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पहले सीडीएस जनरल रावत और उनके विवादित बयान
जनरल बिपिन रावत ने एक जनवरी 2020 को चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेन्स स्टाफ़ (सीडीएस) का पदभार संभाल लिया. वो अब जल, थल और वायु तीनों सेनाओं के बीच समन्वय का काम करेंगे. हालांकि उनकी इस नियुक्ति पर कई राजनीतिक पार्टियां नाराज़ हैं.
पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल रावत ने कई राजनीतिक बयान दिए हैं. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने उन्हें सीडीएस बनाए जाने को ग़लत फ़ैसला बताया है. कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी. राजा ने कहा है कि मौजूदा सरकार ने उन्हें पुरस्कार दिया है.
हालांकि, जनरल रावत ने कहा है कि देश के सैन्य बल 'राजनीति से बहुत दूर रहते हैं' और सत्तारुढ़ सरकार के निर्देशों पर काम करते हैं.
उन्होंने कहा, "मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि थल सेना, नौसेना और वायुसेना सब एक टीम की तरह काम करेंगे. सीडीएस का उन पर एक नियंत्रण होगा लेकिन कोई भी कार्रवाई टीमवर्क के साथ की जाएगी."
साथ ही रावत ने कहा कि 1+1+1 को सिर्फ़ 3 नहीं होना चाहिए बल्कि इसे 5 या 6 होना चाहिए, इसको कुल जमा से अधिक होना चाहिए और इस पर वो काम करेंगे.
जनरल रावत बयानों को लेकर रहे चर्चा में
थल सेना प्रमुख रहते हुए जनरल बिपिन रावत के कई बयान ख़ासे चर्चा में रहे.
हाल ही में जनरल बिपिन रावत के जिस बयान को लेकर चर्चा छिड़ी वो था नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ उनका बयान. उन्होंने कहा था कि इस क़ानून का देश के कई हिस्सों में विरोध हो रहा है और कई इलाक़ों में विरोध के दौरान हिंसा हुई है.
जनरल रावत ने कहा था, "जैसा कि हम देख रहे हैं कि कई विश्वविद्यालय और कॉलेज के छात्र हाज़ारों की संख्या में भीड़ का नेतृत्व कर रहे हैं जो हमारे शहरों में हिंसा और आगजनी कर रहे हैं. ये नेतृत्व नहीं है. नेता वो होता है जो आपकी सही दिशा में ले जाता है और सही सलाह देता है."
हालांकि उनके बयान का विरोध होने पर उन्हें कहना पड़ा कि "सेना राजनीति से दूर रहती है. सेना का काम है, जो सरकार है उनके आदेश के अनुसार काम करना."
लेकिन ये पहली बार नहीं था कि जनरल बिपिन रावत ने राजनीतिक बयान दिया हो. इससे पहले आर्मी प्रमुख रहते हुए भी उन्होंने कई ऐसे बयान दिए थे.
2019 के सितंबर में कश्मीर को लेकर उन्होंने कहा था कि कश्मीर में संचार व्यवस्था दुरुस्त हैं. सभी टेलीफ़ोन लाइनें काम कर रही हैं और लोगों को कोई परेशानी नहीं है.
उन्होंने कहा था, "जम्मू कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद से वहां इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर पाबंदी लगा दी गई थी. यहां चरणबद्ध तरीके से इंटरनेट पर पाबंदी हटाई जा रही है. बीते कल ही वहां मोबाइल एसएमएस सेवाएं बहाल की गई हैं."
2018 जून में कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन की संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था, "मुझे नहीं लगता कि हमें इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेना चाहिए. इनमें से कई रिपोर्ट दुर्भावना से प्रेरित होती हैं. मानवाधिकारों को लेकर भारतीय सेना का रिकॉर्ड काफ़ी बेहतर है."
अवैध प्रवासियों पर भी बोले
2018 फ़रवरी में उन्होंने असम में अवैध प्रवासियों का मुद्दा उठाया और बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ़ के लिए कहा, "एआईयूडीएफ़ नाम से एक पार्टी है. आप देखें तो बीजेपी के मुक़ाबले इस पार्टी ने बड़ी तेज़ी से तरक्की की है. अगर हम जनसंघ की बात करें जब उसके मात्र दो सांसद थे और अब वो जहां है, असम में एआईयूडीएफ़ की तरक्की इससे अधिक है."
उनके इस बयान की कई हलकों में आलोचना हुई.
इससे पहले जनरल बिपिन रावत ने सेनाधिकारी लितुल गोगोई का बचाव किया था जिन पर कश्मीर में तैनाती के दौरान एक व्यक्ति को जीप से बांधकर घुमाने का आरोप था. ये तस्वीरें सामने आने पर सोशल मीडिया में इसकी काफ़ी आलोचना हुई थी.
बीएसएफ़ के एक जवान तेज बहादुर यादव ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालकर सैनिकों को ख़राब खाना दिए जाने की शिकायत की थी. इसके बाद जनरल रावत ने कहा था कि जवानों को सोशल मीडिया के इस्तेमान से बचना चाहिए और सीधे मुझसे बात करनी चाहिए.
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