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हैदराबाद: रेप कब तक हैशटैग पर सिमटते रहेंगे?
- Author, रेणु देसाई
- पदनाम, मॉडल और अभिनेत्री
हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार,
रांची में एक 25 वर्षीय छात्रा के साथ 12 लोगों ने रेप करके उसकी हत्या
तमिलनाडु में एक बच्ची के साथ सामुहिक बलात्कार- हत्या
चंडीगढ़ में एक ऑटो ड्राइवर ने किया महिला का रेप.
ये भारत के एक आम दिन की आम ख़बरें हैं.
बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की ख़बरें सामने आते ही इंटरनेट पर लोगों को अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने एक नया हैशटेग मिल जाता है.
हैदराबाद में महिला डॉक्टर के साथ रेप और हत्या की ख़बर सामने आने के बाद भी ऐसा ही हुआ.
ये ख़बर आते ही ट्विटर पर एकाएक कई हैशटैग वायरल होने लगे.
हज़ारों-हज़ार लोगों ने इस हैशटैग के साथ ट्वीट शुरू कर दिया.
हर बलात्कार बस एक आँकड़ा
भारत में बलात्कार की हर घटना साल-दर-साल काग़ज के पन्नों में दर्ज होते आँकड़ों में शामिल हो जाती है.
बेगुनाह पीड़िताओं के साथ हुए जु़ल्म की कहानी एक हैशटैग में सिमट कर रह जाती है.
ऐसे में हम धीरे-धीरे एक ऐसे समाज के रूप में उभर रहे हैं जो कि प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ने की जगह पिछड़ता हुआ दिख रहा है.
हमने अपनी बच्चियों को गुड टच की शिक्षा दी. लेकिन ऐसा करके भी हम अपनी बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असफल रहे है.
भोग की वस्तु नहीं हैं महिलाएं
मैं मानती हूं कि हमें अपने समाज के पुरुषों को महिलाओं की शारीरिक बनावट के बारे में समझाने की ज़रूरत है.
हमें अपने पुरुषों को ये बताने की ज़रूरत है कि महिलाएं सिर्फ एक माँ, बहन और पत्नी नहीं हैं. बल्कि, वे खुद में एक जीती-जागती शख्सियत हैं. और उन्हें वैसे ही देखे जाने की ज़रूरत हैं.
उन्हें ये बताए जाने की ज़रूरत है कि महिलाएं भोग की वस्तु नहीं हैं.
मेरा मन इस बात को मानने को तैयार ही नहीं होता है कि जिस देश में लक्ष्मी, दुर्गा और तमाम दूसरी पौराणिक महिलाओं की देवियों के रूप में पूजा की जाती है.
उन्हें पुरुष देवताओं के साथ बराबरी की जगह दी जाती है. मंदिर में विशेष स्थान दिया जाता है. और पुरुष समाज भी बड़े श्रद्धा भाव के साथ इन देवियों की पूजा करता है.
ऐसे में इन्हीं देवियों के इंसानी स्वरूप को अपने ही चार-दीवारी में और अपने ही बिस्तर पर अपने इसी पुरुष समाज की ओर से इतने जुल्मों-सितम बर्दाश्त क्यों करने पड़ते हैं.
क्या रेप के डर से घर में बैठ जाएं महिलाएं?
हैदराबाद में रेप का शिकार होने वालीं महिला एक पढ़ी लिखी युवती थीं जो कि उस रोज़ हर रोज़ की तरह अपने काम से बाहर गई थीं. इसके बाद बर्बर तरीके से उसका रेप और हत्या की गई.
लगभग इसी समय एक अन्य शहर में एक बच्ची अपने जन्मदिन पर मंदिर जाती है और उसके ही सहपाठी उसका बलात्कार करके उसकी हत्या कर देते हैं.
हम उनके कपड़ों और घर से बाहर निकलने के समय के लिए उन्हें दोषी नहीं ठहरा सकते हैं.
ये ख़बरें पढ़कर मेरा खून खौल उठता है.
एक नागरिक होने के नाते मैं ज़्यादा से ज़्यादा सोशल मीडिया पर जाकर अपना गुस्सा व्यक्त कर सकती हूं.
नागरिक होने के नाते मैं क्या कर सकती हूं?
एक माँ होने के नाते मैं ज़्यादा से ज़्यादा अपनी बच्ची को डर के साथ बड़ा कर सकती हूं.
उसे डांस या संगीत सिखाने की जगह मुझे अपनी बेटी को आत्म-रक्षा की तरकीबें सिखानी होंगी.
एक प्यारी सी संवेदनशील बच्ची पैदा करने के बाद मैं खुश होने की जगह मैं उसकी चिंता में जागकर रातें काटती हूं.
भारत में गाय को मारने के लिए एक व्यक्ति को पीट-पीटकर मार दिया जाता है.
लेकिन एक महिला के साथ बर्बर तरीके से बलात्कार और हत्या की ख़बरें सामने आने के बाद लंबे विचार-विमर्श का सिलसिला शुरू हो जाता है.
निर्भया केस के बाद से अब तक एक भी बलात्कारी को सही तरीके से सज़ा नहीं मिली है.
पुरुषों के मन में ऐसी किसी सज़ा का डर नहीं है जो उन्हें ऐसा अपराध करने से रोक सके.
हमारी सरकार बेटियों को बचाने और पढ़ाने के लिए कैंपेन चलाती है लेकिन सरकार कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने में असमर्थ नज़र आती है.
ऐसे में महिलाओं को अच्छी शिक्षा हासिल करने के बाद क्या करना चाहिए?
क्या उन्हें घर बैठना चाहिए या उन्हें बाहर जाकर बर्बरता से रेप और हत्या का सामना करने का जोखिम उठाना चाहिए?
मैं मानती हूं कि ये विकल्प किसी भी तरह से सही नहीं है.
जब मुझे डर लगता है
मैं खुद कई बार देर रात शूटिंग ख़त्म होने के बाद प्रॉडक्शन की कार में ड्राइवर के साथ अकेले जाने में घबराती हूं.
सारे दिन काम करने के बाद घर लौटते हुए मन में डर का भाव नहीं होना चाहिये.
इसके लिए दूरगामी और फौरी तौर पर कुछ समाधान तय किए जाने चाहिए.
इस दिशा में पहला कदम कड़ी सज़ा होना चाहिए.
दोषियों को मिलने वाली सज़ा उनके गुनाह जितनी ही बर्बर होनी चाहिए.
सरकार को इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाने चाहिए.
जब हमारे देश की राजधानी में महिलाओं के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अपराध होंगे तो दूसरे राज्यों में ऐसा होना लाज़मी है.
भारत में औसतन पुरुषों की ज़िंदगी में सेक्स की कमी पाई जाती है और उन्हें महिलाओं के बारे में कुछ भी नहीं सिखाया या बताया जाता है.
हम इस बारे में बात भी नहीं करना चाहते.
पुरुषों को उठानी होगी ज़िम्मेदारी
भारतीय समाज में लड़कों से सेक्स के बारे में बात करना या एक समझ विकसित करना वर्जित माना जाता है.
भारत में महिलाओं की पहचान को सबसे नीचे तबके की जगह हासिल है लेकिन उसे संस्कृति के नाम पर बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जाता है.
हम पितृसत्तातमक समाज खड़ा करते हैं और पीड़ितों को दोषी ठहराते हैं. ये बेहद ही ख़राब रवायतें हैं.
मैं मानती हूं कि जब तक पुरुष महिलाओं के ख़िलाफ़ अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाते हैं तब तक ये घटनाएं सिर्फ एक नए हैशटैग और एक नये आर्टिकल तक सिमट कर रह जाने वाली हैं.
अब वो समय आ गया है कि जब पिता, भाई, और पुरुष संबंधी मिलकर इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करें कि अगली पीड़ित उनके परिवार से भी हो सकती है.
और हमारे पुरुष समाज को उन नेताओं से मांग करनी होगी जिन्हें वे वोट देकर गद्दी पर बिठाते हैं.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं.)
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