मोदी सरकार के 36 मंत्रियों के दौरे पर क्या कह रहे हैं जम्मू-कश्मीर के लोग

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत सरकार में शामिल 36 मंत्रियों का जम्मू-कश्मीर दौरा शनिवार से शुरू हो चुका है.
सात दिनों तक विभिन्न कार्यक्रमों के ज़रिए मंत्रियों का यह दल आम कश्मीरियों को अनुच्छेद 370 को ख़त्म किए जाने से होने वाले संभावित फ़ायदों के बारे में जानकारी देने के मिशन में जुटा है. इस दौरान यह समूह जम्मू-कश्मीर में कुछ विकास संबंधी परियोजनाओं का उद्घाटन भी करेगा. यह सिलसिला 24 जनवरी तक चलेगा.

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मंत्रियों का पहला समूह यहां शनिवार को पहुंचा है. बीते साल, पाँच अगस्त को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा निरस्त किए जाने के बाद यह पहला मौक़ा है जब नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्री जम्मू-कश्मीर के दौरे पर पहुंचे हैं.
केंद्र सरकार के मंत्रियों का यह दल उस वक़्त जम्मू-कश्मीर का दौरा कर रहा है जब जम्मू-कश्मीर के तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्री, फ़ारुक़ अब्दुल्लाह, उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़्ती हिरासत में हैं.
कश्मीर घाटी में इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी लगी हुई है. बीते शनिवार को ही केंद्र सरकार ने कश्मीर के दो ज़िलों- कुपवाड़ा और बांदीपुरा में 2जी मोबाइल इंटरनेट सर्विस को बहाल करने की घोषणा की है, इसके अलावा पूरे कश्मीर घाटी में प्री-पेड मोबाइल सेवाओं को भी बहाल करने का एलान किया गया.

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बीते साल पाँच अगस्त को भारत सरकार ने जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने का फ़ैसला लिया था. इसके बाद तीन महीने से भी ज़्यादा समय तक कश्मीर घाटी में कर्फ़्यू, पाबंदी और सबकुछ बंद होने जैसी स्थिति बनी रही.
पाँच अगस्त से, कश्मीर घाटी में कम्यूनिकेशन के लिए ज़रूरी सभी चैनलों पर पाबंदी लगा दी गई थी.
बहरहाल, इन 36 मंत्रियों में 31 मंत्री जम्मू का दौरा करेंगे जबकि पाँच मंत्री 24 जनवरी तक कश्मीर का दौरा भी करेंगे.
वैसे कश्मीर के आम लोगों को मंत्रियों के इस दौरे से कोई ख़ास उम्मीद नहीं है.

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दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले के शाबिर अहमद बताते हैं कि मंत्रियों का दल उस वक़्त दौरा कर रहा है जब आम कश्मीरी अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने से ग़ुस्से में है, ऐसे में इनका कार्यक्रम उन्हें कहां से संतुष्ट कर पाएगा?
शाबिर अहमद कहते हैं, "यहां के आम लोगों और भारत सरकार के बीच गहरी खाई है. ऐसे में देखना होगा कि ये संपर्क अभियान-कश्मीर के आम लोगों को कितना संतुष्ट कर पाता है? इस खाई को भरने में लंबा वक़्त लगेगा. भविष्य में क्या होगा, यह अभी नहीं कह सकते. अगर कश्मीरी लोग इन कार्यक्रमों से संतुष्ट होते भी हैं तो भी हम परिणाम नहीं जानते. परिणाम पॉज़िटिव भी हो सकते और निगेटिव भी. कश्मीरी लोगों में बेचैनी, असंतोष और नाराज़गी का भाव है."
केंद्र सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि कश्मीरी लोगों को केंद्र सरकार प्रायोजित योजनाओं के बारे में लोगों को बताना ज़रूरी है, इस पहलू पर शाबिर कहते हैं, "मेरे ख्याल से सभी योजनाएं लागू की जाएंगी. इस यात्रा का उद्देश्य भी यहां के लोगों के बीच ऐसा असर छोड़ना है कि यहां कि पिछली राज्य सरकारें कश्मीरी लोगों पर बोझ थीं, स्वार्थी सरकारें थीं और उनके अपने अपने हित थे."
"जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार के 36 मंत्रियों का आना कोई सामान्य बात नहीं है. हालांकि यह भी देखना होगा कि उनके इस क़दम का यहां के आम कश्मीरियों पर कितना असर होता है, अंतरराष्ट्रीय जगत पर क्या प्रभाव पड़ता है. यह तब किया जा रहा है जब आम कश्मीरी अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने से आहत है. हालांकि सरकार के इस क़दम से यह तो तय है कि विकास के मोर्चे पर पॉजिटिव रिज़ल्ट मिलेंगे."

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विदेशी मीडिया के लिए किया जा रहा पब्लिसिटी स्टंट
हालांकि श्रीनगर के इंजीनियरिंग छात्र फ़ुरक़ान सैयद के मुताबिक़ मंत्रियों का यह दौरा दिखावटी है. फ़ुरक़ान कहते हैं, "मंत्रियों का समूह अनुच्छेद 370 के निरस्त किए जाने के छह महीने के बाद यहां आया है. जब अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया था तब वे नहीं आ सकते थे? ऐसा दौरा 15 दिन या एक महीने बाद भी हो सकता था. अब छह महीने बीत गए हैं, तब ये लोग आ रहे हैं. अब वे लोग जगे हैं और यहां के लोगों को जगाना चाहते हैं?"
फ़ुरक़ान सैय्यद यह भी कहते हैं, "मुझे लगता है कि जब अनुच्छेद 370 निरस्त किया गया था तब वे यहां आने के साहस नहीं दिखा पाए. अब वे अपनी यात्रा से केवल यह दिखाना चाहते हैं कि उन्हें कश्मीरी लोगों से लगाव है, जो कि है नहीं. उन्हें अपने लोगों से लगाव नहीं है. यह विदेशी मीडिया के लिए किया जा रहा पब्लिसिटी स्टंट है. उन लोगों को दिखाने के लिए भी हो रहा है जो चीज़ों को नहीं समझते. मुझे नहीं लगता है कि इससे कोई जागरूकता फैलेगी. बीते छह महीनों से इंटरनेट बंद है. प्री पेड मोबाइल सर्विस को बहाल हुए एक-दो दिन हुए हैं. हम क्या उम्मीद कर सकते हैं?"
केंद्र सरकार की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर के स्थानीय लोगों को मिलने वाले फ़ायदों के बारे में उन्हें जागरूक करना ज़रूरी है. इस पहलू के बारे में पूछे जाने पर फ़ुरक़ान कहते हैं, "अनुच्छेद 370 को हटाए जाने से पहले सरकार ने यहां के लोगों को बताया तक नहीं कि अनुच्छेद 370 हटाया जा रहा है. वे यहां आए पर्यटकों और यात्रियों से निकलने के लिए कहते रहे. लेकिन लोगों को कभी नहीं कहा कि अनुच्छेद 370 को निरस्त किया जा रहा है."
"अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद घाटी में भारी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया गया. स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद सरकार डर गई. उन्हें मालूम था कि लोगों में ज़बर्दस्त प्रतिक्रिया होगी. वे जानते थे कि इसको हटाने से कश्मीर के लोगों पर निगेटिव असर होगा. अब वे लोगों को किस तरह के फ़ायदों के बारे में बताएंगे?"
आम लोगों से मिलें ना की चुने हुए लोगों से
वहीं पीएचडी कर रहीं एक छात्रा ताबिश ख़ान के मुताबिक़ इन मंत्रियों को आम लोगों से मिलना चाहिए ना कि बंद दरवाज़ों के अंदर कार्यक्रम करने चाहिए.
ताबिश बताती हैं, "दौरा करने वाले मंत्रियों को आम लोगों से मिलना चाहिए. अगर वे हम जैसे लोगों से मिलते हैं तब तो यात्रा और जागरूकता कार्यक्रम को पॉजिटिव कहा जाएगा. जब वे हम लोगों तक पुहंचेंगे तब हम लोग बता सकते हैं कि क्या कुछ किया जाना चाहिए. अगर वे हमारे सवालों के जवाब देते हैं तो उनकी यात्रा पॉजिटिव हो सकती है."
पहलगाम के स्थानीय निवासी जावेद अहमद बताते हैं कि अगर सरकार विकास को लेकर वाक़ई गंभीर है तो यह अच्छी बात है.
जावेद अहमद बताते हैं, "भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करते वक़्त कहा था कि इससे स्थानीय लोगों को फ़ायदा होगा. अब अगर सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों का विकास करने के लिए गंभीर है तो यह क़दम ठीक है. लेकिन अगर केवल राजनीतिक फ़ायदे के लिए यह किया जा रहा है तो यह ठीक क़दम नहीं है."
मंत्रियों का यह दौरा कामयाब होगा या फिर नाकाम साबित होगा, इस मुद्दे पर कश्मीर पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि इस वक़्त कुछ भी नहीं कहा जा सकता.
परिणाम पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हारून रेशी कहते हैं, "इस अभियान की कामयाबी या नाकामी पर फ़िलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता. यह वक़्त ही बताएगा कि यह दौरा कामयाब रहा या नहीं. हमें देखना होगा कि यह समूह इंटरनेट बहाली, स्थानीय नेताओं की रिहाई, कश्मीरी लोगों के आर्थिक नुक़सान जैसी मौजूदा समस्याओं पर क्या भूमिका निभाते हैं. तब हम कह सकते हैं कि वे लोगों को सलाह देने आए थे या फिर सीख देने आए थे."
मंत्रियों के दौरे और उनके कार्यक्रमों से क्या स्थानीय लोगों की नाराज़गी कम होगी, पूछे जाने पर रेशी कहते हैं, "हमें इसके जवाब के लिए इंतज़ार करना होगा. हो सकता है कि अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के पक्ष में इन मंत्रियों के पास दमदार तर्क हों. लेकिन वास्तविकता तो यही है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त किए जाने से स्थानीय लोगों में नाराज़गी है. उनकी नाराज़गी दूर करने की दिशा में कुछ नहीं किया गया है."
हारून रेशी के मुताबिक़, "लोगों में आक्रोश बना हुआ है और लोग इसे ज़ाहिर करेंगे. मंत्रियों का समूह किसी राजनीतिक दल से नहीं मिल रहा है, ऐसे में आप किसी राजनीतिक दल से यह नहीं पूछ पाएंगे कि मंत्रियों से मुलाक़ात से आप संतुष्ट हुए कि नहीं? मंत्रियों से मुलाक़ात के बाद लोग संतुष्ट हैं कि नहीं इसको आंकने का मापदंड क्या होगा? मंत्रियों का समूह तो आम लोगों से मिलेगा, लेकिन यह कौन बताएगा कि आम लोग संतुष्ट हुए कि नहीं?"















