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पुलवामा हमला: पहले बेटा खोया, अब 'बेघर' होने की कगार पर जवान के माता-पिता
- Author, अनुराग तिवारी
- पदनाम, वाराणसी से, बीबीसी हिंदी के लिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में एक जवान का परिवार अधूरे वादों के पूरा होने के इंतज़ार में है. वाराणसी के तोफ़ापुर गांव के रहने वाले रमेश यादव की 14 फ़रवरी, 2019 को पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले में मौत हो गई थी.
रमेश यादव की मौत के बाद उनके गांव पहुंचे मंत्रियों और सरकार के अधिकारियों ने कई वादे किये थे. इन वादों में रमेश की पत्नी और बड़े भाई को नौकरी, जर्जर मकान की मरम्मत, स्मृति द्वार, स्मारक, सड़क जैसे वादे शामिल थे.
इनमें से कुछ वादे पूरे भी हुए लेकिन अधिकतर अभी भी अधूरे हैं. पुलवामा हमला 2019 के लोकसभा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था. इस चरमपंथी हमले को सत्ताधारी बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनाया था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार ने सत्ता में वापसी भी की.
सरकार की तरफ़ से रमेश की विधवा हो चुकीं पत्नी रीनू यादव को वाराणसी के डीएम ऑफिस में नौकरी दी जा चुकी है. वो इस दबाव में ज़्यादा कुछ बोलने से बचती हैं.
उनका कहना है, "जिस औरत के पति की मौत हो चुकी हो, उसका सबकुछ वैसे ही ख़त्म हो चुका है. कोई भी सहायता उसकी भरपाई नहीं कर सकती. ढाई साल का बेटा आयुष है, उसे तो यही नहीं पता, उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं."
रमेश यादव के पिता श्याम नारायण यादव सरकार के मंत्रियों की वादा-ख़िलाफी से दुखी और नाराज़ हैं. वो कहते हैं, "बेटे की मौत के बाद नेता और मंत्री आए, उन्होंने बड़े बेटे की नौकरी का वादा किया था. बहू को नौकरी देने के बाद उन्हें लगता है हम राजा बाबू हो गए हैं, लेकिन परिवार बदहाल हो चुका है."
रमेश यादव की मौत के बाद यूपी सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने श्याम नारायण यादव के बड़े बेटे राजेश को भी नौकरी देने का वादा किया था. इस बारे में मीडिया को दिए गए वीडियो बयान भी मौजूद हैं.
रमेश के पिता कहते हैं, "मंत्री जी तो अपना वादा भूले ही, समय के साथ और भी नेता अपने वादे भूल चुके हैं."
उनके मुताबिक़ कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी ने भी कर्नाटक में सरकारी नौकरी दिलाने का वादा किया था.
नियमों का हवाला दे रहे मंत्री
बड़े भाई राजेश की नौकरी के बारे में यूपी के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर अब नियमों का हवाला देते हैं.
उनका कहना है, "शहीद रमेश यादव की पत्नी को नौकरी मिल चुकी है. सरकार के नियमों में परिवार के किसी और सदस्य को नौकरी देने का प्रावधान नहीं है."
रमेश के बड़े भाई राजेश कहते हैं, "सरकार मदद करे तो भाई की तरह मैं भी सेना में भर्ती होना चाहता हूं."
राजेश अपने छोटे भाई की मौत के समय बंगलुरु में नौकरी कर रहे थे. इस समय वो दूध के सीमित व्यापार में अपने पिता की मदद करते हैं. उनके तीन बच्चे हैं, जिनके भविष्य को लेकर वो भी खासे चिंतित दिखते हैं.
रमेश के पिता का कहना है कि उनके हिस्से का मकान पारिवारिक बंटवारे में उनके भाइयों के पास जा चुका है. इस बंटवारे के मुताबिक़ मकान के नाम पर बने दो कमरे कुछ दिनों बाद तोड़ दिए जाएंगे.
रमेश के पिता दावा करते हैं कि अंत्येष्टि के दिन उनसे दो कमरे का मकान बनवाने का वादा किया गया था.
वो बताते हैं, "एक दिन एक अधिकारी आया था और उसने मोबाइल पर परिवार के लिए मकान की मंज़ूरी दिए जाने का आदेश दिखाया था."
हालांकि, न तो वे उस अधिकारी का नाम याद कर पाते हैं न इससे सम्बंधित कोई आदेश दिखा पाते हैं.
रमेश यादव की मां राजमती देवी अभी तक बेटे की मौत के सदमे से नहीं उबरी हैं. वो बातचीत के दौरान बेटे को याद करके रो पड़ती हैं.
वो बताती हैं, "बेटे की सीआरपीएफ़ में नौकरी लगी तो सभी बेहद ख़ुश थे. उसने अपनी तनख्वाह से पिता के कुछ क़र्जे़ चुकाए थे. उसकी मौत के बाद मिली सहायता राशि से परिवार ने बचे हुए क़र्जे़ चुकाए."
रमेश यादव की बचपन की तस्वीरें दिखाने के अनुरोध पर टीन की छत की तरफ़ इशारा करते हुए बताती हैं, "उसी के नीचे आलमारी पर रखी थीं तस्वीरें, बारिश में भीगकर ख़राब हो गईं."
रमेश के पिता ने अपने और पोते आयुष के इलाज के लिए खेत गिरवी रखकर क़र्ज़ लिया था. लीवर में पस भर जाने के चलते, वो काफी बीमार थे. इसके इलाज के लिए उन्होंने तकरीबन ढाई लाख रुपये बतौर क़र्ज़ लिए थे.
परिवार का कहना है कि सहायता राशि से क़र्ज़ और ब्याज़ चुकाने के बाद उनके पास मकान बनाने के पैसे भी नहीं बचे हैं.
पहले बन गई आवास योजना की लिस्ट
मकान के बारे में पूछे जाने पर वाराणसी के डीएम कौशल राज शर्मा कहते हैं, "प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ग्रामीण इलाक़ों की लिस्ट काफ़ी पहले बन चुकी थी, उसमें इस परिवार का नाम न होने के चलते मकान नहीं मिला होगा. हाल ही में उस इलाक़े के कुछ गांव नगर निगम के दायरे में आ गए हैं. अगर ऐसा है तो शहरी क्षेत्र के लिए पीएम आवास योजना में परिवार को मकान दिलाए जाने का पूरा प्रयास किया जाएगा."
जबकि इस मामले में यूपी के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर नियमों का हवाला देते हुए मकान की बात से साफ़ इनकार कर देते हैं. वहीं, केंद्रीय मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय ने बस इतना कहा कि वो डीएम से बात करके ही इस मामले में कुछ कहेंगे.
इसके अलावा रमेश यादव की याद में गांव में एक सड़क बनाने का वादा भी किया गया था. वो भी अभी पूरा नहीं हो सका है. जहां से सड़क रमेश यादव के घर तक जानी है, उसके बीच से अब रिंग रोड फ़ेज़ 2 की सड़क गुज़रेगी. इससे यह रोड बीच रास्ते में ही बंद हो जाएगा. इसको लेकर गांव वाले भी नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं.
पड़ोस के गांव शंकरपुर की प्रधान मुनकी देवी सहित कई लोग इस सम्बंध में वाराणसी डीएम को पत्र भी लिख चुके हैं. इस मामले में जानकारी देते हुए उनके पति मुन्नालाल बताते हैं, "रमेश यादव की स्मृति में गौराकलां से जो सड़क तोफ़ापुर तक जाएगी, उस पर अंडरपास न बनने से इसका कोई औचित्य नहीं रह जाएगा."
उनके मुताबिक़ इस सड़क का न केवल ग्रामीण इस्तेमाल करते हैं बल्कि सैकड़ों की संख्या में बच्चे भी इसी सड़क से स्कूल आते-जाते हैं. अंडरपास न होने से बच्चों को भी तकरीबन दो किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ेगा.
इस मामले को सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के बूथ कार्यकर्ता पुन्नू राजभर भी समय-समय पर उठाते रहे हैं. वे भी सरकार की इस कार्यप्रणाली की आलोचना करते हैं. वे कहते हैं, "स्मारक द्वार और सड़क बनने की घोषणा के बाद भी अब तक कोई काम नहीं हुआ है. राजनीति अपनी जगह लेकिन जो घोषणाएं की गई हैं, उन्हें आधा-अधूरा पूरा करने का कोई मतलब नहीं है."
इस मामले पर डीएम कौशल राज शर्मा कहते हैं, "इस सम्बंध में एनएचएआई और कार्यदायी एजेंसी से बात करके अंडरपास की व्यवस्था की जाएगी."
रमेश यादव की मूर्ति लगने के बारे में उन्होंने बताया कि जवानों की मूर्तियां लगाए जाने के लिए नाम और उपयुक्त जगह की जानकारी मांगी गई है, जल्दी ही इस पर भी काम शुरू हो जाएगा.
वादे पूरे करने के नाम पर अभी तक रमेश यादव की पत्नी को नौकरी दी गई है. घर के बाहर सभी ग्रामीणों के लिए बनने वाले 'इज़्ज़तघर' टॉयलेट का निर्माण हुआ है. इसके अलावा घर के सामने की कच्ची सड़क पर सीमेंट की टाइल्स बिछा दी गई हैं और इस पर पुलवामा हमले में मृत सभी जवानों के नाम से पौधे लगा दिए गए हैं.
परिवार बचे हुए वादों के पूरा होने को लेकर सरकारी बेरुख़ी के चलते नाउम्मीद हो चुका है.
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