सारकेगुड़ा फ़र्ज़ी मुठभेड़: आदिवासियों को इंसाफ़ के लिए करना होगा और इंतज़ार

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सारकेगुड़ा 'फ़र्ज़ी मुठभेड़' के मामले में छत्तीसगढ़ की सरकार आगामी विधानसभा के सत्र में 'एक्शन टेकेन रिपोर्ट' यानी 'एटीआर' पेश करेगी.

सरकार विधानसभा को बताएगी कि उसने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के सेवानिवृत जज वीके अग्रवाल के एक सदस्य वाले जांच आयोग की रिपोर्ट को लेकर क्या क़दम उठाए हैं?

वैसे भारतीय जनता पार्टी ने पिछले सत्र में ही सरकार के ख़िलाफ़ सदन की अवमानना का नोटिस भी दिया था जिसे विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत ने स्वीकार भी कर लिया था.

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने बीबीसी से कहा कि सरकार जस्टिस अग्रवाल की रिपोर्ट पर एक महीने तक बैठी रही.

उनका आरोप है कि सदन में पेश करने की बजाय जांच आयोग की रिपोर्ट को मीडिया में लीक कर दिया गया.

उन्होंने कहा, "सिर्फ राजनीतिक विद्वेष से सरकार ने ऐसा किया है. जब विधानसभा का सत्र चल रहा हो तो उस वक़्त सरकार को रिपोर्ट सदन में पेश करनी चाहिए थी. अब वो रिपोर्ट के आधार पर राजनीति कर रहे हैं, जो ठीक नहीं है. उस वक़्त केंद्र में यूपीए की सरकार थी और राज्य में भारतीय जनता पार्टी थी. हमारी सरकार ने तो जांच आयोग का गठन किया. हमने घटना का संज्ञान लिया था."

सारकेगुड़ा फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामला

कांग्रेस और भाजपा के आरोप-प्रत्यारोप

उधर कांग्रेस के नेता आरोप लगाते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की तत्कालीन सरकार मामले को रफ़ा-दफ़ा करना चाहती थी.

बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी कांग्रेस के उस जांच दल में शामिल थे जिसने घटना की जांच की थी और अपनी रिपोर्ट सरकार को दी थी.

उनका कहना है कि कांग्रेस के सारे आदिवासी विधायक जल्द ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिलकर घटना को अंजाम देने वाले सुरक्षा बल के अधिकारियों और जवानों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने के लिए दबाव डालेंगे.

सरकार के सूत्रों का कहना है कि जांच आयोग की रिपोर्ट पर नियम के अनुसार ही कार्रवाई की जा सकती है. सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि इस जांच आयोग की रिपोर्ट को विधि विभाग के पास भेजा गया है.

विधि विभाग की राय के बाद ही सरकार रिपोर्ट पर क़ानूनी क़दम उठाएगी.

वीडियो कैप्शन, फर्जी एनकाउंटर में मारे गए थे आदिवासी
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मरने वाले आदिवासियों को चिदंबरम ने भी कहा था माओवादी

यह घटना वर्ष 2012 के जून महीने की है जब बासागुड़ा थाने को माओवादियों के सिलगर नामक जगह पर इकट्ठे होने की ख़बर मिली थी.

आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षा बल जब बासागुड़ा से सिलगर की तरफ जा रहे थे तो तीन किलोमीटर दूर सारकेगुड़ा पर ही उन्हें लोगों का जमावड़ा मिला.

ये वो जगह थी जहां सारकेगुड़ा, कोट्टा गुड़ा और राजपेंटा के आदिवासी ग्रामीण 'बीज पंडुम' मनाने की तैयारी पर चर्चा कर रहे थे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षा बलों ने 'पैनिक फ़ायरिंग' यानी डर कर गोलियां चलानी शुरू कर दीं थीं जिसमे 16 लोगों की घटना स्थल पर ही मौत हो गई थी जबकि एक ग्रामीण की अगले दिन सुबह मौत हुई.

कुल 10 लोग इसमें घायल भी हुए थे. उसी समय ये बात सामने आ गई थी की मारे जाने वाले माओवादी नहीं बल्कि तीन गांवों के आदिवासी थे. मरने वालों में नाबालिग़ बच्चे भी थे.

उस समय के केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी मरने वालों को 'माओवादी' क़रार दिया था.

अब ये मामला कांग्रेस और भाजपा, दोनों के लिए गले की हड्डी बन गया है जो न निगलते बन रहा है और न उगलते.

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आंदोलन तेज़ कर सकते हैं आदिवासी

भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि घटना के संबंध में न्यायमूर्ति वीके अग्रवाल की जो रिपोर्ट आई है, उसमें किसी पर कोई कार्रवाई करने की कोई अनुशंसा नहीं की गई है.

इसलिए एफ़आईआर करने का कोई आधार नहीं है. भाजपा का ये भी कहना है कि उनकी सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए आयोग का गठन किया था.

लेकिन सारकेगुड़ा, कोट्टागुड़ा और राजपेंटा के जो 17 लोग मारे गए और जो 10 लोग घायल हुए थे, उनके परिजन अब प्राथमिकी दर्ज कराना चाहते हैं.

इसको लेकर सामजिक कार्यकर्ता हिमांशु और सोनी सोरी ने थाने पर धरना भी दिया था.

बाद में सरकार के आश्वासन के बाद उन्होंने अपने आंदोलन को एक महीने के लिए स्थगित कर दिया है.

हिमांशु का कहना है कि अगर सरकार ने आश्वासन के बाद भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की तो फिर आदिवासी अपने आंदोलन को और तेज़ कर देंगे.

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