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आर्मी चीफ़ जनरल बिपिन रावत का बयान क्या सेना के नियमों का उल्लंघन है?
भारत के सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने दिल्ली में गुरुवार को एक कार्यक्रम में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शन को लेकर कुछ ऐसा कहा जिसकी विभिन्न राजनीतिक दल आलोचना कर रहे हैं.
जनरल रावत ने कहा, "नेता को नेतृत्व से ही जाना जाता है. अगर आप प्रगति के रास्ते पर ले जाते हैं तो आपके पीछे हर कोई हो जाता है. नेता वही है जो लोगों को सही दिशा में ले जाता है. नेता वो नहीं होता जो अनुचित दिशा में ले जाए. हम देख रहे हैं कि कॉलेज और यूनिर्सिटी में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं उनमें हिंसा और आगज़नी हो रही है. यह कोई नेतृत्व नहीं है."
जनरल रावत के इस बयान को 'राजनीतिक' और 'सैन्य अधिकारी के लिए अनुचित' माना जा रहा है. सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने इसकी निंदा करते हुए ट्विटर पर चिंता जताई कि 'कहीं हम सेना के राजनीतिकरण तो नहीं कर रहे' और 'पाकिस्तान के रास्ते पर तो नहीं चल रहे.'
वहीं एआईएमआईएम के प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि जनरल रावत अपने बयान से सरकार को कमज़ोर कर रहे हैं.
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या जनरल रावत का यह बयान राजनीतिक था और क्या ऐसा करके उन्होंने सेना के नियमों का उल्लंघन किया है?
इन सवालों को लेकर बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने बात की रक्षा मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ला से. आगे पढ़ें उनका नज़रिया:
'जनरल ने किया सेना के नियमों का उल्लंघन'
सेना के तौर-तरीकों, नियमों और क़ानून के अनुसार; आर्मी रूल बुक के आर्मी रूल 21 में साफ़ लिखा गया है कि राजनीतिक सवालों के ऊपर कोई बयान सार्वजनिक तौर पर फ़ौज के किसी भी सदस्य की ओर से नहीं आएगा.
बयान देने के लिए केंद्र सरकार की इजाज़त बहुत ज़रूरी है और नियम में लिखा है कि बिना इजाज़त कोई भी फ़ौजी या अधिकारी राजनीतिक मामलों पर बात नहीं कर सकता है. जनरल बिपिन रावत ने इसी नियम के ख़िलाफ़ यह बात की है.
उन्होंने राजनीतिक सवाल पर बात की है जो इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं. इस मामले पर बोलना आर्मी चीफ़ के लिए सही है या ग़लत, इस पर लोगों की राय अलग हो सकती है.
मगर सेना के नियमों के अनुसार, ख़ासकर रूस 21 के अनुसार यह बयान सही नहीं है. सेना प्रमुख ने सेना के इस नियम से परे हटकर बयान दिया है.
'सामान्य नागरिक नहीं हैं जनरल रावत'
सेना के हर जूनियर जवान से लेकर आर्मी चीफ़ तक के मौलिक अधिकारों को आर्मी रूल 19 के तहत सीमित किया गया है.
यानी संविधान के तहत आम नागरिक को अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता मिलती है, आर्मी रूल 19 के तहत उसे सेना से जुड़े लोगों के लिए कम किया गया है.
यह कोई नई बात नहीं है, आर्मी के हर शख़्स को पता है और उन्हें यह बात बताई जाती है. साथ ही हर साल दोहराई भी जाती है.
तो यह नहीं कहा जा सकता कि आर्मी चीफ़ एक नागरिक हैं और उन्हें नागरिक होने के नाते बयान देने का मौक़ा क्यों नहीं दिया जाता.
अगर ऐसा सवाल किया जाता है तो उसका जवाब यह है कि आर्मी चीफ़ एक आम नागरिक नहीं हैं, वह सेना के सदस्य हैं और आर्मी के रूल 19 के तहत उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं है.
'राजनीतिक सवालों से दूर रहना चाहिए'
भारत बहुत नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है. सेना एक स्थिरता का संस्थान है. देश का आख़िरी विकल्प कहा जाता है सेना को.
यानी जब कुछ और रास्ता नहीं देख के पास तो उसकी आर्मी होती है. जब आर्मी ही राजनीतिक सवालों पर जवाब देना शुरू करती है तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं.
यह मेरे विचार से अच्छी बात नहीं है. सेना को राजनीतिक सवालों को दूर रहना चाहिए और आर्मी चीफ़ को भी.
शायद जनरल रावत यह सोच रहे होंगे कि मैं हेल्थ समिट में बोल रहा हूं, राजनीतिक सवाल पर नहीं बोल रहा. मगर वह पीछे हटकर देखें तो उन्हें समझ आएगा कि यह पूरी तरह राजनीतिक सवाल था, जिसके ऊपर उन्होंने बयान दिया और ऐसा करना सही नहीं था.
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