राज्यसभा के लिए नामित पूर्व चीफ़ जस्टिस गोगोई के कुछ अहम फ़ैसले

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राष्ट्रपति की ओर से राज्यसभा के लिए नामांकित किए गए भारत के पूर्व चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई अपने कार्यकाल के दौरान कई अहम फ़ैसले सुनाने के लिए चर्चा में रहे हैं.

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इनमें अनुच्छेद 370, ट्रिपल तलाक पर अध्यादेश, केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश, रफ़ाल डील मामले में केंद्र सरकार को क्लीन चिट, अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर फ़ैसला और असम में एनआरसी का मामला उल्लेखनीय है.
जस्टिस गोगोई वहीं हैं जिन्होंने चीफ़ जस्टिस बनने से पहले तीन अन्य वरिष्ठतम जजों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके न्याय व्यवस्था के कामकाज की आलोचना की थी.
पारदर्शिता के पक्षधर रहे जस्टिस गोगोई सुप्रीम कोर्ट के उन चुनिंदा जजों में शामिल रहे जिन्होंने अपनी संपत्ति से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक किया. उनके ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न का आरोप भी लगा जो भारतीय न्यायपालिका में अपनी तरह का एक अभूतपूर्व मामला है.
पूर्व चीफ़ जस्टिस गोगोई की छवि खुलकर बोलने वाले जज की रही. उनसे जुड़े चर्चित मामलों पर आइए एक नज़र दौड़ाते हैं.
अनुच्छेद 370 का मामला

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पिछले साल अगस्त में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने और जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट, टेलीफ़ोन, संचार और अन्य पाबंदियों के ख़िलाफ़ विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई.
तब सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने था कहा कि 'कृपया समझने की कोशिश करें, यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी है.'
सुनवाई के क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर में सामान्य हालात बहाल करने के लिए कहा. तब चीफ़ जस्टिस गोगोई ने यह भी कहा था कि अगर ज़रूरत पड़ी तो वो ख़ुद जम्मू-कश्मीर जा सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि राष्ट्र हित में स्कूल, अस्पताल और जन परिवहन को सुचारू रूप से काम करना चाहिए.
पाँच अगस्त को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधान ख़त्म कर दिए थे. इसके बाद वहां संचार साधनों और आवाजाही को सीमित कर दिया गया था.
ट्रिपल तलाक पर अध्यादेश

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मोदी सरकार ट्रिपल तलाक को दंडनीय अपराध बनाने के लिए एक अध्यादेश लेकर आई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.
लेकिन चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था.
इससे पहले, साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को अवैध करार दिया था.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोदी सरकार मुस्लिम महिलाएं (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, 2017 लेकर आई थी.
ये विधेयक लोकसभा में तो पारित हो गया लेकिन राज्यसभा में अटक गया. तब विपक्ष ने तीन तलाक पर कुछ संशोधनों की मांग की थी जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में सहमति नहीं बन पाई थी.
इसके बाद सरकार अध्यादेश लाई, जिसे चुनौती देने वाले सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाए.
सबरीमला मामला

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सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर, 2018 के अपने फ़ैसले में सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश का हक़ दिया था.
लेकिन इस फ़ैसले की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में 60 पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं थी.
इन याचिकाओं पर सुनवाई और फ़ैसले की समीक्षा के लिए तीन जजों की जो बेंच बनी थी, जस्टिस गोगोई उस बेंच के प्रमुख थे.
तब जस्टिस गोगोई की बेंच ने इस मामले को सात जजों की बेंच के पास भेज दिया था ताकि फ़ैसले से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी ग़ौर किया जा सके.
रफ़ाल डील को चुनौती देने का मामला

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जस्टिस गोगोई उस बेंच में भी शामिल थे, जिसने रफ़ाल सौदे की जांच की मांग करने वाली याचिकाओं को दो बार ख़ारिज कर दिया था.
भारत और फ्रांस के बीच रफ़ाल विमान की ख़रीद के लिए हुए सौदे पर विपक्षी कांग्रेस ने सवाल उठाए थे और इसमें कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था.
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कहा था कि सौदे को लेकर किसी जांच की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि समीक्षा याचिका में कोई दम नहीं है.
दूसरी ओर कांग्रेस का कहना था कि ये सौदा एक घोटाला है और संयुक्त संसदीय समिति को इसका संज्ञान लेना चाहिए.
बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर फ़ैसला

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पिछले कई वर्षों से भारत में जिस फ़ैसले का सबसे ज़्यादा बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा था, वो था उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद.
चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई के कार्यकाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना आख़िरी फ़ैसला सुनाया जो हिंदुओं के पक्ष में गया.
इसके साथ ही भारत में दो धर्म-समुदायों के बीच वर्षों से चल रहे ज़मीन के मालिकाना हक़ की क़ानूनी लड़ाई ख़त्म हो गई.
जस्टिस गोगोई ने ये फ़ैसला पिछले साल अपने रिटायर होने से ठीक तीन दिन पहले सुनाया था.
असम में एनआरसी का मामला

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भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस यानी एनआरसी के मुद्दे पर काफी विवाद हुआ है.
असम में स्थानीय लोगों ने एनआरसी के पीछे सरकार की नीति और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े किए.
बात जब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो जस्टिस गोगोई ने उस बेंच की अध्यक्षता की जिसने असम में एनआरसी की पूरी प्रक्रिया की निगरानी की.
जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली इस बेंच ने ये सुनिश्चित किया कि एनआरसी की प्रक्रिया तय समय में ठीक तरह से पूरी हो.
चीफ़ जस्टिस का ऑफिस RTI के दायरे में

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस का ऑफिस आरटीआई यानी सूचना के अधिकार कानून के दायरे में होना चाहिए या नहीं होना चाहिए, इस पर जस्टिस गोगोई ने अपने कार्यकाल में तस्वीर साफ़ कर दी.
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही साथ-साथ चलती है और जनहित की सूचनाओं को बताने से बचना सुप्रीम कोर्ट की साख़ को नुकसान पहुंचाएगा.
एक संवैधानिक पीठ ने संविधान के अनुच्छेद-124 के हवाले से कहा था कि सुप्रीम कोर्ट एक लोक प्राधिकरण है और इसलिए इसमें भारत के चीफ़ जस्टिस और जज भी शामिल हैं.
साल 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि भारत के चीफ जस्टिस का कार्यालय और सुप्रीम कोर्ट 'लोक प्राधिकरण' हैं और इसलिए ये आरटीआई कानून के दायरे में आएंगे.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सेकेट्ररी जनरल ने इस फ़ैसले को ये कहते हुए चुनौती दी थी कि अगर जजों की नियुक्ति समेत सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक फैसले आरटीआई के दायरे में आएंगे तो इससे परेशानी पैदा होगी.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया. चीफ़ जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये ऐतिहासिक निर्णय दिया था.
यौन उत्पीड़न का आरोप

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पिछले साल भारत में पहली बार ऐसा हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के किसी चीफ़ जस्टिस पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा जिसके बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया.
आरोप के केंद्र में थे जस्टिस रंजन गोगोई और मामला सामने आते ही न्यायपालिका में एक तरह से भूचाल आ गया था.
विवाद तब और भी बढ़ गया जब जस्टिस गोगोई ने इस मामले में ख़ुद का बचाव किया. आमतौर पर होता ये है कि अगर किसी जज का नाम किसी मामले में है तो वो फैसला देने के लिए उस पीठ में शामिल नहीं हो सकते.
लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ और जस्टिस गोगोई ने जस्टिस बोबडे की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसे सुप्रीम कोर्ट की ही एक पूर्व कर्मचारी के आरोपों की जांच का ज़िम्मा सौंपा गया.
जांच के बाद जस्टिस बोबडे ने जस्टिस गोगोई के ख़िलाफ़ आरोपों को ख़ारिज कर दिया था. हालांकि उन्होंने ऐसा करने का कोई आधार नहीं बताया था. जस्टिस बोबडे भारत के मौजूदा चीफ़ जस्टिस हैं.
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