कोरोना वायरस: लॉकडाउन बढ़ा तो मोदी सरकार की तैयारी कितनी?

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    • Author, गुरप्रीत सैनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

अगर आप कोरोना वायरस के हॉटस्पॉट वाले इलाक़े में नहीं रहते हैं और ज़रूरी सामान राशन की दुकान से ख़रीदते हैं तो बहुत मुमकिन है कि आपको अपने पसंदीदा ब्रैंड का सामना आजकल नहीं मिल रहा होगा. कई लोगों की शिकायत है कि मैगी ग़ायब है, कई लोगों का कहना है कि उनके पंसदीदा बिस्किट नहीं मिल रहे हैं.

21 दिन के लॉकडाउन में ज़रूरी सामानों पर तो कोई रोक नहीं थी, लोगों को सामना मिलता भी रहा है. लेकिन चिंता जताई जा रही है कि अगर लॉकडाउन बढ़ा तो आने वाले दिनों में आटा, दाल, पैक्ड फूड जैसी ज़रूरी चीज़ों की किल्लत हो सकती है.

दुकानदारों यानी रीटेलर्स का कहना है कि उनके पास फ़िलहाल चार से पाँच दिन का स्टॉक है. हालांकि कुछ ब्रैंड्स की चीज़ें ख़त्म भी हो चुकी हैं. वहीं इन रिटेलर्स को सामान सप्लाई करने वाले डिस्ट्रिब्यूटर्स का कहना है कि उनके पास दस से पंद्रह दिन का स्टॉक है. लेकिन ट्रांसपोर्ट की दिक़्क़त की वजह से कई जगह डिस्ट्रिब्यूटर्स, रिटेलर्स तक सामान नहीं पहुंचा पा रहे हैं.

दरअसल किसानों से फ़सलें मंडियों तक पहुंचती हैं. वहां से फैक्ट्रियों में जाती हैं. फिर वहां से सामान बनकर पैक होकर होल सेलर के पास पहुंचता है. डिस्ट्रिब्यूटर से फिर रिटेल के पास जाता है. इसे कहते हैं सप्लाई चेन.

लेकिन कई फैक्ट्रियों में उत्पादन रुका हुआ है. जिसका सीधा असर आगे चलकर ग्राहकों यानी हम पर और आप पर पड़ सकता है.

फैक्ट्रियों में काम बाधित

गुड़गांव चैंबर फॉर कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष विकास जैन चिंता जताते हैं कि अगर लॉक डाउन दो या तीन हफ़्ते बढ़ता है तो ज़रूरी सामान की दिक़्क़त ज़रूर आएगी.

वो कहते हैं, "एफएमसीजी में डिस्ट्रिब्यूटर से लेकर रीटेलर तक भी एक पूरी सप्लाई चेन होती है, जिसमें आम तौर पर तीन-चार हफ्ते का गैप होता है, जिससे उनके पास कम से कम तीन-चार हफ्ते का स्टॉक रहता है. इसलिए तीन-चार हफ्ते के अबतक के लॉकडाउन में कोई दिक़्क़त नहीं आई. लेकिन इसके आगे अब चुनौतियां आएंगी."

बंद पड़ा बाज़ार

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एफएमसीजी यानी फास्ट मूविंग कन्जूमर गुड्स को आम तौर पर कन्जूमर पैकेज्ड गुड्स भी कहा जाता है. साबुन, डिटर्जेंट, शैम्पू, टूथपेस्ट, शेविंग प्रोडक्ट, जूते की पॉलिश, पैकेज्ड खाना, स्किन केयर का सामान जैसे सामान शामिल हैं.

विकास जैन के मुताबिक, अब फैक्ट्रियों से डिस्ट्रिब्यूटर तक माल नहीं पहुंचा, तो आगे की राह मुश्किलों से भरी होगी.

मालिकों को सरकार से ज़रूरी सामानों की फैक्ट्री चलाने की अनुमति मिली हुई है, वो फैक्ट्री चलाना भी चाह रहा है और अपने वर्कर को बुला भी रहे हैं. लेकिन फैक्ट्रियों के पास लेबर ही नहीं है. प्रवासी मज़दूर अपने घरों को लौट गए हैं. वहीं परमानेंट वर्कर भी फैक्टियों में नहीं आ रहे हैं. उनके सिर्फ़ 10 या 15 प्रतिशत वर्कर ही आ रहे हैं.

वहीं पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स में रिटेल कमिटी के चेयरमैन साकेत डालमिया कहते हैं, "अगले 10 से 15 दिन और काम चल जाएगा, क्योंकि जो ब्रैंड पहले कम बिकते थे, अब उनका माल बिकेगा. आपको किसान कैचअप नहीं मिलेगा तो आप मैगी केचअप खोजेंगे, मैगी का नूडल नहीं मिलेगा तो आप दूसरा खोजेंगे. आपको शक्तिभोग आटा नहीं मिलेगा तो आप दूसरा विकल्प देखेंगे. लेकिन उसके बाद चुनौती खड़ी हो जाएगी. इसलिए ज़रूरी है कि फैक्ट्रियों को चलाने के लिए क़दम उठाए जाएं."

इसमें अगर ख़ास तौर पर खाने के सामानों की बात करें तो विकास जैन के मुताबिक, फूड फैक्ट्रियों लगातार नहीं चलने से बहुत नुकसान झेल रही हैं.

वो बताते हैं, "किसी भी फूड फैक्ट्री की लाइन लगातार चलानी पड़ती है, क्योंकि फैक्ट्री में हाइजीन, स्टैंडर्ड सब रखना है. उसके साथ ही उसे माइक्रो बायोलॉजी भी मैनटेन करनी होती है. लेकिन अगर लाइन स्टार्ट और स्टॉप पर चलती है तो फैक्ट्री की कॉस्ट बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि उसे बार-बार साफ करके चलाना और फिर उसे सेनेटाइज़ करना पड़ता है. स्टार्ट - स्टॉप की वजह से बीच-बीच में प्रोडक्ट ख़राब होने का ख़तरा भी रहता है."

फैक्ट्रियों को इसलिए अपना उत्पादन बीच-बीच में रोकना पड़ रहा है क्योंकि ट्रक ड्राइवर कम हैं, इसलिए बहुत कम चक्कर लगा रहे हैं.

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आटा, दाल, चावल

दिल्ली फूड ग्रेन एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेश गुप्ता कहते हैं कि फिलहाल दिल्ली और आस-पास के इलाक़ों में आटा, दाल, चावल, तेल जैसे ज़रूरी सामानों की किल्लत नहीं है. लेकिन आने वाले वक्त में इस किल्लत से तभी बचा जा सकता है, अगर फूड ग्रेन की ट्रांसपोर्टेशन का फ्लो बना रहे.

उन्होंने कहा कि ज़रूरी सामानों की चेन कमज़ोर होगी तो सामान लोगों तक कहां से पहुंचेगा? लेबर चली गई है. ट्रक ड्राइवर नहीं हैं.

वो कहते हैं, "ट्रक वालों को रास्ते में ना कहीं चाय-पानी मिलता और ना कहीं खाना मिलता है. कुछ ट्रांसपोर्टेशन हो भी रहा है तो किराए ज़्यादा हो गया हैं. जैसे मध्य प्रदेश से आने वाला चना पहले 150 रुपए प्रति क्विंटल में आता था अब प्रति क्विंटल ढाई सौ रुपए में आ रहा है."

लेबर की कमी की वजह से फूड ग्रेन की ज़्यादातर पैकेजिंग इंडस्ट्री बंद हैं, जिन्हें वो खोले जाने की मांग करते हैं. वो कहते हैं कि अगर मिल में आटा बना तो उसे पैक भी तो करना पड़ेगा.

अगर चावल तैयार है, लेकिन उसे पैक करने के लिए थैला नहीं मिलेगा तो कैसे काम चलेगा. गेहूं तैयार है और गेहूं का बोरा नहीं मिलेगा तो कैसे काम चलेगा.

सामान खरीदने लाइन में लगे लोग

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लेबर और ट्रांस्पोर्टेशन असल दिक़्क़त

व्यापारियों के शीर्ष संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने कहा है कि देश भर में ज़रूरी सामानों की आपूर्ति को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है.

कैट, ऑल इंडियन ट्रांसपोर्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन से इस बारे में चर्चा कर रही है, जिससे उनके मुताबिक़, पिछले दो-तीन दिन में स्थिति कुछ बेहतर हुई है. लेकिन अभी भी ट्रांसपोर्ट पूरी तरीके से ऑपरेट नहीं हो रहा है.

दअसल सरकार ने पहले ट्रकों से सिर्फ ज़रूरी सामानों के ट्रांसपोर्टेशन को अनुमति दी थी. लेकिन अगर ट्रकों को किसी एक जगह से ज़रूरी सामान उठाना है तो वो वहां तक खाली तो जाएगा नहीं, इस नुकसान के बारे में सोचकर कई ट्रक रुक गए. एक हफ्ते बाद सरकार ने कहा कि अब गैर-ज़रूरी सामानों को लेकर भी ट्रक चल सकते हैं, लेकिन तबतक कई लोग अपने घरों को लौट चुके थे.

ट्रांस्पोर्टेशन

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कैट के अध्यक्ष प्रवीण खंडेलवाल ने बीबीसी हिंदी से कहा कि स्पलाई चेन से जुड़े सभी वर्गों की आपसी भागीदारी बहुत ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि थोक व्यापारियों/वितरकों, खुदरा विक्रेताओं, निर्माताओं या उत्पादकों, ट्रांसपोर्टरों, कूरियर सेवाओं, आवश्यक वस्तुओं के लिए ज़रूरी कच्चे माल निर्माताओं या उत्पादकों समेत पैकेजिंग उत्पादों के उत्पादकों के बीच ज़्यादा तालमेल की ज़रूरत है.

प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री और वाणिज्य मंत्री से अपील की है कि इस चेन को बनाए रखने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया जाए. जिसमें सभी के प्रतिनिधि हों. वो रोज़ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए मिले, जिससे सप्लाई चेन में आई किसी भी परेशानी से तुरंत निपटा जा सके.

पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स में रिटेल कमिटी के को-चेयरमैनन प्रदीप अग्रवाल बताते हैं कि ज़रूरी समानों वाली फैक्टियों के मालिकों से सरकार की बातचीत चल रही है. सरकार कोशिश कर रही है कि ज़रूरी सामानों वाली फैक्ट्रियां चलती रहें.

ये सुझाव भी दिए जा रहे हैं कि उन प्लांट्स को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिनके वर्कर को वहीं रहने की जगह दी जाती है या जिन्हें ज़्यादा दूर तक ट्रेवल नहीं करना पड़ता. साथ ही मालिक, वर्करों को खाना और सही हेल्थकेयर दें और साफ सफाई का ध्यान रखें.

एफएमसीजी भारतीय अर्थव्यवस्था में चौथा सबसे बड़ा सेक्टर है. ज़रूरी रॉ मेटेरियल, सस्ते लेबर और पूरी वेल्यू चेन में मौजूदगी होने की वजह से भारत मार्केट में कड़ी टक्कर देता है.

2017-18 में एफएमसीजी सेक्टर की कमाई करीब तीन लाख 68 हज़ार करोड़ रुपए रही थी, जिसके 2020 तक बढ़कर करीब सात लाख 25 हज़ार करोड़ रुपए होने का अनुमान था. ग्रामीण इलाक़ों का इसमें करीब 45 प्रतिशत योगदान माना जाता है.

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