You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नागरिकता संशोधन विधेयक क्या 'आइडिया ऑफ़ इंडिया' के ख़िलाफ़ है?- नज़रिया
- Author, शेषाद्रि चारी
- पदनाम, बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य
इससे बड़ा असत्य कुछ और नहीं हो सकता है कि नागरिकता (संशोधन) बिल भारत के उस मूल विचार (आइडिया ऑफ़ इंडिया) के ख़िलाफ़ है, जिसकी बुनियाद हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने रखी थी.
नागिरकता (संशोधन) के जिस विधेयक को लोकसभा ने मंज़ूरी दी है, वो 1955 के नागरिकता क़ानून में बदलाव करने के लिए है.
1955 का क़ानून देश के दुखद बंटवारे और बड़ी तादाद में अलग-अलग धर्मों के मानने वालों के भारत से पाकिस्तान जाने और पाकिस्तान से भारत आने की भयावाह परिस्थिति में बनाया गया था.
जबकि उस समय नए बने दोनों देशों के बीच जनसंख्या की पूरी तरह से अदला-बदली नहीं हो सकी थी. उस समय भारत ने तो धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश बनने का फ़ैसला किया. लेकिन, पाकिस्तान ने 1956 में ख़ुद को इस्लामिक गणराज्य घोषित कर दिया था.
ख़ुद को इस्लामिक गणराज्य घोषित करने वाला पाकिस्तान संभवत: दुनिया का पहला देश था. पाकिस्तान ने इस ऐलान के साथ ही अपने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तमाम चेतावनियों को उठा कर बाहर फेंक दिया था. क्योंकि जिन्ना की 1948 में ही मौत हो गई थी.
धीरे-धीरे पाकिस्तान एक धार्मिक देश में तब्दील होता गया. इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान में रहने वाले ग़ैर मुस्लिम समुदायों, ख़ास तौर से हिंदुओं और ईसाइयों की मुसीबतें बढ़ने लगीं.
पाकिस्तान में ग़ैर मुस्लिम समुदायों पर ज़ुल्म बढ़े, तो वहां से इन समुदायों के लोगों का फिर से पलायन होने लगा.
इन समुदायों के लोगों ने भाग कर भारत में पनाह ली. इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान में ग़ैर मुस्लिम समुदायों की कुल आबादी में हिस्सेदारी घट कर दो फ़ीसदी से भी कम रह गई. कहा जाता है कि देश के बंटवारे के बाद क़रीब 47 लाख हिंदू और सिख पाकिस्तान से भाग कर भारत आए.
इन हालात में भारत के 1955 के नागरिकता क़ानून में बदलाव की ज़रूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी. ताकि उन लोगों की मांग पूरी की जा सके, जिन्होंने अपना घर-बार छोड़ कर भारत को अपने देश के तौर पर चुना था.
लेकिन वो बे-मुल्क के लोग थे. और, अपनी कोई ग़लती न होने के बावजूद यहां शरणार्थी की तरह रहने को मजबूर थे.
आइडिया ऑफ़ इंडिया
आइडिया ऑफ़ इंडिया दरअसल एक ऐसे देश की कल्पना है, जो धर्मनिरपेक्षता के विचार को न केवल शब्दों में बल्कि अपने व्यवहार में भी शामिल करता है और हर धर्म के लोगों को बिना किसी भेदभाव के स्वीकार करता है.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक लंबे समय से चली आ रही इसी ज़रूरत को पूरा करने वाला है. नागरिकता संशोधन बिल की सबसे अहम बात ये है कि ये पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आकर भारत में पनाह लेने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों, ईसाइयों और पारसियों को नागरिकता हासिल करने का मौक़ा देता है.
जबकि, मूल नागरिकता क़ानून के तहत किसी को भी भारत का नागरिक बनने के लिए लगातार 11 साल तक भारत में रहने की शर्त पूरी करनी होती है और इसमें से भी दरख़्वास्त देने के पहले के बारह महीने तक अबाध रूप से भारत में रहने की शर्त पूरी करनी होती है.
लेकिन सिटिज़नशिप अमेंडमेंट बिल, इन तीन देशों से आए छह धर्मों के शरणार्थियों के लिए नागरिकता हासिल करने के लिए 11 साल भारत में रहने की शर्त को घटा कर 6 साल करता है.
और आख़िर में, नागरिकता संशोधन विधेयक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में धार्मिक आधार पर होने वाले ज़ुल्म की मार्मिक हक़ीक़त को ध्यान में रखते हुए लोगों को राहत देने की कोशिश करता है.
धार्मिक आधार पर लोगों पर होने वाले ज़ुल्म एक तल्ख़ हक़ीक़त हैं. और ये धार्मिकता के बजाय अन्य वजहों से लोगों के दर बदर होने की मिसालों से अलग भी है.
इसी वजह से इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि नए नागरिकता क़ानून में रोहिंग्या मुसलमानों को भी भारत की नागरिकता देने का विकल्प होना चाहिए.
रोहिंग्या मुसलमानों को अपने देश म्यांमार की मौजूदा सरकार से शिकायत है. इसके नतीजे में वो कई बार अपनी सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत भी कर देते हैं.
और सरकार से संघर्ष का नतीजा ये होता है कि कई बार रोहिंग्या मुसलमानों को भाग कर पड़ोसी बांग्लादेश में भी पनाह लेनी पड़ती है.
बांग्लादेश और म्यांमार के बीच का ये द्विपक्षीय मसला भारत को भी अपनी चपेट में ले रहा है. इसीलिए इस मसले का हल बातचीत से निकाला जा सकता है. और म्यांमार से भाग कर आए रोहिंग्या मुसलमानों को वहां बसाया जा सकता है, जहां के वो मूल निवासी हैं.
तो, साफ़ है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक धार्मिक आधार पर होने वाले ज़ुल्म से बचने के लिए पलायन और राजनीतिक उठा-पटक की वजह से अपना देश छोड़ने को मजबूर हुए लोगों में फ़र्क़ करता है.
ये तर्क भी मज़बूत बुनियाद पर नहीं टिका हुआ है कि नागरिकता (संशोधन) का ये विधेयक लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम यानी एलटीटीई के आतंक की वजह से श्रीलंका छोड़ कर भारत के तमिलनाडु में शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों को कोई राहत नहीं देता है.
इन श्रीलंकाई तमिलों ने 2008-09 से पहले के कई दशकों के दौरान भारत में पनाह ली थी. फिर भी, बेहतर यही होगा कि सरकार नागरिकता (संशोधन) विधेयक की इन बारीकियों के बारे में आगे चल कर विस्तार से अपना पक्ष रखे.
इसी तरह नागरिकता (संशोधन) विधेयक के बारे में जो दुष्प्रचार किया जा रहा है कि ये मुस्लिम विरोधी है, इसके जवाब में सरकार को बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए.
इस विधेयक में उन करोड़ों मुसलमानों का कोई भी ज़िक्र नहीं है, जो भारत के नागरिक के तौर पर देश के बाक़ी नागरिकों की तरह अपने अधिकारों का बराबरी से उपयोग कर रहे हैं.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक के ख़िलाफ़ ये राजनीतिक दुष्प्रचार केवल वोट बैंक की राजनीति के लाभ के लिए किया जा रहा है, ताकि देश के माहौल को ख़राब किया जा सके. सरकार को चाहिए कि वो इस सांप्रदायिक असत्य का मज़बूती से फ़ौरन जवाब दे, वरना ये सांप्रदायिक तनाव में तब्दील हो सकता है.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक के ख़िलाफ़ एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि ये संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है. संविधान का ये अनुच्छेद सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है.
हक़ीक़त तो ये है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक की मदद से नागरिक बनने वाले सभी लोगों को भारत के दूसरे नागरिकों की तरह बराबरी का अधिकार मिलेगा, जो उन्हें अब तक नहीं मिल पा रहा है.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक ओवरसीज़ सिटिज़न्स ऑफ़ इंडिया यानी ओसीआई कार्डधारकों से जुड़े नियमों में भी बदलाव करेगा. 1955 के नागरिकता क़ानून के मुताबिक़ कोई भी शख़्स जो विदेश में रहता है वो अगर भारतीय मूल का है (मसलन पहले भारत का नागरिक रहा हो या फिर उसके पूर्वज भारत के नागरिक रहे हों, या उस के जीवनसाथी भारत के रहने वाले हों), तो वो अपना नाम ओसीआई के तहत दर्ज करा सकता है. इस वजह से उसे भारत में आने-जाने, काम करने और अध्ययन करने का अधिकार मिल जाएगा.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक स्पष्ट करता है कि इसके प्रावधान अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नगालैंड पर लागू नहीं होंगे.
क्योंकि ये राज्य इनर लाइन परमिट (ILP) के दायरे में आते हैं. साथ ही साथ नागरिकता (संशोधन) विधेयक, असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा के आदिवासी बहुल इलाक़ों (जिन्हें संविधान की 6 अनुसूची के तहत परिभाषित किया गया है) पर भी लागू नहीं होगा.
इनर लाइन परमिट, भारत के नागरिकों को कुछ ख़ास इलाक़ों में ज़मीन या संपत्ति ख़रीद कर बसने से रोकता है. इसकी वजह से वो वहां नौकरी भी नहीं कर सकते हैं. ऐसे में ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि इनर लाइन परमिट के ये प्रावधान भारत की नागरिकता हासिल करने वाले नए लोगों पर भी लागू होगा.
ताकि वो स्थानीय रहन-सहन को प्रभावित न कर सकें. यहां ये तर्क भी दिया जाता है कि इनर लाइन परमिट ब्रिटिश राज की विरासत है और, इस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है और इसमें बदलाव किए जाने की ज़रूरत है. ताकि, ये आज के दौर की आर्थिक ज़रूरतों और विकास के अवसर पाने की मांगों को पूरा कर सके.
इसीलिए, असम के ग़ैर-आदिवासी बहुल इलाक़ों पर नागरिकता (संशोधन) विधेयक के प्रावधान लागू होंगे. असम के ग़ैर-आदिवासी इलाक़ों की ये चिंता है कि इस क़ानून से उनके इलाक़े में रह रहे अवैध घुसपैठियों को फ़ायदा होगा.
इन घुसपैठियों में से ज़्यादातर बांग्लादेश से हैं. जिनके बारे में स्थानीय लोगों को डर है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक की मदद से इन घुसपैठियों को आधिकारिक रूप से उनके इलाक़ों मे बसने का मौक़ा मिल जाएगा. आज असम के इन लोगों की चिंताओं को फ़ौरन दूर करने और उनकी समस्याओं को तुरंत हल किए जाने की ज़रूरत है.
इस विधेयक के इन संवेदनशील बिंदुओं को देख कर ही ये समझा जा सकता है कि क्यों असम के एक बड़े इलाक़े, ख़ास तौर से कृषि प्रधान इलाक़ों और चाय बाग़ानों में विरोध किया जा रहा है.
इसकी वजह ये है कि इन इलाक़ों पर बांग्लादेश से घुसपैठ करने वालों का काफ़ी दबाव है. 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध और बांग्लादेश के जन्म से पहले बड़ी तादाद में हिंदू समुदाय के लोग भारत में पनाह ले रहे थे.
ये सब उस समय पाकिस्तान की सेना के ज़ुल्मों से बचने के लिए भारत आ रहे थे, जो चुन चुन कर पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं को निशाना बना रही थी. इन शरणार्थियों में से हिंदुओं को शरणागत और मुस्लिमों को बहिरागत यानी घुसपैठियों के तौर पर वर्गीकृत करने की कोशिश हुई थी.
भारत के राजनेताओं को देश में तेज़ी से बदलते सामाजिक स्वरूप और क्षेत्र के भू राजनीतिक समीकरणों में आ रहे बदलावों को समझने की ज़रूरत है.
इसके बाद ही वो नागरिकता (संशोधन) विधेयक को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ साथ मानवाधिकार के नज़रिए से देख सकेंगे. वो लोग जिन्हें देश के बंटवारे की वजह से पैदा हुए अपने देश में रहन सहन के बेहद मुश्किल हालात की वजह से भाग कर भारत में पनाह लेनी पड़ी थी.
जो धार्मिक उग्रवाद और सामाजिक भेदभाव की वजह से भारत आने को मजबूर हुए थे. वो लोग नागरिकता (संशोधन) विधेयक की वजह से शरणार्थी कहे जाने के अपमान के बिना, बराबरी से भारत में रह सकेंगे.
कहने की ज़रूरत नहीं है कि सभी राजनीतिक दलों को अपने संकुचित सियासी स्वार्थ की राजनीति से ऊपर उठ कर भरोसे के माहौल में नागरिकता के व्यापक पहलुओं पर चर्चा करनी चाहिए. ताकि बंटवारे के जख़्म भरे जा सकें, न कि समाज में नई दरारें पैदा की जाएं.
(ये लेखक की निजी राय है. लेखक सुरक्षा और सामरिक मामलों के टिप्पणीकार हैं और भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)