कोरोना वायरस: इस दौर में ‘ग़ैर-ज़िम्मेदाराना’ व्यवहार कितना ख़तरनाक है?

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोरोना वायरस संक्रमण को देखते हुए भारत के कई शहरों में कर्फ़्यू लगाया जा चुका है. इसके साथ ही सभी ग़ैर-ज़रूरी गतिविधियों को रोक दिया गया है.

इन क़दमों के पीछे उद्देश्य बस इतना है कि कोरोना वायरस के प्रसार को रोका जा सके.

लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद बीती शाम तक भारी संख्या में लोग सड़कों पर नज़र आए.

महाराष्ट्र में क्यों लगा कर्फ़्यू?

महाराष्ट्र में कर्फ़्यू लगाया जा चुका है जहां अब तक 106 कोरोना वायरस संक्रमित मामले सामने आए हैं.

राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कर्फ़्यू की घोषणा करते हुए कहा, "लॉकडाउन के बावजूद लोगों को सड़कों पर निकलते हुए देखा गया. हाइवे पर चलते हुए देखा गया. जनता कर्फ़्यू का एक दिन पालन करने से हमारी ज़िम्मेदारियां ख़त्म नहीं हो जाती हैं. बल्कि ये उस युद्ध के लिए रणभेरी जैसा है जो कि हम लड़ने जा रहे हैं."

लेकिन जनता कर्फ़्यू के बाद हुजूम में थालियां बजाते हुए लोग सिर्फ़ महाराष्ट्र में नहीं दिखाई दिए. ऐसे लोग उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे कई बड़े प्रदेशों में भी नज़र आए.

केंद्र सरकार से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सख़्त हिदायतों के बावजूद आम लोगों के साथ कई बड़े नेता भी बिना मास्क लगाए कई लोगों के साथ घंटी और थाली बजाते हुए दिखे.

इसके बाद अगले दिन पीएम मोदी ने ट्वीट किया, "लॉकडाउन को अभी भी कई लोग गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. कृपया करके अपने आप को बचाएं, अपने परिवार को बचाएं, निर्देशों का गंभीरता से पालन करें. राज्य सरकारों से मेरा अनुरोध है कि वो नियमों और क़ानूनों का पालन करवाएं."

फ़ेक न्यूज़ कितनी ख़तरनाक

एक ओर जहां केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन हर पल लोगों तक कोरोना वायरस से जुड़ी पुख़्ता जानकारियां पहुंचाने की कोशिश कर रहा है. वहीं वॉट्सएप से लेकर ट्विटर और फ़ेसबुक पर लहसुन, सरसों के तेल आदि से कोरोना वायरस ठीक होने से जुड़े कई मैसेज वायरल हो चुके हैं. ये ऐसे भ्रामक उपाय हैं जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.

लेकिन इस तरह की जानकारियां शेयर करने वाले सिर्फ़ आम लोग ही नहीं हैं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राज्य प्रभार अश्विनी चौबे भी ये कहते देखे गए कि सूरज की किरणों से कोरोना वायरस जैसे वायरस समाप्त होते हैं.

उन्होंने ये भी कहा कि भगवान ने चाहा तो तापमान बढ़ने पर बीमारी नियंत्रित हो जाएगी.

लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, कोरोना वायरस के बारे में अब तक प्राप्त जानकारी ये कहती है कि इन दोनों ही बातों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं.

अमिताभ बच्चन ने भी अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा, "रविवार जिस दिन जनता कर्फ़्यू मनाया गया उस दिन अमावस्या थी और अमावस्या के दिन दुष्ट ताकतें अपने चरम पर होती हैं, ऐसे में शंख आदि की तेज आवाज़ से वाइब्रेशन पैदा होता है जिससे वायरस की शक्ति कम होती है."

हालांकि बाद में इस ट्वीट की आलोचना होने पर अमिताभ बच्चन ने इसे डिलीट कर दिया.

लेकिन इसके बाद फिर उन्होंने कोरोनावायरस पर बनाए गए एक इंफोग्राफ़िक को री-ट्वीट किया जिसमें भी इस वायरस के संक्रमण को हर सौ साल में आने वाली समस्या से जोड़कर दिखाया गया.

आख़िर लोग इस तरह व्यवहार क्यों करते हैं?

इतने गंभीर समय में जबकि इस वायरस की वजह से 20हज़ार से ज़्यादा लोग मर चुके हैं. ऐसे में आम लोगों से लेकर ख़ास लोगों का ये गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार सवाल खड़ा करता है.

सवाल ये है कि आख़िर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं.

इस सवाल का जवाब इस बात में है कि लोगों की कोरोना वायरस को लेकर आम प्रतिक्रियाएं क्या हैं?

आम लोगों की मानें तो सामान्य प्रतिक्रियाएं कुछ इस तरह मिल रही हैं...

  • कोरोना वायरस होना होगा तो हो जाएगा
  • कोरोना वायरस से क्या होता है, हमारे यहां तो हर साल लोग '…………' बीमारी से मर जाते हैं
  • आयुर्वेद में है कोरोना वायरस का इलाज
  • सरसों का तेल लगाओ
  • कोरोना वायरस दूर भाग जाएगा
  • ये वायरस हिंदुस्तान में मरकर ही जाएगा.

ये वो तर्क हैं जिन्हें वॉट्सअप पर फॉरवर्ड करने से लेकर व्यक्तिगत बातचीत में सुना जा सकता है.

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक़, कोई भी समाज किसी भी ख़तरे को लेकर अपनी प्रतिक्रिया इस बात से तय करता है कि वह उस ख़तरे से निपटने के लिए कितना तैयार है.

अगर समाज बेहतर स्थिति में होता है तो वह योजनाबद्ध ढंग से ख़तरे का सामना करता है.

और अगर समाज को अपने पुराने अनुभवों के आधार पर लगता है कि जो समस्या उसके सामने है उससे जूझना उसके बस की बात नहीं है तो उसके सामने एक विकल्प होता है.

और ये विकल्प है - समस्या को नज़रअंदाज करना.

अमरीकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक लेख में इस विषय पर विस्तार से समझाया गया है.

"शोधार्थियों ने लंबे शोध के बाद ये पता लगाया है कि लोग किसी भी ख़तरे का आकलन करने के लिए अंजाने में मेंटल शॉर्टकट्स का इस्तेमाल करते हुए इंस्टिंक्ट की मदद से फ़ैसले लेते हैं."

एक बात और भी है.

जब किसी को ये बताया जाता है कि किसी मौजूदा समस्या को ध्यान में रखते हुए कुछ ख़ास तरह की गतिविधियों से बचना चाहिए तो ऐसे में वह व्यक्ति अंजाने में अपने ज़हन में उन सभी समस्याओं को याद करता है जैसी समस्या के प्रति चेतावनी मिल रही है.

अगर उसके ज़हन में ऐसी किसी पूर्व समस्या की यादें ताजा होंगी तो वह चेतावनियों को ध्यान से सुनना चाहेगा.

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि सामान्य रूप से माना जाता है कि हवाई यात्रा करना सुरक्षित है.

लोग हवाई यात्राएं करते भी हैं लेकिन जब बार बार एक छोटे से समय अंतराल में कई दुर्घटनाएं हो जाएं तो लोगों में हवाई यात्रा करने के प्रति एक डर पैदा हो जाता है.

ये व्यवहार क्यों ख़तरनाक है?

भारत से लेकर दुनिया भर में जारी इस तरह के व्यवहार पर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है.

दुनिया भर में कई इपिडिमेलॉजिस्ट मानते हैं कि इस तरह बार बार लोगों के बीच तालमेल और मिलने-जुलने से वायरस को रोकना मुश्किल होता जा रहा है.

बीबीसी से बात करते हुए एक इपिडिमिओलॉजिस्ट डॉ. गिरिधर बाबू ने बीते रविवार की शाम लोगों के व्यवहार पर चिंता जताई.

वे कहते हैं, "रविवार शाम जो कुछ हुआ वो काफ़ी ग़लत था. ये एक गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार था. 'जनता कर्फ़्यू' के दौरान सभी लोग घर पर रहे. सड़कें खाली पड़ी रहीं. लेकिन शाम को सड़क पर पहुंचकर लोगों ने मिल-जुलकर तालियां और थालियां बजाईं. जिस तरह ये बीमारी फैलती है, उस लिहाज़ से इसे बिलकुल उचित नहीं ठहराया जा सकता है."

वहीं, डॉक्टरों की ओर से इस व्यवहार के प्रति नाराज़गी दिखाई गई है.

श्रीनगर रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. मोहसिन बिन मुश्ताक़ लिखते हैं, "इतने सारे लोग सड़कों पर घूम रहे हैं और सड़क पर इतना ज़्यादा ट्रैफिक है. हम सबको ये क्यों समझ नहीं आता है कि ये (व्यवहार) हमारी जान ले सकता है."

अमरीका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीव हैंक ने ट्वीट किया, "मेरी अंतिम जानकारी के मुताबिक़, सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब समूह में एकत्रित होने से बचना था. इस तरह झुंड में इकट्ठे होना एक तरह से मासूम लोगों की ज़िंदगियों को ख़तरे में डालने जैसा है. ये किस तरह का कर्फ़्यू है. भारत को कोरोना वायरस के प्रसार को गंभीरता से लेना चाहिए."

केंद्र सरकार से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन साफ शब्दों में ये कह चुका है कि कोरोना वायरस के तेजी से होते प्रसार को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग सबसे ज़रूरी है.

भारत में कोरोना वायरस की चपेट में आए एक राज्य के सरकारी डॉक्टर ने नाम ना बताने की शर्त पर अपनी राय रखी.

उनके मुताबिक़, डॉक्टरों को शुक्रिया कहने के लिए तालियां बजाने की बात ठीक थी लेकिन लोगों को सड़कों पर इस तरह से नहीं निकलना चाहिए था.

जनता कर्फ़्यू के तत्काल राज्य सरकारों ने देश के सैकड़ों ज़िलों में कर्फ़्यू लगा दिया है.

कोरोना वायरस के मरीज़ों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है.

लेकिन इसी बीच मास्क और ग्लव्स की कमी का सामना कर रहे डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ़ को कनिका कपूर जैसी सेलिब्रिटी मरीज़ की ख़ास ज़रूरतों का ध्यान भी रखना पड़ रहा है.

ऐसे में आम लोगों समेत बड़ी हस्तियों का ये व्यवहार कोरोना वायरस झेल रहे भारतीय डॉक्टरों, अस्पतालों और मरीज़ों को किस हाल में पहुंचाएगा, ये वक़्त ही बता सकता है.

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