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अमूल्य पटनायक: दिल्ली पुलिस से ज़्यादा 'विडंबनाओं के कमिश्नर'
तीन साल और एक महीने तक दिल्ली पुलिस कमिश्नर का पद संभालने वाले अमूल्य पटनायक 29 फ़रवरी 2020 को रिटायर हो रहे हैं.
1 मार्च से आईपीएस एसएन श्रीवास्तव यह पद संभालेंगे. पटनायक 30 जनवरी 2017 को दिल्ली पुलिस के कमिश्नर बने थे. उससे पहले पटनायक दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (निगरानी और प्रशासन) के पद पर थे.
पटनायक उस समय रिटायर हो रहे हैं, जब दिल्ली पुलिस सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है. नवंबर 2019 में पुलिस-वकील विवाद, फिर जेएनयू में हिंसा करने वालों को पकड़ने में नाकामी, फिर जामिया छात्रों पर लाठीचार्ज और अब दिल्ली हिंसा. इन सभी विवादों के मूल में दिल्ली पुलिस रही, लेकिन पटनायक कहीं नज़र नहीं आए.
दिलचस्प बात ये है कि जब जनवरी 2017 में पटनायक के नाम का ऐलान हुआ था, तब उनके नाम को लेकर काफ़ी विवाद हुआ था. पटनायक को ये पद दो अफ़सरों की वरिष्ठता नज़रअंदाज़ कर दिया गया था. तब कहा गया था कि उन्हें उनकी साफ़ छवि की वजह से ये पद मिला.
पटनायक को कमिश्नर बनाते समय जिन दो अफ़सरों को नज़रअंदाज़ किया गया, वो दोनों ही 1984 बैच के AGMUT काडर के आईपीएस दीपक मिश्रा और धर्मेंद्र कुमार हैं.
दीपक उस समय CRPF एडीजी और धर्मेंद्र CISF एडीजी के तौर पर काम कर रहे थे.
नियुक्ति के समय कहा गया कि पटनायक क़ानून व्यवस्था क़ायम रखने में उस्ताद हैं. कई लोग उन्हें हार्ड टास्क मास्टर के तौर पर भी जानते हैं. हालांकि उनके नाम पर कोई ऐसा बड़ा मामला नहीं जिसकी जाँच को मिसाल माना जाए. बॉम्बे ब्लास्ट आरोपी केस, पार्सल बम केस, सरिता विहार अपहरण केस और असग़र गैंग केस वो मामले हैं जिनकी जाँच में उन्होंने अहम भूमिका निभाई है.
... जब पुलिसवालों के साथ मारपीट पर चुप रहे पटनायक
नवंबर 2019 में दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट से दिल्ली पुलिस के जवानों और वकीलों के बीच मारपीट हुई. डीसीपी मोनिका भारद्वाज के साथ बुरा बर्ताव हुआ. लेकिन कमिश्नर होने के नाते पटनायक अपने 89,000 जवानों के हक़ में खड़े नहीं दिखाई दिए.
यहां तक कि दिल्ली पुलिसकर्मियों ने दिल्ली पुलिस के हेडक्वॉर्टर का घेराव करते हुए धरना प्रदर्शन भी किया. फिर भी पटनायक इतना ही बोले, "ये दिल्ली पुलिस के लिए परीक्षा का समय है. पिछले कुछ दिनों में ऐसे वाक़ये हुए, जिन्हें हमने अच्छी तरह हैंडल किया. हमसे उम्मीद की जाती है कि हम क़ानून की रक्षा करेंगे."
15 जनवरी 1960 को पैदा हुए पटनायक मूलत: उड़ीसा से ताल्लुक़ रखते हैं. वह 1985 बैच के AGMUT काडर के आईपीएस हैं. इससे पहले उन्होंने उत्कल यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में ग्रैजुएशन और 1981 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स किया था. उनकी पहली पोस्टिंग दिल्ली में नज़फ़गढ़ के एसीपी के तौर पर हुई थी. 1989 से 1993 तक वो पॉन्डिचेरी के एसएसपी भी रहे. वो राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित भी हो चुके हैं.
जेएनयू और जामिया के छात्रों के साथ विवाद
दिल्ली में नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों ने पुलिस पर ज़्यादती के आरोप लगाए. 15 दिसंबर को विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और भीड़ में टकराव हुआ, जिसके बाद सराय जुलेना और मथुरा रोड पर कुछ डीटीसी बसों में आग लगाई गई.
जामिया के चीफ़ प्रॉक्टर वसीम अहमद ख़ान ने आरोप लगाया, "दिल्ली पुलिस जबरन यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर घुस आई है. हमारे स्टाफ़ और छात्रों को पीटा गया है और उन्हें कैंपस छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है."
इस पर दिल्ली पुलिस ने जवाब दिया कि छात्रों को नहीं, बल्कि उपद्रवियों को पीट रही थी.
हालांकि 15 दिसंबर से शुरू हुए विवाद का एक विडियो 15 फ़रवरी को सामने आया, जिसमें पुलिस लाइब्रेरी में बैठे छात्रों पर लाठियां बरसाती दिखी.
वहीं जेएनयू में पाँच जनवरी की सुबह 11.30 बजे रजिस्ट्रेशन कराने आए चार छात्रों को एक समूह ने पीटा था. इस दौरान बीच-बचाव करने आए सुरक्षा गार्डों को भी पीटा गया. दोपहर 3.45 बजे मिनट पर पेरियार हॉस्टल में घुसकर छात्रों पर हमला हुआ. इस दौरान हमलावरों के चेहरे ढँके हुए थे.
कई घंटों तक चली इस हिंसा में कई छात्राओं के साथ भी मारपीट की गई. आरोप है कि मदद मांगने के बावजूद दिल्ली पुलिस कैंपस के अंदर नहीं गई.
इन दोनों मामलों में पुलिस के काम करने के तौर-तरीक़ों पर सवाल उठे, लेकिन पटनायक की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया.
दिल्ली हिंसा में पुलिस की भूमिका पर सवाल
23 फ़रवरी की शाम से उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा फैलने के बाद पुलिस की भूमिका पर लगातार सवाल उठे. इस हिंसा में अब तक 38 लोगों की मौत हो चुकी है.
यह मामला इतना गंभीर हो गया कि दिल्ली हाईकोर्ट तक ने पुलिस को फटकार लगाते हुए ग़लती करने वालों के ख़िलाफ़ ऐक्शन लेने का आदेश दिया था.
यहां ध्यान देने वाली बात है कि 1995 में पटनायक ने दिल्ली पुलिस और एक एनजीओ के साथ मिलकर 'प्रतिधि' नाम की पहल शुरू की, जो अपराधों से पीड़ित महिलाओं को काउंसलिंग और दूसरी मदद मुहैया कराती थी. पर जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा के वक़्त 10 साल की बच्ची से 80 साल की बुज़ुर्ग महिलाएं तक मदद की गुहार लगा रही थीं, तब पटनायक उनके प्रतिनिधि के तौर पर भरोसा नहीं दिला पाए.
सोशल मीडिया और मीडिया दोनों से दूर
आज जब देश में हर ज़िले की पुलिस को सोशल मीडिया पर लाने की कोशिश हो रही है, उस दौर में दिल्ली पुलिस कमिश्नर के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से आख़िरी ट्वीट 31 दिसंबर 2019 को किया गया था.
25 फ़रवरी को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, "मैंने अपने विधायकों के साथ मीटिंग की थी. उन सबकी एक शिकायत है कि फ़ील्ड पर पुलिस बहुत कम है और पुलिसवालों को ऐक्शन लेने का आदेश नहीं है. मैं गृहमंत्री के साथ मीटिंग में इस बात का ज़िक्र करूंगा."
इन गंभीर आरोपों पर पटनायक ने जवाब दिया, "न्यूज़ एजेंसी की तरफ़ से ये ख़बर चली थी कि मीटिंग में शायद दिल्ली पुलिस की तरफ़ से ये कहा गया था कि हमें गृह मंत्रालय से फोर्स कम मिली है. ये सूचना ग़लत है. गृह मंत्रालय से हमें फुल सपोर्ट है. फोर्स भी पर्याप्त मिली है, जिसे इस्तेमाल किया जा रहा है."
उनके इस बयान को उनके द्वारा गृह मंत्रालय का बचाव करने के तौर पर देखा गया.
पटनायक के एक क़रीबी अफ़सर के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस लिखता है, "ख़ुद को काग़ज़ी काम में मसरूफ़ रखने वाले और सार्वजनिक कार्यक्रमों में कम ही जाने वाले पटनायक कमिश्नर बनने के बाद और ज़्यादा रिज़र्व हो गए. हालांकि, वह एक 'मज़बूत उड़िया सर्कल' का हिस्सा हैं, जो नाकामी के बावजूद उन्हें ऐक्शन से बचा लेता है."
अमूल्य पटनायक जिन हालात में रिटायर हो रहे हैं, उसके बाद देखना दिलचस्प होगा कि नए कमिश्नर लोगों के दिलों में पुलिस को लेकर कितना भरोसा क़ायम कर पाते हैं.
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