You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
#DelhiRiots: दंगों के बाद मानसिक संतुलन खोते और बीमारियों के शिकार होते लोग
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
48 साल के सदरे आलम अकेले ख़ामोश बैठे ख़ुद से ही क्या कहते रहते हैं, किसी को कुछ समझ नहीं आता. कई बार तो उनकी पत्नी अमीना भी उनकी बातें नहीं समझ पातीं.
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चंदू नगर में रहने वाले सदरे आलम की मानसिक स्थिति पहले से ही कुछ ठीक नहीं थी लेकिन दंगों के बाद उनकी हालत दिन पर दिन बदतर हो रही है.
अपने जले हुए घर में बैठे वो कभी अपना वोटर आईडी कार्ड निकालकर उसे उलट-पलटकर देखते हैं तो कभी कोई और काग़ज़.
काग़ज़ देखते-देखते कभी वो अचानक से रो पड़ते हैं तो कभी ग़ुस्से में आकर चीख़ने लगते हैं. पत्नी अमीना और आस-पड़ोस के लोगों का कहना है कि दंगों के बाद से सदरे आलम अपना मानसिक संतुलन पूरी तरह खो बैठे हैं.
अकेले सदरे आलम ही मानसिक स्वास्थ्य की दिक़्क़तों से नहीं जूझ रहे हैं बल्कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में बड़ी संख्या में लोग को कुछ ऐसी ही तकलीफ़ों से दो-चार हो रहे हैं.
11 साल की फ़ातिमा सोते-सोते अचानक चौंककर जग जाती हैं. उसकी मां सलमा बताती हैं कि उन्हें पसीने से तर-बतर अपनी डरी-सहमी बेटी को दोबारा सुलाने के लिए घंटों मशक्क़त करनी पड़ती है.
खजूरी ख़ास के रहने वाले नाज़िम बताते हैं कि उनके मोहल्ले की एक अधेड़ महिला दंगों के बाद इस क़दर डर गई थीं कि पड़ोसियों को अपने पास से हिलने भी नहीं देती थीं.
नाज़िम ने बताया, "एक बार उन्होंने मेरा पैर कसकर पकड़ लिया और चिल्लाने लगीं. हालत ऐसी हो गई थी कि उन्हें काबू करना मुश्किल हो गया था. तीन रातें बीतने के बाद भी वो सो नहीं पा रही थीं. फिर किसी ने उन्हें केमिस्ट से नींद की दवा लाकर दी, तब जाकर वो सो पाईं. लेकिन उनकी हालत में कुछ ख़ास सुधार नहीं हुआ. आख़िरकार उनके शौहर उन्हें लेकर अस्पताल चले गए."
खजूरी ख़ास में ही रहने वाली नुज़हत खाना तो बना रही हैं लेकिन उनके डरे हुए बच्चे ठीक से खा नहीं पा रहे हैं. दंगों में नुज़हत के पति दिलावर के कंधे में गोली लगी थी. फ़िलहाल वो एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती हैं और नुज़हत घायल पति की देखभाल करने के साथ-साथ अपने तीन छोटे बच्चों को संभाल रही हैं.
नुज़हत बताती हैं, "हफ़्ते भर से ज़्यादा हो गया लेकिन मेरे कानों में अब भी दंगाइयों की आवाज़ें गूंजती हैं. रात में ठीक से नींद नहीं आती. थोड़ी-सी भी आवाज़ होती है तो धड़कनें तेज़ हो जाती हैं कि कहीं फिर से हमला तो नहीं हो गया."
'दंगों की यादें ज़हन से नहीं जा रहीं'
ये सभी लोग दंगों की डरावनी यादें भुलाकर अपनी बिखरी ज़िंदगियों को फिर से बसाना चाहते हैं लेकिन जले मकानों और दुकानों की राख से आने वाली तीखी गंध जैसे उनकी नाक के रास्ते सिर में चढ़ गई है.
हर जगह तोड़-फोड़ के निशान, जली हुई चीज़ें और बिखरे हुए सामान उनकी भयावह यादों को ज़रा भी धूमिल नहीं होने देते.
दिल्ली हाईकोर्ट ने दंगा प्रभावित लोगों के लिए ट्रॉमा काउंसलिंग उपलब्ध कराए जाने के निर्देश दिए थे लेकिन अदालत के निर्देशों का पालन अभी बहुत सीमित स्तर पर हो पा रहा है. काउंसलिंग कहां और कैसे मिलेगी, बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है.
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि मानसिक तकलीफ़ों से जूझ रहे लोगों के लिए हेल्पलाइन नंबर और ट्रॉमा काउंसलिंग उपलब्ध कराई जाए.
अदालत ने शाहदरा स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड सांइसेज़ (IHBAS) से कहा था कि वो पीड़ितों को काउंसलिंग दिलाने में मदद करे.
कहां मिलेगी मदद?
आईएचबीएस एक स्वायत्त संस्था है जिसे भारत सरकार, केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और दिल्ली सरकार से फ़ंड मिलता है. यह दंगे वाली सभी जगहों से लगभग 8-10 किलोमीटर की दूरी पर है.
अदालत के आदेश के बाद यहां 'क्राइसिस सपोर्ट सेंटर' शुरू किया गया है जहां सुबह आठ बजे से शाम आठ बजे तक मुफ़्त काउंसलिंग दी जा रही है.
क्राइसिस सपोर्ट सेंटर में तीन मनोचिकित्सक लगातार ड्यूटी पर रहते हैं और एक डॉक्टर ऑन कॉल भी उपलब्ध रहता है. सेंटर में दंगा पीड़ितों की काउंलिंग करने वालीं डॉक्टर साक्षी ने बताया कि पिछले एक हफ़्ते में यहां 50 के लगभग लोग आ चुके हैं.
दंगा पीड़ितों के लिए हॉस्पिटल ने दो हेल्पलाइन भी शुरू की हैं: 011-22574820 और 9868396841.
इसका पूरा पता है:
इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड साइंसेज़ (IHBAS), ताहिरपुर रोड, एसडीएन हॉस्पिटल, दिलशाद गार्डन, दिल्ली, 110095. हॉस्पिटल की सेवाएं 24 घंटे उपलब्ध हैं.
इसके अलावा दिल्ली स्थित संजीविनी सोसायटी फ़ॉर मेंटल हेल्थ नामक एनजीओ भी मुफ़्त काउंसलिंग की सुविधा देता है. एनजीओ के दो केंद्र हैं, एक डिफ़ेंस कॉलोनी में और एक कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया में. यहां 011-4109 2787 पर कॉल करके अपॉइंटमेंट लिया जा सकता है.
क्या हैं तकलीफ़ें?
डॉक्टर साक्षी के मुताबिक़ यहां आने वालों में वो लोग शामिल हैं जो दंगों के दौरान हिंसा के चश्मदीद रहे, जिन्होंने अपने करीबियों को हिंसा का शिकार होते देखा या जिन्होंने दंगों में व्यक्तिगत नुक़सान झेला है.
उन्होंने बताया, "हमारे पास आने वाले लोगों को घबराहट, बेचैनी, नींद न आने, भूख न लगने और बुरे सपने आने जैसी कई तकलीफ़ें हो रही हैं. मनोविज्ञान की भाषा में ये एंग्ज़ायटी, एक्यूट स्ट्रेस डिसऑर्डर (एसडी) और अक्यूट ऐंड ट्रांज़िएंट साइकोटिक डिसऑर्डर (एटीपीडी) के लक्षण हो सकते हैं."
डॉक्टर साक्षी के पास ऐसे कई लोग आए जिनके व्यवहार और तौर-तरीकों में बहुत फ़र्क आया है.
वो बताती हैं, "हमारे पास कई ऐसे लोग आए जो या तो बहुत उग्र हो गए हैं या बेहद शांत. कई लोगों ने ख़ुद को अलग-थलग कर लिया है और किसी के अंदर जीने की चाहत ही ख़त्म हो गई है."
डॉक्टर साक्षी के मुताबिक़ जो लोग पहले से किसी तरह की मानसिक तकलीफ़ से जूझ रहे हैं, उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं. दंगों ने बच्चों और किशोरों पर भी गहरा असर डाला है.
डॉक्टर साक्षी बताती हैं, "हमारे पास पिछले तीन-चार दिनों से 11 साल की एक बच्ची काउंसलिंग के लिए आ रही है. उसने दंगों में अपनी आंखों के सामने गोली चलते देखी थी. ये देखकर उसे इतना सदमा लगा कि उसने बोलना ही लगभग बंद कर दिया है. अब वो नज़रें नीची किए सहमी-सहमी सी रहती है और 'हूं-हां' के अलावा ज़्यादा कुछ नहीं बोलती. हालांकि, दो-तीन दिनों की काउंसलिंग के बाद अब उसने सिर उठाकर नज़रें मिलाना शुरू कर दिया है."
आईएचबीएएस के डॉक्टर जीटीबी अस्पताल जाकर भी घायलों और उनके परिजनों की काउंसलिंग कर रहे हैं.
कैसे की जाती है काउंसलिंग?
डॉक्टर साक्षी बताती हैं कि ट्रॉमा (सदमे) के शिकार लोगों की काउंसलिंग के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं उनमें 'कॉन्गिटिव बिहेवियरल थेरेपी' (सीटीबी) और 'सपोर्टिव लिसनिंग' सबसे प्रमुख हैं.
सीटीबी के ज़रिए पेशेवर मनोचिकित्सक ट्रॉमा के शिकार व्यक्ति से बातचीत करके उसके सोचने का तरीका धीरे-धीरे बदलने की कोशिश करते हैं.
वहीं, सपोर्टिव लिसनिंग का मक़सद ये होता है कि सामने वाला अपने मन की सारी बातें, सारी चिंताएं और सारे डर बातचीत के ज़रिए निकाल दे.
'सपोर्टिव लिसनिंग' के दौरान डॉक्टर व्यक्ति की बातें ध्यान से सुनते और समझते हैं. वो उनसे हमदर्दी जताते हैं लेकिन उपदेश नहीं देते और न ही जबरन सकारात्मक बातें करते हैं. वो सिर्फ़ सामने वाले व्यक्ति को ये अहसास दिलाते हैं कि वो उन पर भरोसा कर सकता है और उसकी सभी भावनाएं वाजिब हैं.
डॉक्टर साक्षी ने बताया, "काउंसलिंग की प्रक्रिया में डॉक्टर दवाइयां नहीं देते. अगर दवाइयों की ज़रूरत हो तो हम मरीज़ को दूसरे वार्ड में शिफ़्ट करते हैं."
बिना मनोचिकित्सक की सलाह लिए नींद की गोलियां खाने को भी डॉक्टर साक्षी ख़तरनाक बताती हैं.
दंगाग्रस्त इलाकों में जाकर काउंसलिंग करते डॉक्टर
प्रोग्रेसिव मेडिकोज़ ऐंड साइंटिस्ट्स फ़ोरम (PMSF) के अध्यक्ष डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी दंगाग्रस्त इलाकों के अलग-अलग अस्पतालों में जाकर लोगों की काउंसलिंग कर रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बताया, "शुरू के दिनों में मुझे बहुत-सी ऐसी बुजुर्ग महिलाएं मिलीं जो बेहद डरी हुई थीं, लगातार रो रही थीं और उनकी हालत बेहद बुरी थी. मैंने इस बारे में सोशल मीडिया पर लिखा था कि दंगा पीड़ितों की मानसिक स्थिति की ओर ध्यान देने की ज़रूरत है."
डॉक्टर हरजीत उस वक़्त मुस्तफ़ाबाद के अल हिंद हॉस्पिटल में काम कर रहे थे जब पुलिस शिव विहार से 25 के करीब परिवारों को बचाकर लाई.
उन्होंने बताया, "ये ऐसे परिवार थे जो जान बचाकर रातभर इधर-उधर छिपते फिर रहे थे. जब मैं इन परिवारों के बच्चों से मिला और उनसे बात करने की कोशिश की तो न तो वो मेरी बात समझ पा रहे थे और न ही मेरे किसी भी सवाल का जवाब दे रहे थे."
डॉक्टर हरजीत के मुताबिक़ बच्चों के ठीक रहने के लिए उनमें सुरक्षा की भावना होना बहुत ज़रूरी है और दंगों या हिंसा के बाद ये सुरक्षा की भावना ख़त्म हो जाती है.
बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ ऐंड एलाइड साइंसेज़ (NIMHANS) में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट आफ़िया मोहम्मद भी वॉलेंटियर्स के ज़रिए फ़ोन पर दंगा पीड़ितों की मदद करने की कोशिश कर रही हैं.
मानसिक सेहत को नज़रअंदाज़ करने के ख़तरे
अगर दंगों या हिंसा के बाद मानसिक स्वास्थ्य का ख़याल न रखा जाए तो ये भविष्य में और ज़्यादा ख़तरनाक बन सकता है. उदाहरण के तौर पर यह पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) का रूप ले सकता है. पीटीएसडी उस अवस्था को कहते हैं जब किसी घटना के छह महीने बाद भी व्यक्ति उसके सदमे से न उबर पाए.
इसके अलावा क्रोनिक डिप्रेशन, एडिक्शन (लत), आत्मघाती प्रवृति (ख़ुदकुशी के ख़याल या ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने की आदत) और यहां तक सिज़ोफ़्रेनिया गंभीर जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं.
डॉक्टर हरजीत दिल्ली हाईकोर्ट का शुक्रिया अदा करते हैं और क्राइसिस सपोर्ट सेंटर को एक छोटी ही सही मगर सकारात्मक शुरुआत बताते हैं.
वो कहते हैं, "रोज़मर्रा की तरह ही हम हिंसा के बाद भी सिर्फ़ शरीर पर दिख रहे ज़ख़्मों का इलाज कराते हैं. सरकारें और डॉक्टर भी अमूमन उसे ही प्राथमिकता देते हैं. लेकिन जिस तरह शरीर पर लगी चोटों का ठीक होना ज़रूरी है, वैसे ही मानसिक आघात से उबरना भी ज़रूरी है."
डॉक्टर साक्षी भी मानती हैं कि क्राइसिस सपोर्ट सेंटर के बारे में अभी बहुत से दंगा पीड़ितों को नहीं मालूम है लेकिन वो उम्मीद जताती हैं कि धीरे-धीरे इसकी जानकारी ज़्यादा लोगों तक पहुंच पाएगी.
इस मद्देनज़र कुछ अख़बारों में विज्ञापन दिए जा रहे हैं, दंगा प्रभावित इलाकों में पोस्टर लगाए जा रहे हैं और मेडिकल कैंप में भी धीरे-धीरे ही सही, मनोचिकित्सक पहुंचने लगे हैं. क्या पता, कुछ वक़्त के बाद ये मदद सदरे आलम, फ़ातिमा और नुज़हत तक भी पहुंच जाए.
नोट: दवा और थेरेपी के ज़रिएमानसिक बीमारियों का इलाज संभव है. इसके लिए आपको किसी मनोचिकित्सक से मदद लेनी चाहिए. अगर आपमें या आपके किसी करीबी में किसी तरह की मानसिक तकलीफ़ के लक्षण हैं तो इन हेल्पलाइन नंबरों पर फ़ोन करके मदद ली जा सकती है:
- सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय-1800-599-0019
- इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड साइंसेज़- 9868396824, 9868396841, 011-22574820
- नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंसेज़- 080 - 26995000
- विद्यासागर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ ऐंड एलाइड साइंसेज़, 24X7 हेल्पलाइन-011 2980 2980
ये भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)