शाहीन बाग़ हो या जामिया, गोली चलाने वाले आते कहां से हैं?

    • Author, ब्रजेश मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के जामिया और शाहीन बाग़ इलाक़े में गोलीबारी की घटनाएं हुईं. दोनों जगहों पर गोली चलाने वाले लोग इस विरोध प्रदर्शन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे थे और प्रदर्शन करने वालों की ओर पिस्तौल लहराई.

जामिया इलाक़े में हुई घटना में एक छात्र को गोली लगी. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. देश के दूसरे कई हिस्सों में भी विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिंसा और प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाने की घटनाएं हुई हैं.

हिंसा की ये घटनाएं जिस तेज़ी से सामने आई हैं और देश में ऐसे घटनाक्रम जिस तरह बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए यह चिंता जताई जा रही है कि आख़िर इसके पीछे कौन है?

जामिया और शाहीन बाग़ में गोली चलाने वाले दोनों शख़्स युवा हैं. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या देश के युवा किसी राजनीतिक दबाव में यह क़दम उठा रहे हैं या यह उनकी सामाजिक और मानसिक स्थिति का असर है जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करता है? समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक इसे आइडेंटिटी क्राइसिस और भड़काऊ भाषणों से भी जोड़ रहे हैं.

भड़काऊ भाषण किस हद तक ज़िम्मेदार?

पेशे से वकील और साइकोलॉजी पर काम करने वाली डॉ. अनुजा कपूर का मानना है कि भड़काऊ भाषणों का इन घटनाओं पर बड़ा असर है. उनका मानना है कि भड़काऊ भाषणों से ही साम्प्रदायिक हिंसा भड़कती है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''भड़काऊ भाषण राजनीतिक पार्टियां ही पैदा करती हैं. इसी से फ़ेक न्यूज़ भी पैदा हुई है. ये ऐसी बातें हैं जो मॉब लिंचिंग से लेकर सांप्रदायिक हिंसा तक को बढ़ावा देती हैं और लोगों को इस हद तक उकसाती हैं कि वो किसी एक शख़्स या समुदाय के ख़िलाफ़ खड़े हो जाएं. उन्हें देश या समाज के ख़िलाफ़ समझने लगें. कोई शख़्स या समुदाय उन्हें ख़तरा लगने लगे. फूट डालो और राज करो, ये अंग्रेज़ों के वक़्त से चला आ रहा है."

"ये बातें किसी शख़्स के दिलोदिमाग़ में बस जाती हैं और उसके मन में यह भावना आ जाती है कि मैं कितना तुच्छ हूं जो किसी की बात सुन रहा हूं या किसी ऐसे शख़्स को बर्दाश्त कर रहा हूं जो सही नहीं है, यहीं से उसके मन में बदले की भावना जागती है और वो मरने मारने पर उतर आता है.''

समाजशास्त्री हेमलता श्रीवास्तव का मानना है कि आज का युवा चाहे 14 साल का हो या 30 साल का हो, पूरी दुनिया में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कभी-कभी हिंसा का सहारा ले लेता है. उसकी ये हिंसा मनोवैज्ञानिक हो सकती है, कुंठा हो सकती है या राजनीतिक दलों की बातों से भी प्रेरित हो सकती हैं.

उन्होंने कहा, ''अगर इसे सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में देखें तो किसी हत्या करने के लिए या किसी का बदला लेने के लिए कोई किसी व्यक्ति को मारता है तो वह एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत होता है. लेकिन ऐसी घटनाएं जो जामिया से जुड़ी हों या शाहीन बाग़ से या सड़क पर चलता कोई शख़्स किसी को गोली मार देता है, फिर नारे लगाता है, किसी संगठन का नाम लेता है, इसके दो पक्ष हैं."

"पहला कुछ लोगों में बहुत ज़्यादा ये भावना आ गई है कि क्या हम सुरक्षित नहीं हैं. ये असुरक्षा का भाव दोनों तरफ़ है. एक संप्रदाय को लगता है कि एक ख़ास तरह की नीति सरकार बना रही है तो कल हो सकता है कि हमारे ख़िलाफ़ इसका इस्तेमाल हो और जब सड़कों पर इसके विरोध में लोग उतरते हैं तो दूसरे पक्ष को लगता है कि कल को दूसरे देशों की तरह ऐसा तो नहीं कि यह संप्रदाय अपने आप को बहुसंख्यक साबित करके अपना कुछ राजनीतिक या धार्मिक मुद्दा तो नहीं चलाना चाहता.''

क्या राजनीतिक साज़िश है?

दिल्ली में चुनाव प्रचार ज़ोरों पर है. सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीक़ों से लोगों का समर्थन जुटाने में लगे हैं. ऐसे में बीजेपी नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने भी चुनावी रैलियों में ऐसी बातें कही हैं जो किसी एक समुदाय के ख़िलाफ़ हैं या एक समुदाय को उकसाने वाली हैं. केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी सभा में एक नारा लगवाया जिसके बाद जामिया इलाक़े में गोली चलने की घटना हुई. लोग इस घटना को अनुराग ठाकुर के नारे और भीड़ को उकसाने की कोशिश से जोड़कर देख रहे हैं.

हेमलता श्रीवास्तव का मानना है, "राजनीति में दूसरे पक्ष को बदनाम करने के लिए कोई एक दल या विचारधारा ऐसी घटनाएं करती हैं जिनका आरोप वो दूसरे दल पर लगा सकें, लेकिन उसका कोई प्रमाण नहीं होता. ऐसे में आरोप प्रत्यारोप ही चलते हैं लेकिन सवाल यह है कि जिसने गोली चलाई, वो क्यों चला रहा है. लेकिन गोली चलाने की जो घटनाएं हुई हैं, एक शख़्स प्रदर्शन कर रहे लोगों को हटाना चाहता है, दूसरा गोली चलाता है और कहता है वो एक समुदाय विशेष को देश में नहीं रहने देगा. इससे यह लगता है कि माहौल बनाकर किसी ईश्वर का नाम ले लेना और समुदाय विशेष को निशाना बनाना, उनसे यह साफ़ स्पष्ट है कि इसका लक्ष्य राजनैतिक है."

अनुजा कपूर का कहना है कि इस तरह की बातों और घटनाओं को रोकना बेहद ज़रूरी है इसीलिए धारा 144 का इस्तेमाल होता है कि जब भी इस तरह का माहौल हो तो इसे लागू किया जाए और किसी भी हिंसक घटना को रोका जा सके, लेकिन पुलिस वाले इस ताक़त का इस्तेमाल नहीं करते, धीरे-धीरे भीड़ जुटती जाती है और पुलिस पीछे हट जाती है.

गोली चलाने की भावना कैसे आ जाती है?

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में लोग बीते दो महीनों से सड़कों पर हैं. देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. बीजेपी क़ानून को लेकर जागरूकता अभियान शुरू किया और हर राज्य में रैली करके लोगों तक इस बात को पहुंचाने की कोशिश की ये क़ानून नागरिकता लेने वाला नहीं नागरिकता देने वाला है. लेकिन इस क़ानून के साथ लोगों का डर एनआरसी और एनपीआर को लेकर भी है.

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में भी यह बात कही कि एनआरसी को देशभर में लागू किया जाएगा. हालांकि विरोध बढ़ने पर सरकार की ओर से यह कहा जाने लगा कि फ़िलहाल ऐसी कोई योजना नहीं है. लेकिन अधिकतर रैलियों में बीजेपी नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने विरोध प्रदर्शन करने वालों को निशाने पर लिया. शाहीन बाग़ में प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर सवाल उठे. प्रदर्शन करने वालों को बिकाऊ बताया गया और कुछ नेताओं ने तो यह भी कहा कि जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं वो पाकिस्तान के समर्थक हैं.

इन बातों का कितना असर किसी आम व्यक्ति पर हो सकता है? क्या कोई शख़्स इन बातों से बहकावे में आ सकता है और ऐसा क़दम उठा सकता है जो देश में शांति व्यवस्था बिगाड़ दे?

अनुजा कपूर कहती हैं, ''आप किसी की कमज़ोरी को पकड़ते हैं और फिर उसे इस हद तक उकसाते हैं या भरोसा दिलाते हैं कि उसकी कमज़ोरियों के पीछे कोई और ज़िम्मेदार है. मास सुसाइड ऐसे ही होती हैं. उग्रवादी कैसे बनते हैं, चरमपंथी कैसे बनते हैं, आप लोगों को पीड़ित और प्रताड़ित महसूस कराते हैं, ये कौन करता है? सरकार करती है. सरकार की ओर से ताक़त का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है. ये लोग विक्टिम ऑफ पावर हैं. इसी से आदमी ख़ुद को इतना प्रताड़ित महसूस करने लगता है कि वो हाथों में बंदूक़ उठाने पर मजबूर हो जाता है.''

''सीएए और एनआरसी पर कोई बात नहीं कर रहा क्योंकि दिल्ली में चुनाव हो रहे हैं. लोग इस माहौल से तंग आ चुके हैं. सीएए और एनआरसी के साथ ही निर्भया रेप केस को भी भड़काऊ भाषणों में इस्तेमाल किया जा रहा है. निर्भया को इंसाफ़ नहीं मिल रहा, इसे लेकर जो भाषण दिए जा रहे हैं वो भी भड़काऊ हैं. ताकि आप में उत्तेजना भर जाए. दरअसल ऐसे लोग किसी की कमज़ोरी को भड़काने का ही काम कर रहे हैं. ये आप से चिपक गए हैं. उन्हें मालूम है कि वार कब और कहां करना है. ये उन लोगों को निशाना बनाते हैं जो भावनात्मक रूप से कमज़ोर होते हैं और जल्द ही किसी की बातों में आ जाते हैं. कुछ लोग सनकी भी होते हैं. जैसे एकतरफ़ा प्यार. उनके अंदर ऐसा जुनून होता है जो उन्हें हिंसा के लिए उकसाता है.''

वो कहती हैं, ''इसके लिए कौन से लोग ज़िम्मेदार हैं? ख़ास वर्ग है, राजनीतिक दल हैं. अभी जो सोच है वो यह बनाई जा रही है कि भारत हिंदू राष्ट्र होगा. सीएए आया, एनआरसी की बातें हो रही हैं, इसे पहले अध्यादेश के तौर पर क्यों नहीं लाया गया, यह सब एक चाल हो सकती है. लेकिन सोचना यह होगा कि भड़काऊ बातें होती हैं तो इसके पीछे फ़ायदा किसको होगा.''

अनुजा कपूर का मानना है कि बलि का बकरा उन्हीं को बनाया जाता है जो भावनात्मक तौर पर अस्थिर हैं. जिनके पास काम नहीं है. आप पहले उनसे काम छीन लीजिए. ग़रीबी रेखा से नीचे ले आइए. मजबूर कर दीजिए कि वो आपकी तरफ़ खड़ा हो जाए. लोग किसी की ग़रीबी और बेरोज़गारी का फ़ायदा उठाकर उन्हें उकसाते हैं. देश की आर्थिक हालत सब को पता है. लोगों की नौकरियां चली गई हैं. वो परेशान हैं. कोई उनकी परेशानी नहीं सोच रहा, लोग उनकी परेशानी का फ़ायदा उठाने की सोचते हैं. राजनीतिक दल लोगों के बीच वो हालात पैदा कर रहे हैं जिससे लोग ख़ुद को कमज़ोर और लाचार समझने लगें.

क्या यह आइडेंटिटी क्राइसिस है?

अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि इन वारदातों को अंजाम देने वाले लोग अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं. उनके सामने अपने आप को सबके सामने लाने की ललक होती है, अगर उनके पास रोज़गार नहीं है, सही पढ़ाई लिखाई नहीं है, पारिवारिक स्थिति बेहतर नहीं है तो वो किसी ना किसी तरह से ऐसी घटनाओं के लिए ख़ुद को तैयार करते हैं. उन्हें यह लगने लगता है कि उनकी समस्याओं की असली जड़ वही लोग हैं जो सरकार की बातों के ख़िलाफ़ हैं, या किसी एक विचारधारा के ख़िलाफ़ हैं.

समाजशास्त्री हेमलता श्रीवास्तव कहती हैं, ''किसी भी राजनीतिक रैली में जुटने वाली भीड़ एक अलग मानसिकता लेकर आती है. हर नेता चाहता है कि उसके भाषण में तालियां बजें और तालियां बजाने के लिए जनता को उकसाना बहुत ज़रूरी होता है. ग़लत और सही का आंकलन आप नैतिकता के आधार पर करेंगे. दोनों तरफ़ के लोगों की बातों को सुनना होगा और बराबर समझना होता. केंद्रीय मंत्री हों, मुख्यमंत्री हों या फिर किसी पार्टी के मुखिया या सांसद भड़काऊ बातें करते हैं तो लोगों पर उनका असर हो रहा है.''

वो कहती हैं, ''शाहीन बाग़ को देखें तो वहां विरोध प्रदर्शन में आने वाले बच्चों से जिस तरह के नारे लगवाए जा रहे हैं, वो ग़लत हैं. उन्हें उन नारों का मतलब नहीं मालूम होगा, यानी उनके दिमाग़ में चीज़ें भरी जा रही हैं. गोली मारने की भावना पूरी तरह मनोवैज्ञानिक नहीं है. किसी तरह का मनोवैज्ञानिक विचार दो से तीन मिनट रहता है. ऐसी घटनाएं क्षणिक आवेश में होती हैं. आप देखिए जब युद्ध की स्थिति बनती है तो पूरा देश एकजुट होता है और युद्ध समाप्त होते ही जाति संप्रदाय की बातें होने लगती हैं.''

अनुजा कपूर इन घटनाओं को सोची समझी साज़िश बताती हैं. उनका मानना है कि राजनीति से प्रेरित यह घटनाएं एक रात में नहीं हो रहीं, ये सब योजनाबद्ध तरीक़े से हो रहा है. इसके ख़िलाफ़ लड़ने की ज़रूरत है. बातों का असर सब पर नहीं होता. किसान आत्महत्या की ही बात कर लीजिए. पूरा झुंड नहीं है. ये चंद लोग होते हैं जो परेशान होते हैं, हिंसा से गुज़र रहे होते हैं, घरों में आइडेंटिटी क्राइसिस से गुज़र रहे होते हैं, उनकी तमाम मुश्किलें होती हैं, ऐसे ही लोगों को बहकाना आसान है कि आप बंदूक़ उठाएं और जिस किसी की वजह से यह हो रहा है उसे ख़त्म कर दो. सब सुख ढूंढ रहे हैं. उन्हें ये अहसास कराया जाता है कि इसी में सुख है तो वो बंदूक़ उठा ही लेंगे.

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