रहा है. गुजरात में कई स्थानों पर दूसरे राज्यों के मजदूर असमंजस की स्थिति में हैं."
"सरकार ने अन्न ब्रम्ह योजना के तहत भोजन देने की बात की है, लेकिन जो राशि ज़रूरतमंदों तक पहुंचनी चाहिए वह नहीं पहुंची है. सरकार को श्रमिकों के लिए 10-15 दिनों के लिए पर्याप्त भोजन सामग्री उपलब्ध करवानी चाहिए."
सूरत में 14 अप्रैल की शाम को कामगार एकत्रित हुए थे तब एक कामगार ने मीडिया से बात करते हुए कहा था, "यहाँ दो रोटी और अंडा खिलाते हैं. हम चाहते हैं कि हमें गाँव वापस भेजा जाए. यदि वहां हम मर भी जाते हैं, तो चलेगा, पर हम गाँव वापस जाना चाहते हैं."
"उस के बाद छह महिना, साल भर के लिए लॉकडाउन कर देना. हम लोग अपने घर पर खा सकते हैं, रह सकते हैं. किसी और के घर नहीं जाएंगे."
सूरत में डीसीपी राकेश बारोट ने 14 अप्रैल को एक मीडिया के साथ बातचीत में कहा था कि "जो कामगार इकठ्ठा हुए थे उनकी मांग थी कि उन्हें अपने वतन भेज दिया जाए. उनके पास भोजन की कोई व्यवस्था नहीं थी. इसलिए हमने उनके लिए भोजन की व्यवस्था की थी."
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