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लॉकडाउन: HIV एड्स और सर्जरी वाले कोरोना से कितने परेशान
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्य प्रदेश के उज्जैन के रहने वाले 39 साल के दिरलेश व्यास एक सड़क दुर्घटना के शिकार हो गए थे. इसमें उनके एक पैर की हड्डी टूट गई.
आठ मार्च को उनका एक ऑपरेशन हुआ था, जिसमें उनके पैर में रॉड डाली गई. डॉक्टर ने 10 दिन बाद दूसरा ऑपरेशन करके प्लेट डालने की बात कही थी.
लेकिन उज्जैन में कोरोना फैलने के बाद वहां ऑपरेशन रोक दिए गए. दिरलेश को घर भेज दिया गया और कहा गया कि स्थिति ठीक होने के बाद दूसरा ऑपरेशन किया जाएगा.
दिरलेश अब घर पर हैं. 24 घंटे बेड पर लेटे रहते हैं, हिल-डुल नहीं सकते. उनका कहना है कि अगर दूसरा ऑपरेशन भी वक़्त पर हो जाता तो वो जल्दी ठीक हो सकते थे.
देश इस वक़्त कोरोना वायरस से लड़ने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का फोकस कोरोना के मरीज़ों पर है. प्रमुख अस्पतालों की ओपीडी और दूसरी स्वस्थ्य सेवाएं बंद कर दी गई हैं, साथ ही गैर-ज़रूरी सर्जरी रोक दी गई हैं. हालांकि इमर्जेंसी सेवाएं चल रही हैं.
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टीबी के मरीज़ का हाल
एचआईवी से पीड़ित 32 वर्षीय रवि (बदला हुआ नाम) कुछ दिन पहले ही टीबी की चपेट में भी आ गए.
मुंबई में बांद्रा स्थित भाभा अस्पताल में उन्होंने खुद को दिखाया, जहां हाल में ही टीबी के लिए उनकी दवा शुरू की गई थी.
लेकिन दोनों दवा साथ लेने की वजह से उन्हें उल्टी, घबराहट, नींद ना आना जैसे कुछ साइड इफेक्ट शुरू हो गए.
इस बीच भाभा अस्पताल में ओपीडी समेत सभी दूसरी स्वास्थ्य सेवाएं बंद कर दी गई हैं.
साइड इफेक्ट की वजह से परेशान रवि, डॉक्टर को नहीं दिखा पा रहे हैं, जिसके चलते उन्होंने अब ख़ुद ही एचआईवी और टीबी, दोनों की दवा लेना बंद कर दीं. उनके क़रीबी उन्हें दवा ना छोड़ने के लिए समझा रहे हैं.
इलाज ना होने से 17 साल की नीतू ने दम तोड़ा
17 साल की नीतू का परिवार उनके इलाज के लिए हरियाणा के पलवल से दिल्ली आया था. वो नीतू को लेकर कई अस्पतालों में गए. लेकिन एम्स समेत दूसरे बड़े अस्पतालों की ओपीडी बंद होने की वजह से किसी डॉक्टर को नहीं दिखा सके.
परिवार के पास कहीं रहने का ठिकाना नहीं था. कुछ दिन गुरद्वारे में, तो कुछ दिन पार्क में रहकर दिन निकाले. इस बीच नीतू की तबीयत बहुत ज़्यादा ख़राब हो गई.
परिवार को मुताबिक़ नीतू के फेफड़ों में पानी भर गया था. पहले एनडीएमसी के डिस्पेंसरी में इलाज कराया, फिर स्थिति ज्यादा ख़राब हुई तो दिल्ली के आरएमएल अस्पताल की इमर्जेंसी सेवा में लेकर गए. जहां उन्हें इलाज के लिए मना कर दिया गया और कहा गया कि उन्हें ओपीडी में ही दिखाना चाहिए.
परिवार का आरोप है कि इलाज ना मिलने की वजह से नीतू ने बुधवार को दम तोड़ दिया.
देश भर के शहरों का हाल
दिल्ली, मुबंई के बड़े अस्पतालों के अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी घनी आबादी वाले राज्यों के प्रमुख अस्पतालों में ओपीडी और अन्य सेवाएं बंद हैं.
बिहार में पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, नालंदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस और मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल को पूरी तरह कोरोना के मरीज़ों के लिए डेडिकेट कर दिया गया है और ओपीडी समेत सभी अन्य स्वास्थ्य सेवाएं रोक दी गई हैं.
वहीं उत्तर प्रदेश में KGMU अस्पताल यानी किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, पीजीआई, लखनऊ स्थित राम मनोहर लोहिया समेत तमाम बड़े अस्पतालों में इमर्जेंसी या अन्य बेहद ज़रूरी सेवाओं को छोड़कर सब बंद कर दिया गया है.
HIV मरीज़ों का हाल
मुंबई के कलवा इलाक़े के रहने वाले मुकेश (बदला हुआ नाम) एचआईवी से पीड़ित हैं. बुधवार को उनकी दवाइयां ख़त्म होने को थी. दवा लेने के लिए वो ठाणे स्थित नज़दीकी एआरटी केंद्र जाने के लिए घर से निकले, लेकिन रास्ते में उन्हें रोक दिया गया.
मुकेश ने पुलिस को बताया कि उनके लिए दवा लेना बहुत ज़रूरी है, लेकिन पुलिस वालों ने उन्हें फिर भी घर वापस भेज दिया. हालांकि बाद में वो किसी तरह दूसरे अस्पताल पहुंचे और दवा ली.
लॉकडाउन को देखते हुए सरकार ने एचआईवी मरीज़ों के लिए किसी भी नज़दीकी एआरटी केंद्र से दवा लेने की सुविधा दी है, लेकिन ट्रांसपोर्ट बंद होने की वजह से मरीज़ दवा नहीं ले पा रहे हैं. ऐसी शिकायत कई एचआईवी से पीड़ितों की है.
सेकेंड लाइन की एचआईवी मरीज़, रश्मी (बदला हुआ नाम) एक हफ्ते से अपने एक रिश्तेदार के यहां ग्रामीण इलाक़े में फंसी हैं. उनकी दवा चार दिन पहले ख़त्म हो चुकी है.
एचआईवी और एड्स के मरीज़ों के लिए काम करने वाली संस्था हमसफ़र ट्रस्ट से जुड़े तिनेश चोपड़े कहते हैं, "हमारे पास भी परेशान मरीज़ों के फ़ोन आ रहे हैं, जो दवा लेने नहीं जा पा रहे हैं. एचआईवी के कई मरीज़ बहुत ग़रीब तबके से आते हैं. वो मुफ्त दवा के लिए सरकारी केंद्रों पर निर्भर हैं. मरीज़ की स्थिति के हिसाब से उन्हें एक महीने तक का दवा का स्टॉक दे दिया जाता है. लेकिन जब महीने के आखिर में लॉकडाउन की घोषणा हुई, तो बहुत से मरीज़ों की दवा ख़त्म हो रही थी. अब कई लोग दवा लेने के लिए सरकारी केंद्र तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं."
एचआईवी मरीज़ों की दवाएं रखने वाले एआरटी सेंटर खुले हैं, लेकिन मरीज़ वहां तक पहुंच नहीं पा रहे हैं.
हालांकि दवा लेने जाने वाले लोगों को ग्रीन कार्ड जारी करने की बात कही जा रही है, जिसे दिखाकर वो जा सकते हैं. लेकिन मरीज़ पुलिस वालों से बात करने में घबरा रहे हैं, कुछ पुलिस वाले बताने पर भी उन्हें रोक रहे हैं. एचआईवी मरीज़ों को लेकर समाज में एक तरह का टैबू है, जिसकी वजह से इस बीमारी के मरीज़ पुलिस वालों को खुलकर वजह नहीं बता पा रहे हैं.
एक भी दिन दवा छूटी तो...
एचआईवी/एड्स के मरीज़ों के लिए हर रोज़ दवा लेना बेहद ज़रूरी है. अगर एक भी दिन दवा छूटी तो एचआईवी के विषाणु फिर से सक्रिय होने का ख़तरा होता है. इससे उनके पूरे पुराने इलाजे पर पानी फिर सकता है.
एआरटी यानी एंटी रेट्रोवायरस थेरेपी की दवाइयों की तीन लाइन होती है. अगर किसी वजह से दवाइयां रुक जाए तो दूसरी लाइन शुरू करनी पड़ती है. और दूसरी लाइन की दवा हर अस्पताल में मौजूद नहीं होती है. इससे मरीज़ों में डर बढ़ गया है.
गणेश आचार्य बताते हैं, फर्स्ट लाइन की दवा हर सेंटर में मिल जाती है, लेकिन वहां तक भी लोग नहीं पहुंच पा रहे हैं. लेकिन सेकेंड और थर्ड लाइन की दवा सिर्फ़ प्रमुख अस्पतालों में ही है.
थर्ड लाइन के लोगों को सेंटर पहुंचने में सबसे ज़्यादा दिक्क़त आ रही है. थर्ड लाइन की दवाएं गिने-चुने सेंटर में मिलती है. महाराष्ट्र में मुंबई में मिलती है, यूपी में बीएचयू में मिलती है, दिल्ली में भी एक-दो अस्पताल में ही मिलती है.
गणेश को डर है कि इस समस्या की वजह से एचआईवी पीड़ित बहुत से लोग फर्स्ट लाइन से सेकेंड लाइन में पहुंच सकते हैं.
नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइज़ेशन के 2017 के सर्वे के मुताबिक देशभर में 21 लाख लोग एचआईवी के साथ जी रहे हैं.
तिनेश बताते हैं कि उन्हें दिल्ली और गुड़गांव, नोएडा से भी कई मरीज़ों के फोन आए हैं, जिनका कहना है कि वो किसी और के घर में फंसे हैं और उनकी दवाइयां कहीं और रखी हैं. कई लोगों के ग्रीन कार्ड कहीं दूसरी जगह छूट गया है.
तिनेश कहते हैं कि "सरकार ने आदेश तो दिया है, लेकिन जब ये आदेश ग्राउंड पर उतरता है तो मुश्किलें आती हैं. कई बार पुलिस वालों को इस बारे में जानकारी भी नहीं होती."
सामाजिक कार्यकर्ता गणेश कहते हैं कि इस तरह के मेडिकल शट डाउन से ये होगा कि कोरोना के मरीज़ों से पहले कई एचआईवी के मरीज़ मर जाएंगे.
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