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CAA पर क्या बीजेपी सरकार का सही बचाव कर पाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?
- Author, प्रशांत चाहल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के नागरिकता क़ानून में हुए हालिया संशोधन के ख़िलाफ़ पूरे देश में चल रहे प्रदर्शनों के बीच रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली की.
दिल्ली बीजेपी की इस रैली को दिल्ली के विधानसभा चुनाव का बिगुल बजाने के तौर पर देखा जा रहा था.
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में सारा ज़ोर इस बात पर दिया कि उनकी सरकार ने नागरिकता क़ानून में जो बदलाव किया है, वो सही है.
साथ ही उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और उनकी सरकार की नीयत पर सवाल उठाकर विपक्ष चालें चल रहा है, लोग इसके बहकावे में ना आएं.
एक बेहद लंबे और आक्रामक भाषण के बीच पीएम मोदी ने कहा कि देश का पढ़ा लिखा नौजवान जब उनकी बातें सुनेगा, तो वो सीएए को लेकर फैलाई गईं अफ़वाहों के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाएगा.
पर प्रधानमंत्री का ये दावा कितना सही है? और उन्होंने नए नागरिकता क़ानून के बचाव में जो दलीलें दीं, उनमें कितना दम है? यह समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनीस और प्रदीप सिंह से बात की.
'सरकार एक क़दम पीछे हटी'
- अदिति फडनीस
ये शायद उनका सबसे लंबा सार्वजनिक भाषण था जिसमें झूठ शब्द का इस्तेमाल उन्होंने जितनी बार किया, वो शायद ही पहले कभी किया होगा.
बार-बार वो यह कह रहे थे कि सीएए के ख़िलाफ़ मिथक और झूठ फ़ैलाए जा रहे हैं जिसके लिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार पर दोष मढ़ा. उन्होंने कांग्रेस पार्टी के नेताओं के नाम भी लिए.
लेकिन सच तो ये है कि इन प्रदर्शनों में कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार का हाथ उस तरह से नहीं दिखता है, जितना कि ये लोगों के स्वत:स्फूर्त सड़कों पर आने का मामला है.
रही बात अपने भाषण के ज़रिए लोगों तक संदेश पहुँचाने की, तो लोग उन्हें सुनने के बाद बैठकर सोचेंगे तो ज़रूर. इस वजह से इन प्रदर्शनों पर कुछ समय के लिए रोक लग भी सकती है.
लेकिन यह भाषण उल्टा भी पड़ सकता है क्योंकि लोग उनकी बातों को तौल कर देखेंगे और पता लगाने की कोशिश करेंगे कि उनकी बातें कितनी सच्ची हैं.
प्रधानमंत्री की ये बात सही है कि ये नया क़ानून बाहर से आए शरणार्थियों के लिए है और इसका भारतीय नागरिकों से कोई वास्ता नहीं है.
लेकिन इसी के साथ उनका ये कहना कि जो बिना बताए भारत में रह रहे हैं, वो घुसपैठिए हैं, तो इससे हलचल पैदा होती है. क्योंकि भारत में तो वर्षों से शरणार्थी आते रहे हैं. बहुत से समुदाय हैं जिनकी एक पीढ़ी यहीं जवान हुई है. तो पीएम का ये भाषण उन्हें कितना आश्वस्त कर पाया, यह समय बताएगा.
एक बड़ी चीज़ उनके भाषण से निकलकर आई वो ये कि उन्होंने साफ़ कहा कि देशव्यापी एनआरसी का अभी कोई भविष्य नहीं है.
मुझे लगता है कि यहाँ सरकार एक क़दम पीछे हटी है जिसे इन प्रदर्शनों का हासिल कहा जा सकता है.
उनकी टीम के लोगों ने उन्हें ज़रूर समझाया होगा कि जो परेशानी दिल्ली, यूपी और कर्नाटक में सरकार को बीते कुछ दिनों में झेलनी पड़ी है, वो अन्य जगहों पर ना झेलनी पड़े, इसलिए एनआरसी पर एक क़दम पीछे लेने में कोई बुराई नहीं होगी.
ये सच है कि जैसे-जैसे ये प्रदर्शन बढ़े, तो लोगों में सीएए से ज़्यादा संशय और भय एनआरसी को लेकर पैदा हुआ.
लोग पूछ रहे थे कि एनआरसी का फ़ॉर्म कैसा होगा, क्या-क्या क़ागज़ लगेंगे, कैसे ख़ुद को नागरिक साबित करेंगे? तो कई सवाल थे जिनपर फ़िलहाल लोग थोड़े शांत होंगे.
लेकिन अभी भी सरकार को लोगों के मन में बने भय को कम करने के लिए कुछ क़दम उठाने की ज़रूरत है.
'प्रदर्शनकारियों को जवाब मिले होंगे'
- प्रदीप सिंह
भारतीय नागरिकता से संबंधित नया क़ानून बनने के कुछ बाद से यह बात शुरू हुई कि इसे एनआरसी से जोड़कर देखा जाना चाहिए.
विरोध के दो आधार बताए गए कि ये क़ानून संवैधानिक भावना के विपरीत है और धार्मिक आधार पर लोगों में भेदभाव करता है.
इन दोनों मुद्दों पर पीएम मोदी ने रविवार को अपने भाषण के ज़रिए ग़लतफ़हमियाँ दूर करने की भरपूर कोशिश की.
उन्होंने दो बातें कहीं. एक तो यह कि नया क़ानून नागरिकता छीनने का नहीं, देने का है.
दूसरी बात यह कि एनआरसी का अभी कोई प्रारूप नहीं बना, सरकार ने इसपर कोई चर्चा नहीं की, एनआरसी आएगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है.
हालांकि गृह मंत्री अमित शाह ने दोनों सदनों में यह कहा कि एनआरसी आएगा. पर डेडलाइन उन्होंने भी कोई नहीं दी थी.
तो एनआरसी के इर्द-गिर्द जो इतनी सारी ग़लतफ़हमियाँ हैं और उग्र प्रतिक्रियाएं हैं, वो असम की एनआरसी की वजह से हैं जिसे असम अकॉर्ड के तहत किया गया.
असम के आंदोलनकारी सुप्रीम कोर्ट गए तो कोर्ट के आदेश पर सूबे में एनआरसी हुई और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही 2018 में इसका काम पूरा हुआ.
वहाँ कटऑफ़ डेट 1971 रखी गई थी. लेकिन उस एनआरसी को भी दोषपूर्ण माना गया जिसे राज्य और केंद्र सरकार, दोनों ने ख़ारिज किया.
तो एनआरसी का जब तक कोई अंतिम प्रारूप नहीं आता, उसका विरोध या समर्थन करने का कोई आधार नहीं है.
यह किसी से छिपा नहीं है कि नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ जो माहौल बनाया गया है, उसके केंद्र में यह बात है कि ये क़ानून भारत के मुसलमानों के ख़िलाफ़ है.
तो पीएम ने कहा है कि भारत की मिट्टी के जो मुसलमान हैं, उनकी नागरिकता और अधिकारों पर कोई आंच नहीं आने वाली है.
इसी पर ज़ोर देने के लिए उन्होंने कहा कि मेरे टेप रिकॉर्ड पर नहीं, ट्रैक रिकॉर्ड पर ध्यान दें.
यानी वो यह कह रहे थे कि प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान योजना या अन्य किसी केंद्रीय योजना से संबंधित कोई मामला सामने नहीं आया है जहाँ किसी मुसलमान ने यह शिक़ायत की हो कि धर्म के आधार पर उन्हें इन योजनाओं के लाभ से वंचित किया गया.
ऐसी कई और बातें भी उन्होंने अपने भाषण में कहीं ताकि मुसलमानों में जो चर्चा हो रही थीं कि क़ागज़ निकालो, जल्दी करो, नहीं तो ये होगा-वो होगा. ऐसे कई भ्रमों का उन्होंने जवाब देने की कोशिश की है.
पर प्रदर्शनकारी इससे संतुष्ट होंगे या नहीं, अब यह इसपर निर्भर करेगा कि क्या वो वाक़ई समझना चाहते हैं.
क्योंकि अगर उनके मन में वाक़ई कुछ आशंकाएं हैं, जायज़ सवाल हैं, तो उन्हें ज़रूर कुछ जवाब मिले होंगे.
और वैसे भी पीएम मोदी के भाषण का एक लाइन का निचोड़ कहें तो यह कहा जा सकता है कि भारत के मुसलमान हमारे हैं, लेकिन बांग्लादेश-पाकिस्तान के मुसलमानों को हम नहीं आने देंगे. इसीलिए उन्होंने कहा कि लोग घुसपैठिओं और शरणार्थियों में फ़र्क करें.
वैसे भी भारत सरकार यह स्पष्ट कर चुकी है कि अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के वो मुसलमान जो भारतीय नागरिक बनना चाहते हैं वो फ़ॉर्नर्स एक्ट के तहत आवेदन करें और भारत में आएं. बीते पाँच साल में पाकिस्तान के क़रीब 600 मुसलमानों को उनके केस के आधार पर नागरिकता दी गई है. अदनान समी उनमें से एक हैं.
अंतर सिर्फ़ ये है कि इन विदेशी मुसलमानों को नागरिकता क़ानून के तहत अन्य छह समुदायों की तरह थोक में एंट्री नहीं दी जा रही है.
इस क़ानून के ज़रिए वैसे भी भारत सरकार पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों से ये नहीं कह रही है कि आइए और भारत की नागरिकता लीजिए. ये क़ानून पहले से इन देशों से भारत में आए हुए विदेशी लोगों को नागरिकता देने की बात करता है तो भारतीय मुसलमानों को राजनीति के लिए उनकी नागरिकता का ख़तरा दिखाना ग़लत तो है.
पीएम और गृह मंत्री के अलग बयान
सोशल पर भी पीएम मोदी के भाषण की काफ़ी चर्चा रही.
एनआरसी के मुद्दे पर भारत के गृह मंत्री अमित शाह से अलग बयानी करने पर पीएम मोदी का मज़ाक बनाया गया और संसद की कार्यवाही समेत कुछ वीडियो इंटरव्यू पोस्ट कर लोगों ने यह याद दिलाने की कोशिश की कि बीजेपी और उनके सरकार में बड़े पदों पर बैठे लोग इस मुद्दे पर किस तरह की बयानबाज़ी करते रहे हैं.
पीएम के भाषण पर वरिष्ठ पत्रकार एम के वेणु ने लिखा, "रामलीला मैदान में थोड़े रक्षात्मक दिखे नरेंद्र मोदी ने भीड़ से कहा कि उनकी सरकार ने 2014 से अब तक एनआरसी पर कुछ नहीं किया. जो हुआ वो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुआ. तो क्या पूरे भारत में भाषणबाज़ी करते हुए भारतीय सुप्रीम कोर्ट घूम रहा था? असम के बाद पूरे देश में एनआरसी लाएंगे, यह बात किसने शुरू की? 22 अप्रैल 2019 को अपने भाषण में अमित शाह ने पूरे विस्तार से पार्टी के इरादे बताए थे. उन्होंने कहा था कि पहले हम नागरिकता संशोधन क़ानून लाएंगे और पड़ोसी मुल्कों से आए हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और ईसाई शरणार्थियों को नागरिक बनाएंगे. इसके बाद हम एनआरसी लागू करेंगे ताकि विदेशी घुसपैठियों को देश से साफ़ कर सकें. तो क्या पीएम मोदी अब अमित शाह के बयानों पर बड़ी चालाकी से पुताई कर रहे हैं. और भी तकलीफ़ देने वाली बात ये है कि वो सीएए को सही ठहराने के लिए महात्मा गांधी का नाम ले रहे हैं और पूर्व प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने रख रहे हैं. मनमोहन सिंह ने कभी नहीं कहा कि जब अन्य धर्मों के विदेशी शरणार्थियों को थोक में नागरिकता दी जाए तो मुसलमानों को इससे बाहर रखा जाए."
वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने लिखा है, "छोटी ही सही, लेकिन ये प्रदर्शनकारियों की जीत है क्योंकि मोदी को उन्होंने पीछे हटने को मजबूर किया. प्रदर्शनों से पहले एनआरसी पर पार्टी के ये बोल ना थे."
कई अन्य वरिष्ठ पत्रकारों ने पीएम मोदी की यह कहते हुए आलोचना की है कि अगर वो यह मान ही रहे हैं कि लोग भ्रम में फंसे होने के कारण सड़कों पर हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं तो उन्होंने असम और यूपी में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस फ़ायरिंग में मारे गए क़रीब दो दर्जन लोगों के लिए दो शब्द भी क्यों नहीं कहे, वो भी इस देश के नागरिक ही थे.
'देश में कोई डिटेंशन कैंप नहीं है?' पीएम मोदी के इस बयान पर भी लोग भड़के. उनके भाषण के बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर वो रिपोर्टें जमकर शेयर कीं जिनमें डिटेंशन कैंपों का ब्यौरा है.
स्वतंत्र पत्रकार रोहिणी मोहन ने लिखा है कि "डिटेंशन कैंपों का सच ये है कि देश में कुल 8 कैंप हैं. 6 असम में हैं. इनमें क़रीब हज़ार लोग हैं. नज़रबंद किए गए लोगों पर सुप्रीम कोर्ट में बीते एक वर्ष से सुनवाई चल रही है. असम में एक नया कैंप अभी बना है और एक कैंप कर्नाटक में है."
- बीबीसी की रिपोर्ट: असम डिटेंशन कैंप: मोदी का दावा कितना सही
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