झारखंड: माई-माटी की लड़ाई में टूट चुके हैं मधु मंसूरी

मधु मंसूरी
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, राँची

72 साल के मधु मंसूरी हँसमुख तारीख़ और दिन नहीं भूलते. वो वक़्त को ऐसे याद रखते हैं मानो उसे आगे नहीं बढ़ना चाहते. मधु मंसूरी को बस यह याद नहीं है कि उनका परिवार उराँव आदिवासी से मुसलमान कब बना लेकिन इतना याद है कि उनके पूर्वज उराँव आदिवासी थे.

मधु कहते हैं कि उनके बाप दादा अक्सर उराँव होने की यादें साझा करते थे और उसे बड़े गर्व के साथ कहते थे.

मंसूरी का मानना है कि झारखंड मूल के जो मुसलमान हैं उनमें उराँव, मुंडा, संथाली, होक, हड़िया, लोहरा और गड़ाइत हैं.

झारखंड के किसी भी जनवादी आंदोलन में 'गाँव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं, माई-माटी छोड़ब नाहीं' गाना नारे की तरह इस्तेमाल होता है.

झारखंड की नागपुरी बोली में इस गाने को लिखने और गाने वाले मधु मंसूरी हँसमुख ही हैं. उनसे पूछिए कि मधु जी आपने ये गाना कब लिखा और पहली बार कब गया तो वो तारीख़ और साल के साथ समय भी बता देंगे.

मधु झारखंड के जाने-माने लोकगायक हैं.

सम्मान
इमेज कैप्शन, मधु मंसूरी झारखंड रत्न से सम्मानित हैं

विनम्र कलाकार

मधु से मिलने जब मैं उनके गाँव सिमलिया पहुँचा तो उनकी पत्नी समिया उराँव ने कहा कि मधु नमाज़ पढ़ने मस्जिद गए हैं.

शाम के पाँच बज रहे थे. एक घंटे बाद मधु नमाज़ पढ़कर आए तो घर में घुसते ही बोले, ''जोहार-जोहार, आप लोगों को बहुत ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ा.''

मधु मंसूरी की विनम्रता बिल्कुल उनके नाम के मुताबिक़ है.

उनकी पत्नी से पूछा कि आपका नाम क्या है तो वो शरमा गईं. फिर उन्होंने मधु से पूछा कि क्या बताएं? मधु ने उन्हें कहा कि जो बाप-दादा ने रखा है वही बताओगी और क्या बताओगी.

फिर उनकी पत्नी ने बताया, ''समिया उराँव.''

मधु बताते हैं कि वो समिया उराँव को नाचने-गाने के दौरान ही दिल दे बैठे थे और तब से साथ में हैं. जब मधु ये बता रहे थे, समिया खिलखिला उठी थीं.

मधु और उनकी पत्नी समिया उरांव
इमेज कैप्शन, मधु और उनकी पत्नी समिया उरांव

'जंगल सरकारी बाबुओं के फ़र्नीचर में समाया'

मधु झारखंड आंदोलन में भी शामिल रहे. अब उन्हें लगता है कि बस लक़ीर खींच दी गई लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं हुआ.

जो व्यक्ति 'गाँव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं, माई-माटी छोड़ब नाहीं' गा रहा था वो क्या आज की तारीख़ में क्या गाँव और जंगल, माई-माटी के साथ है?

मानो मधु से मैंने कोई ग़लत सवाल पूछ दिया हो. इस सवाल को सुनते ही थम से गए. मानो उनके भीतर कुछ घटित होने लगा हो जो वर्षों से रुका था.

उनकी आँखें डबडबा जाती हैं और वो लंबी सांस छोड़ते हुए कहते हैं, "सब छूट गया बाबू. आदिवासियों के गाँव और जंगल में राँची का अशोक नगर और हरमू कॉलोनी बन गई. मैं जिस गाँव में हूँ उसे देखिए कितना गाँव बचा है."

वो बोलते गए, "जंगल सरकारी बाबुओं के घर के फ़र्नीचर में समा गया. हम इस देह के साथ बचे हुए हैं. बस अब देह छोड़कर जाना बाक़ी है. इस पर भी अपना अधिकार नहीं है. सच कहिए तो कोई अधिकार लड़कर नहीं ले पाया. मेरे गाने नारे बने, पोस्टर और बैनरों पर चिपके लेकिन सरकारों की ताक़त इन सब पर भारी पड़ी.''

सलीब पर यीशू
इमेज कैप्शन, जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं उन्हें आरक्षण मिलता है

'आदिवासी मुसलमानों की हालत बदतर'

मधु मंसूरी को मुसलमान होने के कारण आदिवासियों को मिलने वाला आरक्षण नहीं मिलता है. हालाँकि जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं उन्हें आरक्षण मिलता है. मधु का मानना है कि इसमें सरकार की कोई ग़लती नहीं है.

वो कहते हैं, "जिन आदिवासियों ने इस्लाम क़बूल किया वो आदिवासियत छोड़ना चाहिए. ईसाई बनने वाले आदिवासियों ने ऐसा नहीं किया. यह हमारे पूर्वजों की ग़लती थी. यही ग़लती हमारे घर वालों ने भी की. हम इस ग़लती को अब सुधार नहीं सकते. अगर ऐसा करने बैठेंगे तो पता नहीं क्या-क्या हो जाएगा. हम उस बात को लेकर चलेंगे तो भारी दंगा फ़साद होगा. इसलिए सब्र करना ही ज़्यादा ठीक है. हम अपने पूर्वजों की ग़लती की सज़ा भुगत रहे हैं."

मंसूरी कहते हैं कि जो आदिवासी मुसलमान बन गए उनकी हालत तो बदतर है लेकिन मज़हब के कारण वो आरक्षण का फ़ायदा नहीं उठा पा रहे हैं.

झारखंड में विधानसभा चुनाव चल रहा है. इन चुनावों से मधु बेख़बर नहीं हैं लेकिन उन्हें अब किसी से उम्मीद नहीं है.

वो कहते हैं, "वोट देना बस एक रवायत है, उसी को निभाए जा रहा हूँ. इस बार भी वही करूँगा. बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बने थे तो ठीक लगा था. लेकिन पता नहीं बीजेपी ने उनको क्यों निकाल दिया. मुझसे सभी मुख्यमंत्री मिले. फ़ोन कर हाल-चाल भी लेते हैं लेकिन उससे क्या होता है?''

आपने कभी मुख्यमंत्रियों से कहा नहीं कि जो वादे करके सत्ता में आए थे वो किए नहीं?

इसके जवाब में मंसूरी ने कहा, "नहीं, कभी नहीं कहा. लगता है कि कह भी देंगे तो क्या हो जाएगा. कुछ होने से रहा. रस्म अदायगी मुलाक़ात होती है और फिर वापस आ जाते हैं. जब इनसे मिलते हैं तो दूसरे विषय में ही उलझ जाते हैं. बाबूलाल मरांडी, हेमंत सोरेन और अर्जुन मुंडा से मुलाक़ात आज भी होती है.''

मधु मंसूरी
इमेज कैप्शन, अपने सम्मानों के साथ मधु मंसूरी

गीतों में जुल्म की दास्तां

मधु बताते हैं कि 10 दिसंबर 1960 को उन्होंने झारखंड आंदोलन का पहला गीत गया था लेकिन अब उन्हें लगता है कि सीमा रेखा खींचने के अलावा कुछ नहीं है. मधु बताते हैं कि तब उनकी उम्र तब 12 साल थी.

उन्होंने कहा, "आज़ादी की चादर ओढ़ने से भी शोषण का जाड़ा नहीं गया. कई बार तो लगता है कि बढ़ गया है."

मधु मंसूरी के गानों में विद्रोह और शोषण की दास्तां एक साथ है. वो कहते हैं कि झारखंड में इतनी दौलत है लेकिन पलायन थमने का नाम नहीं ले रहा.

वो कहते हैं, "जिनकी संपत्ति थी वो अपनी माई-माटी छोड़कर जा रहे हैं और बाहर वाले यहीं की संपत्ति का उपभोग कर रहे हैं. हमें केवल वोट देने का अधिकार मिला हुआ है और इसके अलावा तो कोई अधिकार नहीं मिला है. हम अधिकारों के लिए आंदोलन करते हैं तो लाठी मिलती है."

मधु बताते हैं कि 22 अगस्त 1967 को उन्हें राँची में मुसलमान होने के कारण फँसना पड़ा था.

वो डिटेल नहीं बताते हैं लेकिन कहते हैं, "हम क़ुरान भी कैसे पढ़ेंगे? हमें न तो उर्दू आती है और न ही फ़ारसी. आती नागपुरी है. जो इमाम कह देता है वही पढ़ लेता हूँ. इतना ही मुसलमान हूँ. 22 अगस्त 1967 को राँची में भारी दंगा हुआ था. मैं दो दिनों तक फँसा रहा. तब मेरी उम्र महज़ 16 साल थी.''

मधु की पत्नी समिया उराँव कहती हैं कि उनके पति ने पूरा जीवन शोषण और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लेखन और गायन में लगा दिया और उन्होंने घर को सँभालने में. मधु कहते हैं कि समिया ना होतीं तो वो इतना गा नहीं पाते.

मधु मंसूरी से पूछा कि उन्हें झारखंड में सबसे अच्छा सीएम कौन लगा? उनका जवाब था- बाबूलाल मरांडी.

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