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'कोरोना का डर हमें अमानवीय बनाता जा रहा है': नज़रिया
- Author, प्रोफ़ेसर बद्री नारायण
- पदनाम, समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस और इससे पैदा हुई महामारी ने दुनिया के विभिन्न समाजों में बीमारी, मृत्यु के साथ-साथ 'भय' भी पैदा किया है.
यह भय कई बार बीमारी एवं उसके कारण हुई मृत्यु से भी ज़्यादा भयानक है और 'भय' मनुष्य से हमेशा ग़लती करवाता है.
कोरोना के समय में 'भय' हमारी मनुष्यता एवं मानवीयता को हरा रहा है. भय के कारण हम अपनों की मदद के लिए साक्षात उपस्थित नहीं हैं.
लेकिन अगर हम आज दूसरों के लिए उपस्थित हैं तो वो हैं मशीन उत्पादित संदेशों (एसएमएस), स्मार्टफोन्स के आईकॉन से संवेदना जताते एवं सोशल साइट्स से दे रहे अनेक सुझावों के रूप में.
मोबाइल फ़ोन, यूट्यूब संदेश, ऑडियो लिंक ही आज हमारे पास संवाद के साधन बन कर रह गए हैं.
इस 'भय' ने मानुष को अदृश्य कर दिया है एवं इसने 'वर्चुअल सच्चाई' और 'वर्चुअल दुनिया' का बहुगुणित विस्तार किया है.
इस भय ने हमें उस मुकाम पर पहुँचा दिया है जहाँ हम एक-दूसरे से डरने लगे है. हमने एक-दूसरे को एक दूसरे के लिए 'बायोलॉजिकल बॉम्ब' के रूप में देखना और समझना शुरू कर दिया है.
इसी भय ने हमारे 'मानवीय देह' को मात्र 'बायोलॉजिकल देह' में अवमूल्यित कर दिया है, या यूं कहें बदल दिया है.
अभी हाल ही में प्रवासी मज़दूर जब दिल्ली, पुणे, मुम्बई से कोरोना द्वारा निर्मित स्थिति यथा रोज़ी-रोटी के सहारे के ख़त्म होने के डर, डेस्टिनेशन में घर न होने के कारण मुश्किलें एवं असुरक्षा इत्यादि कारणों से अपने गाँवों एवं घरों की ओर लौटने लगे तो कुछ जगहों पर उन पर 'केमिकल' का छिड़काव किया गया.
यह 'केमिकल स्प्रे' बसों, लोहे के हैंडिलों, फ़र्श, फ्रेम, साफ़ करने के लिए उपयोग किया जाता है. बताया जाता है कि मानवीय देह पर हुए इस रासायनिक छिड़काव में सोडियम हाइपोक्लोराइट जैसा मानवीय त्वचा के लिए हानिकारक रसायन डाला गया था.
यह घटना उत्तर प्रदेश के बरेली में घटित हुई. ऐसी ही दूसरी घटना केरल के वायनाड ज़िले में हुई, जहाँ चौराहा पार करते हुए लोगों पर रासायनिक छिड़काव किया गया. बाद में वहाँ के अग्नि एवं सुरक्षा विभाग ने स्पष्ट किया कि इस स्प्रे में साबुन का झाग था, कोई हानिकारक रसायन नहीं.
इन दोनों घटनाओं से ज़ाहिर होता है कि कोरोना के भय ने हमें इतना अमानवीय बना दिया है कि हम अपने मानव बन्धुओं के एक भाग से 'अपने बीमार होने के भय से' भयभीत हो कुछ भी करने को तैयार हैं.
इससे ज़ाहिर होता है कि भय हमें कितना अमानवीय बना देता है. कोरोना हमें एक सिज़ोफ्रेनिक किस्म के भय संसार में डालता जा रहा है जिसमें हम हर क्षण दूसरों को देख चौंक जाते हैं और भयभीत हो जाते हैं.
इस भय में हम एक-दूसरे को बीमारी और अपने 'अन्त' का कारण समझने लगते हैं. अगर इस 'भय' की उपस्थिति मानवीय समाजों में ज्यादा दिन रही तो ये 'सोशल सिज़ोफ्रेनिया' भी पैदा कर सकती है.
जानेमाने चिन्तक जॉर्जियो अगम्बेन ने कोरोना पर अपनी राय जाहिर करते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही हैं.
उन्होंने कहा है, यह लगता है हम एक ऐसा समाज है, जिसके पास अपने को जिलाये रखने के सिवा और कोई मूल्य नहीं है. लगता है हम सिर्फ़ बेयर लाइफ़ (मात्र जीवन) में विश्वास करने लगे हैं और किसी चीज़ में नहीं."
"हम इस भय में अपने सहज जीवन के सभी मूल्य यथा मित्रता, समाजिक संबंध, काम, स्नेह, धार्मिक और राजनीतिक लगाव सब भूलने से लगे हैं.
इस भय में हम सभी को कोरोना फैलाने वाला 'संभावित देह' के रूप में देखने लगे हैं. हमारी बस एक ही चिंता रह गई है शायद - कि कहीं हम बीमार न हो जाएँ."
भय और सचेतता एवं सावधानी में फ़र्क होता है. कोरोना जनित परिस्थिति में हमें सचेत, सजग एवं सावधान तो रहना चाहिए, लेकिन भय को उस चूहे में नहीं बदलने देना चाहिए जो हमारे भीतर रह कर हमारी मानवीयता को कुतरता जाए.
भय के अति विस्तार को रोकने के लिए ज़रूरी है कि हम अपने भीतर की संवेदना को जीवित रखें. यही संवेदना हमारे भय को हमारा ही दुश्मन होने से रोक पाएगा.
कोरोना जनित परिस्थिति एवं इसके भय से दिल्ली से पलायन कर बिहार के सिवान पहुँचे प्रवासी श्रमिकों के एक दल को एक छोटे से जगह में लोहे के गेट के भीतर बंद कर दिया गया.
वे पूरी रात रोते और गिड़गिड़ाते रहे कि उन्हें इस "जेलनुमा जगह" से मुक्त किया जाए.
मीडिया में जब यह ख़बर फैली तो उन्हें ठूंस-ठूंस कर ट्रकों में भरकर पंचायतों में बने "आइसोलेशन सेन्टर्स" में पहुँचाया गया.
हम बीमारी से बचे रहे पर उन्हें एक साथ समूहों में छोटे जगहों में बंद कर एवं ट्रकों में ठूंस कर संभावित बीमारी के प्रसार के लिए "बायोलॉजिकल नेटवर्क" सहज ही प्रदान कर देना कितना ठीक है?
हम बचे रहें, दूसरों के बीमारी के शिकार होने की शर्त पर, यह भाव कहां तक ठीक है.
भारतीय परंपरा में देह को कभी इतना महत्व नहीं दिया गया. संत परंपरा और हमारी ज्ञान परंपरा में देह को आत्मा के अस्थायी लीला स्थल के रूप में देखा गया.
देह को माटी का मचान, रेत के समान भरा जाने वाला, पेड़ के पत्ते पर ओस की बूँद की तरह माना गया था. किन्तु आधुनिकता ने देह को ही सब कुछ सिद्ध कर दिया. आत्म एवं आत्मा का कोई मतलब ही नहीं रह गया.
फलतः ऐसा निर्मम स्वार्थ एवं जीने की लालच पैदा हुई जिसमें दूसरे के साथ आमनवीयता करके भी जीने की कोशिश दिखाई पड़ने लगी है. उपभोग की बढ़ती चाह ने हममें हमारे शारीरिक देह के प्रति गहरा लगाव पैदा किया है.
कोरोना के भय ने एक ऐसी स्थिति बनाई है जिसमें पश्चिमी देशों में कई जगह कोरोना से मरे लोगों के कब्र में दफ़नाने के लिए जाने को कोई तैयार नहीं हैं.
राजसत्ता ने स्वयं भी "मानव-मूवमेंट" को नियंत्रित कर लिया है. कोरोना जनित भय से एक-दूसरे से बचना ही हमारी सबसे बड़ी रणनीति होकर रह गई है.
अगर "कोरोना कन्डीशन" कुछ लंबा चला तो कोरोना खत्म होने के बाद भी संभव है दुनिया में कई जगह यही भय हमारे समाज के सहज मूवमेंट को तोड़ता रहेगा.
हमें डर है कि कहीं ऐसा भय हमारी आदतों में न घुस जाए. अगर ऐसा हुआ तो हमारी संस्थाओं की "नॉर्मल लाइफ़" प्रभावित होगी.
ऐसे में उत्तर कोरोना समय का सबसे बड़ा पुर्नजागरण होगा- देह के प्रति गहरे लालच के कारण पैदा हुए भय एवं डर के नाश का अभियान चलाना भारतीय समाज एवं परंपरा के मूल्य यथा संवेदना, लागव, सहकार, सामुदायिक संवाद, परहित, इत्यादि कोरोना के भय से प्रताड़ित भावों का नवअभ्युदय करना हमारी बड़ी सामाजिक ज़िम्मेदारी होगी.
इसीलिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल डिस्टेसिंग करते हुए इमोशनल कलोज़नेस बनाने की बात कही है.
इसी से हम मानवीयता एवं अपनी दुनिया को बचा भी पाएँगे और उसे जीने लायक बना भी पाएँगे. हम भय के ख़िलाफ़ भयभीत न होने का एक गीत गाएंगे.
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(लेखक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट में निदेशक हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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