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जामिया से लेकर जोरहाट तक नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन: प्रेस रिव्यू
दिल्ली से छपे अख़बारों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों को प्रमुखता से छापा है.
हिंदुस्तान लिखता है, "बवाल: असम का आक्रोश अन्य जगहों पर भी फैला".
दैनिक भास्कर की सुर्खी है, "नागरिकता के नए राज धर्म के आड़े आए सात राज्य, केंद्र बोला मानना होगा".
'दिल्ली तक पहुंची लपटें' के शीर्षक के साथ छपी तस्वीर के नीचे अख़बार लिखता है कि जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों पर पुलिस ने लाठीचार्ज के साथ आंसू गैस के गोले दागे. छात्रों ने भी पुलिस पर पथराव किया. अख़बार के अनुसार 12 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं.
नवभारत टाइम्स भी लिखता है, "नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ दिल्ली, वेस्ट यूपी, बंगाल, बिहार, और दक्षिण में तमिलनाडु तक प्रदर्शन". "जामिया से जोरहाट तक सड़कों पर विरोध. दिल्ली छात्रों और पुलिस के बीच भिड़ंत, कई घायल हुए".
मोदी-शिंज़ो की गुवाहाटी वार्ता टली
दी इंडियन एक्सप्रेस ने भी जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में नागरिकता कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों की तस्वीर को छापते हुए लिखा है "कैब की डिप्लोमेटिक गूँज , वाशिंगटन और ढाका ने जताई चिंता, जापान के प्रधान मंत्री ने भारत दौरा रद्द किया".
"मोदी-शिंज़ो की गुवाहाटी वार्ता टली. दोनों देश आपसी बातचीत से जल्द करेंगे नई तिथि की घोषणा" दैनिक जागरण की लीड ख़बर है.
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सबरीमला विस्फोटक मसला, धैर्य रखें महिलाएं : सुप्रीम कोर्ट
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह केरल सरकार को सबरीमला मंदिर में महिलाओं को बलपूर्वक प्रवेश कराने का निर्देश नहीं दे सकती.
सु्प्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की प्रवेश की अनुमति दे दी थी जिस पर अब सात सदस्यीय बेंच पुनर्विचार कर रही हैं.
अमर उजाला लिखता है, "विस्फोटक मसला, धैर्य रखें महिलाएं : सुप्रीम कोर्ट. सीजेआई बोबडे का महिलाओं के मंदिर में सुरक्षित प्रवेश पर आदेश देने से इंकार किया."
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21 जीवन रक्षक दवाओं के बढ़ेंगे दाम
दी इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर के मुताबिक 21 जीवन रक्षक दवाईयों के दाम आने वाले दिनों में बढ़ जाएंगे.
दवाओं की कीमत पर नज़र रखने वाली संस्था नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने इन दवाओं की कीमत बढ़ाने की अनुशंसा की है.
दिलचस्प यह है कि अथॉरिटी ने पहली बार दवाओं की कीमत बढ़ाने की अनुशंसा की है.
अथॉरिटी का कहना है कि कीमतें कम होने से ये मरीज़ों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाती और लोगों को कहीं ज्यादा महंगे विकल्प खरीदने पढ़ते हैं.
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