कोरोना वायरस के दंश के बीच तबलीग़ी जमात मामले पर चढ़ा सियासी रंग

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

"ये मानवता के ख़िलाफ़ एक बड़ा अपराध है."

बीजेपी के सांसद राकेश सिन्हा की ये तीखी प्रतिक्रिया इस्लामी धार्मिक संस्था तबलीग़ी जमात पर थी जिस पर आरोप है कि इसने लॉकडाउन के दौरान दिल्ली के अपने मुख्यालय में एक बड़े सम्मलेन का आयोजन किया था.

इस सम्मेलन में 2000 के क़रीब लोगों ने हिस्सा लिया था, जिनमें 250 के क़रीब विदेशी भी थे.

इस सम्मलेन में शामिल होने वालों में से कई के कोरोना वायरस से पीड़ित होने की रिपोर्टें हैं. इस सम्मलेन में शामिल हुए सात लोगों की मौत भी हो चुकी है.

राकेश सिन्हा कहते हैं, "कोरोना वायरस के बीच ये सम्मलेन कराना एक भारी भूल थी. इससे पूरे समाज को ख़तरा पैदा हो गया है."

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं

सोशल मीडिया पर सुबह से #CoronaJihad, #NizamuddinMarkaz और #TablighiJamat जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं.

लेकिन तबलीग़ी जमात के वसीम अहमद के अनुसार सही जानकारी के अभाव में दिए जा रहे बयानों का मक़सद उन्हें बदनाम करना है.

एक ट्वीट में कहा गया, "तबलीग़ी जमात के माध्यम से, उन्होंने देश के हर कोने में कोरोना बम लगाए हैं, अगर वे अपने मक़सद में क़ामयाब हो जाते हैं तो यह देश पर अब तक का सबसे बड़ा जिहादी हमला साबित होगा, #CoronaJihad"

एक और ट्वीट में ये दावा किया गया, "निज़ामुद्दीन में जमात के हज़ारों लोगों का जमा होना, जिनमें कई विदेशी मुल्ला शामिल थे और जो भारत भर से मस्जिदों से उमड़ रहे हैं और जिनमें कोरोना वायरस के कई मामले हैं, ये कुछ और नहीं बल्कि कोरोना जिहाद द्वारा भारत को बर्बाद करने की एक कोशिश है."

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

बीजेपी और जमात दोनों से क़रीब हैं मुंबई में रहने वाले ज़फ़र सरेशवाला जिनके मुताबिक़ अधिकतर ट्वीट और बयान इस बात का संकेत देते हैं कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण हो रहा है.

वो कहते हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एफ़आईआर की बात जो कही है, वो केवल इससे सियासी फ़ायदा उठाने की उनकी एक कोशिश है. "उन्हें तबलीग़ी जमात के बारे में कोई जानकारी है ही नहीं."

मक़सूद आलम निज़ामुद्दीन वेस्ट में जमात के मरकज़ से 10 मिनट की दूरी पर रहते हैं. वे कहते हैं, "मेरे समुदाय के कुछ लोगों को लगता है कि इस मसले को एक धार्मिक एंगल से देखा जा रहा है."

वो कहते हैं कि वो एक हफ़्ते से मरकज़ नहीं गए हैं लेकिन वो ठीक हैं. "कल जिन 200-300 के टेस्ट कराए गए हैं उनके नतीजे निगेटिव आए हैं. किसी भी एक समय में वहां 2000 से 3000 लोग हमेशा रहते हैं."

जमात का पक्ष

लेकिन बीजेपी सांसद राकेश सिन्हा कहते हैं कि ये मानवता की बात है, इससे धर्म और जाति का कोई लेना-देना नहीं.

उन्होंने कहा, "जब देश भर में शादियां स्थगित हो गईं तो इस सम्मलेन को क्यों नहीं रद्द किया गया? इससे पूरे समाज को ख़तरे में डालना सही है? ये पढ़े-लिखे लोग थे. इन्हें सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब मालूम है. इन्होंने बहुत बड़ा ब्लंडर किया है, ये जुर्म है."

राकेश सिन्हा ने आरएसएस के एक स्थगित सम्मलेन का उदाहरण देते हुए कहा, "बेंगलुरु में 14 से 17 मार्च तक आरएसएस की एक सभा होनी थी जो कोरोना वायरस के कारण स्थगित कर दी गई. जमात भी ऐसा कर सकता था.''

लेकिन जमात के एक प्रवक्ता मौलाना मतीउर रहमान हैदराबादी ने अपने एक बयान में अपनी जमात का पक्ष रखते हुए कहा कि सम्मलेन सात मार्च को शुरू हुआ था और 22 मार्च के जनता कर्फ़्यू के दौरान कई लोगों को मरकज़ से बाहर भेज दिया गया और इसके बाद अचानक से यातायात के सभी साधन बंद हो गए जिसके कारण मरकज़ में मौजूद लोग बाहर नहीं निकल सके. पुलिस ने भी सलाह दी कि अब न मरकज़ से कोई बाहर जाएगा और न ही कोई अंदर आएगा.

कनिका कपूर वाली घटना

कनिका कपूर और मध्य प्रदेश में बीजेपी की नई सरकार बनाने का उदाहरण देते हुए मक़सूद आलम कहते हैं, "इन मुद्दों को मज़हबी या सियासी रंग नहीं दिया गया जो सही था. इसी तरह अगर जमात ने ग़लती भी की है तो इस मामले को जिहादी वायरस क्यों कहा जा रहा है. कनिका कपूर ने ग़लती की. लोगों ने उनकी लापरवाही के लिए उनकी निंदा की. मध्य प्रदेश विधान सभा में विधायकों की बैठक हुई तब तो किसी ने इन इवेंट्स को सियासी या मज़हबी रंग नहीं दिया? अब ऐसा क्यों."

तबलीग़ी जमात के वसीम अहमद का मानना है कि उनके ख़िलाफ़ जो बयान आ रहे हैं वो सही जानकारी सामने न आने के कारण आ रहे हैं. "सही जानकारी गृह मंत्रालय के पास है. उनकी तरफ़ से हमें दोषी नहीं माना जा रहा है."

लेकिन वसीम अहमद कहते हैं, "इस मुद्दे को तूल देने वाले, इसे सियासी और धार्मिक रंग देने वालों में मुस्लिम समुदाय के वो लोग भी शामिल हैं, जो उनकी जमात के ख़िलाफ़ हैं. हमारे अपने समुदाय में हमारे विरोधी लोग हमें बदनाम करने में लगे हैं."

सियासी और मज़हबी रंग देने की कोशिश

ज़फ़र सरेशवाला ये मानते हैं कि जमात की भी इसमें ग़लती है. इसे सम्मलेन मार्च में नहीं कराना चाहिए था.

वो दावा करते हैं कि इसे मज़हबी रंग मीडिया और सोशल मीडिया दे रही है. वो ख़ास तौर से टीवी न्यूज़ चैनल से मायूस नज़र आते हैं.

उनके अनुसार अब तक की अधिकतर प्रतिक्रियाओं से ऐसा महसूस होता है कि इसे सियासी और मज़हबी रंग देने की कोशिश की जा रही है. "अगर तबलीग़ी जमात को कोई सरकार सही से जानती है तो वो मोदी सरकार है. पीएम मोदी जमात के कई लीडर से गुजरात के मुख्यमंत्री की हैसियत से मिलते रहे हैं."

दिल्ली में इस्लामी तबलीग़ी जमात का मुख्यालय है. इसकी स्थापना 1926 मौलाना इल्यासी नाम के एक धर्म गुरु ने की थी.

इसी शाखाएं मलेशिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे कई देशों में हैं. इसमें 5000 लोगों के रहने की जगह है. इसमें एक मस्जिद भी है. मरकज़ निज़ामुद्दीन दरगाह से कुछ मिनट की दूरी पर है. यहाँ एक समय में साल के किसी महीने में कम से कम 2000 लोग ठहरते हैं.

अंदेशा ये है कि इस सम्मलेन में शामिल हुए वो दर्जनों लोग जो तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों से आए थे वो अपने घरों को वापस लौट गए हैं और उनसे संपर्क में आए लोग भी इस ख़तरनाक बीमारी की चपेट में आ सकते हैं.

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