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कोरोना वायरस: एक दूसरे को न छू पाने की पीड़ा
- Author, अनघा पाठक
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मराठी सेवा
कोरोना वायरस ने इंसान के साथ जो किया वो है एक इंसान को दूसरे से दूर कर देना. अलगाव, क्वारंटीन, सोशल डिस्टेंसिंग जैसे शब्द अब हम आम तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं.
सोशल मीडिया पर आपने कोरोना वायरस से जुड़ी कई तरह की तस्वीरें देखी होंगी जो हाल में वायरल भी हुई हैं.
कुछ तस्वीरों में ताबूतों के साथ लोगों की लंबी कतारें देखी जा सकती हैं. तस्वीरों में दिखता है कि इंसान को एक अजीब अकेलेपन ने घेर लिया है जो मौत के बाद भी खत्म नहीं होती.... मां अपने बच्चे को छू नहीं सकती, पति अपनी पत्नी को ढाँढस बंधा नहीं सकता क्योंकि एक दूसरे को छूने से कोरोना का संक्रमण फैलने का डर है.
ये एक अभूतपूर्व समय है, जब अगर हम अपने प्रियजनों को जीवित देखना चाहते हैं तो हमें उनसे दूर जाना ही होगा.
इटली में अस्पतालों में आख़िरी सांस लेने वाले कई लोग अपने परिवार वालों को देख नहीं पा रहे हैं और न ही उन्हें छू पा रहे हैं.
कई लोगों के परिवार के सदस्य को कोरोना वायरस लील चुका है, लेकिन न तो उनके अंतिम संस्कार में कोई भी जा पा रहा है न ही उन्हें अंतिम विदाई दे पा रहा है.
कोरोना वायरस ने इंसान को इंसान से दूर कर दिया है. ये किसी फ़िल्म के डायलॉग की तरह लग सकता है लेकिन अब ये वास्तविकता बन चुका है. अगर ख़ुद को बचाना है तो आपको दूसरों से दूर रहना ही होगा.
बीते कुछ दिनों में क्या आपको लगा कि आप अपने मित्र को गले लगाना चाहते तो हैं लेकिन आप ऐसा कर नहीं सकते, आपकी बहन विदेश से घर लौटी है लेकिन आप जा कर उससे मुलाक़ात नहीं कर सकते, आप गांव जा कर अपने पिता से मिलना चाहते हैं और उनका हालचाल लेना चाहते हैं लेकिन आप ऐसा नहीं कर पा रहे, वर्क फ्रॉम होम कर रहे पति पत्नी को एकांत के पल मिलते तो हैं लेकिन एक दूसरे के नज़दीक जाने में उन्हें डर लगता है.
हम ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां एक दूसरे को छूने से हमें डर लगता है, किसी को छूते ही जो एक काम हम सबसे पहले करते हैं वो है अपने हाथ धोना या फिर हाथों पर सैनिटाइज़र लगाना. फिलहाल हम जिस वक्त से गुज़र रहे हैं ये बेहद ज़रूरी है लेकिन हम जिस एक चीज़ को इस मुश्किल वक्त में खो रहे हैं वो है..... एक दूसरे को छूना या कहें स्पर्श.
स्पर्श आपके जीवन में कितना महत्वपूर्ण है? क्या ये वाकई में ज़रूरी भी है?
बीबीसी संवाददाता क्लाउडिया हेमंड मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े रेडियो कार्यक्रम करती हैं. उन्होंने एक्सपर्ट्स से जानना चाहा कि स्पर्श का हमारे जीवन में महत्व क्या है.
जीवन का पहला परिचय- स्पर्श
मां के पेट में मौजूद बच्चा सबसे पहले जो चीज़ अनुभव कर पाता है वो है स्पर्श. इसके बाद ही उसमें सुन सकने, सूंघ सकने और स्वाद लेने जैसी संवेदनाएं विकसित होती हैं.
ये दिलचस्प बात है कि अगर मां के पेट में जुड़वा बच्चे हैं तो वो एक दूसरे को सबसे पहने छू कर अनुभव करने की कोशिश करते हैं. जन्म के बाद मां से उम्मीद होती है कि वो बच्चे को अपनी गोद में रखें ताकि बच्चा सुरक्षित महसूस कर सके.
यही भावना हमारे साथ जीनव भर बनी रहती है. इस कारण किसी मुश्किल वक्त में जब हमारे प्रियजन या परिवार वाले हमें गले लगाते हैं तो हम सुरक्षित महसूस करते हैं.
क्लाउडिया लिखती हैं कि आपके प्रियजन का स्पर्श और आपके मन की शांति आपस में जुड़ी हुई है.
सबसे महत्वपूर्ण भावना
हम अपनी त्वचा पर से स्पर्श का अनुभव करते हैं. हमारी सभी इंद्रियों में - आंख, नाक, कान - में हमारी त्वचा सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है.
यही कारण है कि हम अक्सर अनजाने में कई फ़ैसले इस स्पर्श के आधार पर ही लेते हैं. जैसे, सब्ज़ी ताज़ी है या नहीं, किसी व्यक्ति को बुखार है या नहीं. इतना ही नहीं कभी कभी किसी को छू कर हम ये भी जान पाते हैं कि वो व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है.
और इसी कारण हमारे लिए मौजूदा परिस्थिति अभूतपूर्व है क्योंकि हम पहले की तरह अपनी इस इंद्रियों पर निर्भर नहीं रह सकते, दुनिया को समझने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते.
केईएम अस्पताल में मनोरोग विभाग की पूर्व डीन डॉक्टर शुभांगी पारकर कहती हैं कि, "ये बीमारी हमारी एक इंद्री को बुरी तरह प्रभावित कर रही है, वो है स्पर्श. इंसानों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी स्पर्श बेहद महत्वपूर्ण संवेदना है लेकिन कोविड 19 के कारण हम एक तरह से एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं."
असुरक्षा की भावना
डॉक्टर पारकर कहती हैं, "प्यार और स्पर्श ये हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं. ये ऐसी ज़रूरी बातें हैं जो हमें महसूस कराते हैं कि हम सुरक्षित हैं. ये हमें तनावमुक्त करते हैं और राहत देते हैं."
"ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि दुनिया की हमारी समझ स्पर्श पर ही निर्भर होती है. अगर हमारा कोई प्रिय व्यक्ति हमें स्पर्श करता है तो हमारे शरीर के भीतर सकारात्मक हॉर्मोन का उत्पादन होता है. ये हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. दूसरा, स्पर्श मानसिक बीमारी को कम करता है और मानसिक तनाव से छुटकारा दिलाता है. कई बार स्पर्श ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ को नियंत्रित करने में भी मदद करता है. हमें एक दूसरे को छूने की इतनी आदत पड़ चुकी है कि अगर हमें कोई नहीं छूता तो हम दुखी हो जाते हैं, निराश होते हैं या असुरक्षित महसूस करने लगते हैं."
अब आगे क्या होगा?
कोविड -19 ने हमें सही मायनों में एक दूसरे से दूर कर दिया है. इस मुश्किल स्थिति में अगर कोई हमें सपोर्ट नहीं करता तो हम अकेले कैसे इससे आगे बढ़ेंगे?
सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अहम बात ये है हमें डॉक्टरों, सरकारों और विश्व स्वास्थ्य संगठन के सभी निर्देशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए.
इसमें किसी तरह की कोई कोताही नहीं की जानी चाहिए. साथ ही ऐसे समय में हमें संयम बनाए रखने की भी ज़रूरत है.
ये बात सच है कि फ़िलहाल जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं उसकी भरपाई होना मुश्किल है और स्पर्श की कमी हम पूरा नहीं कर सकते.
लेकिन कुछ चीज़ों का सही तरीके से पालन करें तो हम असुरक्षा की भावना को कम ज़रूर कर सकते हैं.
डॉक्टर पारकर कहती हैं, "स्पर्श की तरह ही प्रेम है जिसे शब्दों में बयां किया जा सकता है. तो खुल कर बात करें. ये बेहद महत्वपूर्ण है कि हमारे परिचित स्वस्थ और सुरक्षित हैं. इस बारे में सोच कर खुद को खुश रखें."
वो कहती हैं कि ऐसे काम करने की कोशिश करें जिनसे आपको ख़ुशी मिलती हो. एक बात का प्रण करें कि आप नकारात्मकता से बचेंगे और ख़ुश रहने की पूरी कोशिश करेंगे. सोशल मीडिया पर नए मित्र बनाएं. पुरानी मित्रों से बात करें, उनसे भी बात करें जो किसी कारण आपसे नराज़ हैं.
कोरोना वायरस ने हमें अपने घरों की चारदीवारी में सीमित ज़रूर कर दिया है लेकिन इसने हमारे लिए एक नई दुनिया के दरवाज़े भी खोल दिए हैं.
कहते हैं अगर आप बाहर की दुनिया में न जा सकें तो ख़ुद के भीतर खुद को तलाश करें. शायद अकेलेपन के इस दौर में आपको ख़ुश रहने की कोई वजह मिल जाए.
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