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कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीज़ अस्पताल से क्यों भाग रहे हैं?
- Author, नामदेव अंजना
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
नागपुर के मायो अस्पताल से 14 मार्च को कोरोना वायरस के चार संदिग्ध मरीज भाग गए थे. पुलिस तत्काल उनकी खोज में लग गई और उन्हें वापस ले आई. अब इन चारों का टेस्ट हो चुका है और इनमें से किसी में कोरोना वायरस का संक्रमित नहीं पाया गया.
भागे हुए सारे संदिग्ध मरीजों का पता चल गया था लेकिन इस घटना ने नए सवाल खड़े कर दिए कि ये मरीज़ अस्पताल से आख़िर भाग क्यों रहे हैं? आख़िर अस्पताल जाने और दवाई लेने से वो क्यों डर रहे हैं?
बीबीसी ने डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों से बात की और इन सभी सवालों के जवाब जानने की कोशिश की.
वाकई में नागपुर में हुआ क्या था?
14 मार्च 2020 को कोरोनावायरस के चार संदिग्ध मरीज़ नागपुर के मायो अस्पताल से भाग गए थे. पुलिस फौरन उनकी खोज में जुटी और उन्हें अपने-अपने घरों में ढूंढ निकाला.
हुआ ये था कि मायो अस्पताल में कोरोना वायरस संक्रमित मरीज़ के होने की अफ़वाह फैली जिसके बाद वहां भर्ती दूसरे मरीजों में बेचैनी आ गई. एक-एक करके चार मरीज़ अपने-अपने वार्ड से निकले और अस्पताल से भाग गए. पुलिस के अनुसार ये सभी मरीज़ टॉयलेट जाने के बहाने अस्पताल से निकले थे.
नागपुर के कलेक्टर रवींद्र ठाकरे ने बताया है कि इस घटना के बाद से मायो अस्पताल में पुलिस बल मुहैया कराए जाने की योजना बनाई गई.
मायो अस्पताल में जहां कोरोना वायरस से संक्रमित कुछ मरीज़ भर्ती हैं वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें दूसरों से अलग-थलग कर यहां रखा गया है.
लेकिन टेस्ट और इलाज से भागने का मामला सिर्फ़ नागपुर तक ही सीमित नहीं है. इससे पहले इटली से अपने पति के साथ बंगलुरु लौटी महिला ने बेंगलुरु एयरपोर्ट से दिल्ली और फिर दिल्ली से आगरा तक का सफ़र किया, वो संक्रमित थीं फिर भी उन्होंने खुद को अलग-थलग करने के बजाय यात्राएं कीं.
उनके पति में कोरोनावायरस के लक्षण दिखाई दिए, जिसके बाद दोनों को क्वारेंटीन किया गया.
एक ऐसा ही मिलता-जुलता मामला इंडोनेशिया में भी सामने आया जहां की राजधानी जकार्ता से एक संक्रमित मरीज़ भाग निकला और पुलिस अभी भी उसकी जांच कर रही है.
इस तरह की घटनाएं और भी भारत के दूसरे हिस्सों में भी सामने आई है जब लोग कोरोना के टेस्ट से भागे हैं. इन घटनाओं ने सवाल खड़े कर दिए है कि लोग टेस्ट से भाग क्यों रहे हैं?
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि लोगों में डर है और एक बड़ी बात ये भी है कि उनके पास इस बीमारी के बारे में पर्याप्त जानकारी का अभाव है.
मनोवैज्ञानिक अक्षता भट्ट का कहना है कि लोगों को जैसे-जैसे कुछ नया पता चल रहा है उनकी घबराहट बढ़ती जा रही है. उनका मानना है कि संक्रमण के बढ़ते आंकड़े भी इसकी एक वजह हैं.
हालांकि अक्षता भट्ट मरीज़ों के भागने के पीछे तीन अहम कारण मानती हैं-
- लोगों को डर है कि उनकी पहचान उजागर हो जाएगी. ऐसे संदिग्ध लोगों पर हमले का ख़तरा भी अधिक है.
- अगर कोरोनावायरस टेस्ट का रिज़ल्ट पॉजिटिव आ गया तो? उन्हें इस बात का डर सताने लगता है कि उन्हें अपने परिवार से एक लंबे समय के लिए दूर हो जाना पड़ेगा.
- अगर इस संक्रमण का कोई इलाज नहीं है तो वे हमें आइसोलेशन में क्यों रख रह रहे हैं? ये वो शंकाएं हैं जो लोगों के मन में व्याप्त हैं.
अक्षता भट्ट यह भी कहती हैं, "अगर डॉक्टर ऐसा सुझाव देते हैं कि परीक्षण कराना चाहिए तो ज़रूर कराना चाहिए. क्योंकि आपकी एक छोटी सी लापरवाही की वजह से कोई दूसरा भी संक्रमित हो सकता है."
"किसी को भी अपने बारे में सोचने के साथ-साथ दूसरे के बारे में भी सोचना चाहिए. इसके अलावा अगर एक बार टेस्ट करवा लिया तो डर से भी राहत मिल जाती है."
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क्वारेंटीन के बारे में लोगों को जागरुक करने की ज़रुरत
महाराष्ट्र में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अविनाश भोंडवे का मानना है कि लोगों में जिस तरह का डर है उसके लिए किसी ना किसी स्तर पर सरकार भी ज़िम्मेदार है.
वो कहते हैं, "क्वारेंटीन क्या है? यहां क्या किया जाता है? ज़िंदगियों को बचाने में इसकी क्या भूमिका है? सरकार कहीं ना कहीं लोगों को इस बारे में पूरी तरह से समझा पाने और बता पाने में असमर्थ रही है. लोगों को स्पष्ट कर देना चाहिए कि उन्हें अलग-थलग इसलिए रखा जा रहा है क्योंकि उनकी ज़िंदगी को ख़तरा है. लेकिन बीते कुछ दिनों में भी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका है."
लेकिन राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे इस बात से सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा बीबीसी मराठी, "सरकार की तरफ़ से लोगों को इस बारे में जागरुक करने को लेकर कोई भी कमी नहीं हुई है. सरकार किसी भी स्तर पर फेल नहीं हुई है."
वो कहते हैं, "जो लोग अस्पताल से भागे हैं उन्हें लगता है कि वो पूरी तरह से स्वस्थ हैं. उन्हें लगता है कि उनमें तो कोविड-19 के संक्रमण के कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे हैं फिर भी उन्हें यहां क्यों रखा गया है. आख़िर वो यहां 10-12 दिन क्यों ही रहें."
राजेश टोपे कहते हैं, "इसके साथ ही कुछ लोग यहां रहकर बोर हो जाते हैं. सरकार लोगों से संपर्क में रहने की कोशिश कर रही है और उनके मसलों को सुलझाने की मानवीय स्तर पर पूरी कोशिश कर रही है."
"हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि लोगों को आइसोलेशन सेंटर में टीवी, न्यूज़पेपर, अच्छा खाना और बाकी सहूलियतें दी जा सकें. और इन सबके बावजूद अगर वो इस बात की फिक्र नहीं कर रहे हैं कि उन्हें क्या सलाह दी जा रही है तो हमने सिक्योरिटी को बढ़ाने का फ़ैसला किया है."
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