बिहार: मगहिया पान के किसान बेबस होकर रो क्यों रहे हैं

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, नवादा से, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार के नवादा का हिसुआ बस स्टैंड. यहां गाड़ियों की कानफोड़ू आवाज़ों के बीच बस स्टैंड के कोने पर ही फल की दुकान पर मशहूर भोजपुरी गाना बज रहा है, "खाइके मगहिया पान, ए राजा हमरी जान लेबे का..."

लेकिन इस बस स्टैंड से पांच किलोमीटर दूर डफलपुरा गांव में ये मगहिया पान सचमुच जान लेने पर आमादा है. गांव में पान किसान कृष्णदेव प्रसाद चौरसिया अपनी 'पान की कोठी' में खड़े होकर रो रहे हैं.

उनके मगही पान के पत्ते सड़ चुके हैं. इस पान का एक बंडल (250 पत्ते) स्थानीय बाजार में महज 3 रुपये में बिकेगा. यानी एक पत्ते की कीमत एक पैसे से थोड़ी ज़्यादा.

कृष्णदेव की पान की खेती लगातार तीन साल से बर्बाद हो रही है और उन पर लाखों का कर्ज़ है.

उनके बेटे धीरेन्द्र चौरसिया, जो इलाक़े के वॉर्ड पार्षद भी हैं, बताते हैं, "20 लाख का कर्ज़ा है हम लोगों पर. पिताजी रात भर सोते नहीं है और दिन भर रोते रहते हैं. हमारे पास मरने के सिवा और कोई चारा नहीं."

खेत मालिक से खेत मज़दूर

सिर्फ़ कृष्णदेव ही कर्ज़ में डूबे हुए नहीं हैं, बल्कि डफलपुरा गांव के मगही पान की खेती करने वाले सभी किसानों का यही हाल है.

ये कर्ज़दार किसान सरकारी उदासीनता और मौसम की मार के मारे हुए हैं.

सुनैना और सुनील चौरसिया के पास कभी तीन बीघा खेत थे लेकिन पान की खेती ने उन्हें ऐसा कर्ज़दार बनाया कि इस दंपती को अपने खेत बेचने पड़े.

50 साल की सुनैना का बेटा सूरत की एक कपड़ा कंपनी में मिल मज़दूर है जबकि वो ख़ुद खेत मज़दूर हैं.

सुनैना बताती हैं, "मैं और मेरा आदमी अब पान के खेत में मज़दूरी करते है. लाखों का कर्ज़ा हो गया तो क्या करते?"

लेकिन इन खेत मज़दूरों के साथ एक दूसरी मुश्किल भी है.

खेत मजदूर पार्वती और कमला देवी बताती हैं कि औरतों की दिन भर की मज़दूरी डेढ़ सौ और मर्दों की तीन सौ रुपये हैं.

लेकिन वे कहती हैं कि जब खेत मालिक को ही आमदनी नहीं होगी तो हम उससे मज़दूरी के लिए कैसे लड़ें?

मगही पान को जीआई टैग

साल 2018 में बिहार में कतरनी चावल, जर्दालु आम और मगही पान को जआई टैग (जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन सर्टिफ़िकेशन) मिला था.

मगही पान का पत्ता बहुत पतला और मुलायम होता है. मार्च से लेकर मई यानी तीन माह के अंदर ही इसे लगाया जाता है और एक साल बाद ये तैयार होता है.

बांस, पुआल, पैराशूट (वॉटरप्रूफ धागे) की मदद से पान की कोठी (बरेठा) या वो ढांचा तैयार किया जाता है जिस पर पान की खेती होती है.

इन खेतों की सिंचाई आम फसल की तरह ना होकर, घड़े में पानी भरकर होती है.

यानी एक आदमी 22 से 23 इंच चौड़ी सापुर (मेढ़) पर जिस पर पान की कलम लगती है, उसे 40 किलो का घड़ा कंधे पर रखकर सिंचाई करनी पड़ती है.

पान की खासियत

एक साल की इस खेती की सारे मौसम में देखभाल करनी पड़ती है. एक भी मौसम पान की खेती के अनुकूल नहीं होने से पूरी फसल बर्बाद हो जाती है.

जैसे इस बार ठंड ज्यादा पड़ने से पान की फसल बर्बाद हो गई. इस पान की खासियत है कि आप इसे 6 महीने तक रख सकते है.

हल्के गीले सूती कपड़े में रखने पर ये पान पहले हल्का हरा, फिर पीला, दूधिया सफेद और फिर हरा हो जाता है. इस पूरी प्रक्रिया को 'पान को पकाना' कहते है.

73 साल के अर्जुन चौरसिया जिनकी पान की खेती बर्बाद हो गई है, बताते है, "एक बच्चे की तरह पान की खेती की देखभाल करनी पड़ती है. हर बार नई पान की कोठी तैयार करनी पड़ती है. जाड़ा गर्मी बरसात सब देखना पड़ता है. आप मगही पान खाकर वाह-वाह करते है लेकिन हम किसानों से पूछिए कि कितने कर्ज में डूबे हुए हैं."

मगही पान की लाली पड़ रही है फीकी

बिहार में नवादा, गया, औरंगाबाद सहित 17 जिलों में मगही पान की खेती होती है. मगही पान का जीआई टैग मगही पान उत्पादक कल्याण समिति, नवादा के नाम पर हुआ है.

इसके सचिव रंजीत चौरसिया बताते है कि मगही पान की खेती करने वालों की संख्या पहले लाखों में थी जो 95 फ़ीसदी चौरसिया समाज के लोग करते थे लेकिन अब ये घटकर महज 40 हज़ार के पास रह गई है.

मुश्किल हालात में पान किसान पलायन करने और बड़े शहरों में 'मज़दूर' बन जाने को मजबूर है.

किसानों की मुश्किल

मौसम की मार के अलावा पान किसानों की मुश्किल तीन स्तर पर है. पहला, उनके लिए पान मंडी बिहार में नहीं है.

उन्हें अपना पान पिकअप गाड़ी पर लादकर, ट्रैफिक जाम में नहीं फंसने की स्थिति में 12 घंटे यात्रा करके बनारस की पान मंडी जाना पड़ता है.

यहां पान के कमीशन एजेंट (पान व्यापारी और किसान के बीच की कड़ी) उनका शोषण करते है.

बनारस के पान व्यापारी मगही पान को 'पकाकर' देश और विदेश खासतौर पर सऊदी अरब, दुबई आदि देशों में बेचते हैं.

पान किसान जिस पत्ते को महज 50 पैसे या एक रुपये में बेचते है, उसको पान व्यापारी 10 रुपये में बेचते हैं.

दूसरा ये कि इस खेती में प्रति कठ्ठा लागत तकरीबन 40 हज़ार रुपये है लेकिन खेती को क्षति होने की स्थिति में सरकार प्रति कठ्ठा सिर्फ 1500 रुपये देती है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

रंजीत चौरसिया बताते हैं, "पान हॉर्टिकल्चर में रखा गया है और 2008 -09 में सरकार ने ख़ुद तय किया कि 200 वर्ग मीटर की लागत किसान को 30,000 रुपये पड़ती है. ऐसे में पहले सरकार सहायता अनुदान राशि 15,000 रुपये देती थी."

"बाद में 2012-13 में राष्ट्रीय बागवानी मिशन ने भी उसमें कुछ राशि दी और ये सहायता राशि 27,000 रुपये हो गई. लेकिन 2014 -15 में ये व्यवस्था खत्म कर दी गई. नतीजा ये कि खेती ख़राब हुई तो किसान मरने की स्थिति में आ जाता है."

तीसरा ये कि किसान लंबे समय से पान की खेती को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत लाने की मांग कर रहे है.

सरकार के क़दम

ऐसा नहीं है कि बिहार सरकार पान किसानों की इन तकलीफ़ों से वाकिफ़ नहीं है.

बिहार कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक (प्रसार शिक्षा) आरके सोहाने बताते है, "शेडनेट के लिए सरकार ने वित्तीय वर्ष 2019-20 और 2020-21 के लिए 3 करोड़ 39 लाख रुपये का बजट दिया है. बाक़ी किसानों के लिए गया में मंडी भी बननी है, जिसका काम अभी प्रक्रिया में है."

शेडनेट एक तरीके का मेटल पाइप का बना स्ट्रक्चर है जो बांस और पुआल से बनी पान की कोठी की जगह लगाया जाएगा.

सरकार शेडनेट और उसके लिए आवंटित फ़ंड का हवाला दे रही है मगर किसान इससे संतुष्ट नहीं हैं.

मगही पान की खेती

पान किसान धीरेन्द्र चौरसिया कहते हैं, "हम लोग शेडनेट का बहिष्कार करेंगे. एक बार और भी सरकार ने शेडनेट लगाया था. कड़ी धूप में पाइप गर्म हो गया और पान के पत्ते गल गए."

"पान की खेती में मौसम के हिसाब से अडजस्टमेंट करना पड़ता है जो पुआल से ही संभव है. सरकार हमें राहत दे, खेती करना न सिखाए. पान और हमारा रिश्ता तो जनम जनम का है."

इस तरह की मांगें लंबे समय से उठ रही हैं और इन्हें पूरा करने की बातें भी लंबे समय से हो रही हैं. मगर किसानों को लगता है कि सरकार का ध्यान उनकी तरफ़ है ही नहीं.

ऐसे में वे अपने स्तर पर कई तरह की समस्याओं से जूझते हुए परिवार का पेट पालने के लिए मगही पान की खेती में जुटे हुए हैं.

आए दिन कृष्णदेव प्रसाद चौरसिया जैसे किसानों की मगही पान की कोठियां उनकी आंखों से बह निकलने वाले बेबसी के आंसुओं से भीग जाया करती हैं.

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