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जातीय जनगणना का मुद्दा बिहार के बाद महाराष्ट्र में गर्म- प्रेस रिव्यू
साल 2021 की जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग की गिनती की मांग को लेकर महाराष्ट्र से एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मिलेगा.
द हिंदू अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ विधानसभा के स्पीकर नाना पटोले के निर्देश के बाद के गृह मंत्री अजित पवार ने शुक्रवार को विधानसभा में ये घोषणा की. राज्य विधानसभा ने आठ जनवरी को एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से जाति आधारित जनगणना कराए जाने की मांग की थी.
जब कांग्रेस के विधायक विकास ठाकरे ने इस प्रस्ताव पर केंद्र की प्रतिक्रिया के बारे में विधानसभा में पूछा तो स्पीकर नाना पटोले ने बताया कि केंद्र सरकार ने विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है.
नाना पटोले ने भारत के रजिस्ट्रार जनरल और सेंसस कमिश्नर विवेक जोशी का जवाब सदन के सामने रखा, "अन्य पिछड़ा, सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग, अन्य जातियों, आदि के आंकड़े इकट्ठा करने से जनगणना के कार्य पर नकारात्मक असर पड़ेगा."
विधानसभा में विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस ने कहा, "इस मसले पर केंद्र के स्तर पर एक नीतिगत निर्णय लिए जाने की ज़रूरत है. बीजेपी भी इस मांग को लेकर सकारात्मक है. अगर हम सब मिलकर प्रधानमंत्री से मिलेंगे तो मुझे यक़ीन है कि हम कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे."
बिहार विधानसभा ने कुछ दिनों पहले ऐसा ही एक प्रस्ताव पारित करके अन्य पिछड़ा वर्ग की गिनती के लिए जाति आधारित जनगणना कराए जाने की मांग की थी.
'विवाद से विश्वास तक'
इनकम टैक्स विभाग की नई योजना 'विवाद से विश्वास तक' को नोटबंदी के बाद जांच-पड़ताल की ज़द में आए लोगों के लिए एक मौक़े के तौर पर देखा जा रहा है.
अंग्रेज़ी अख़बार इकॉनॉमिक टाइम्स ने विभाग के सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि नोटबंदी के समय खनन, कॉमोडिटी, कपड़ा और रीयल एस्टेट सेक्टर की कई कंपनियों ने बेहिसाब पैसा बैंकों में जमा कराया था और उनके बही-खातों में दर्ज ब्योरों पर सवाल उठे थे.
अख़बार के मुताबिक़ ज़्यादातर मामलों में इनकम टैक्स विभाग ने कंपनियों से इनकम टैक्स एक्ट की धारा 68 के तहत ऐसी कंपनियों से नोटिस जारी कर ऐसे पैसे का स्रोत पूछा था जो या तो उनकी बही-खातों में नोटबंदी की अवधि के दौरान दर्ज हुए थे या फिर जिन्हें बैंक में जमा किया गया था.
जानकारों का कहना है कि इस योजना का फ़ायदा इनकम टैक्स छापों और तलाशी का निशाना बने लोगों की तुलना में नोटबंदी के दौरान नोटिस पाने वाले करदाता ज़्यादा उठा पाएंगे.
नोटबंदी के समय सरकार ने 500 और 1000 रुपए के नोटों पर पाबंदी लगा दी थी जिसके बाद कई कंपनियों और आम लोगों ने अपने पास पड़ी नक़दी बैंकों में जमा की थी.
छत्तीसगढ़ में आयकर छापे
छत्तीसगढ़ में 50 से ज़्यादा ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे की ख़बर को इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने पहले पन्ने पर जगह दी है.
अख़बार के मुताबिक़ गुरुवार और शुक्रवार को मारे गए छापों में वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों, मुख्यमंत्री के उपसचिव और रायपुर के मेयर के घर भी शामिल थे.
आयकर विभाग के इन छापों की वजह से एक तरफ़ राज्य नौकरशाही में अफ़रा-तफ़री का माहौल है तो दूसरी तरफ़ सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है.
दोनों ही पक्ष एक दूसरे पर भ्रष्टाचार और बदले की राजनीति का आरोप लगा रहे हैं.
अख़बार ने विभागीय सूत्रों के हवाले से लिखा है कि छापे के दौरान सीआरपीएफ़ जवानों की मदद ली गई और राज्य की पुलिस या दूसरी एजेंसियों से कोई जानकारी साझा नहीं की गई.
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मुद्दे पर राज्य कैबिनेट की बैठक बुलाई जिसके बाद इसे राजनीति से प्रेरित कहा गया.
जस्टिस अरुण मिश्रा की दलील
सद्भावना में कही गई बात पर विवाद खड़ा करके उसमें जजों को खींचने से बचा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा ने शुक्रवार को खुली अदालत में ये बात कही. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस मिश्रा का इशारा 22 फरवरी को इंटरनेशनल ज्यूडिशियल कॉन्फ़्रेंस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ के बाद उठे विवाद पर था.
अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन 2020 को संबोधित करते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा था, "हमारी सबसे बड़ी चिंता है कि लोग गरिमापूर्ण तरीके से रहें. हम बहुमुखी प्रतिभा वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा करते हैं जो वैश्विक सोच रखते हैं और स्थानीय स्तर पर काम करते हैं. पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय का एक ज़िम्मेदार सदस्य है."
जस्टिस मिश्रा के बयान के बाद कई हलकों में इसकी आलोचना हुई थी. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस मिश्रा की टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा था कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर नकारात्मक असर पड़ेगा.
शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा ने एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा कि क्या वे ख़ान मार्केट के पास रहते हैं. इस पर अभिषेक मनु सिंघवी ने जवाब दिया, "मैं लुटियन दिल्ली काफी पहले छोड़ चुका हूं लेकिन कभी-कभी ख़ान मार्केट जाना होता है. इन दिनों ये एक गाली बन गई है. मुझे ख़ान मार्केट एलीट कहलाने से कोई दिक्कत नहीं है."
तब जस्टिस मिश्रा ने कहा, "अच्छे शब्दों के इस्तेमाल को उनकी पूरी भावना में ही देखा जाना चाहिए. मैं आपके लिए भी अच्छे शब्दों का इस्तेमाल कर सकता हूं लेकिन तब दूसरे लोग मुझ पर आरोप लगाने लगेंगे."
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