राज्यपालों के विवादित फ़ैसले मोदी सरकार में नए नहीं- नज़रिया

    • Author, अनिल जैन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

जाने-माने समाजवादी नेता मधु लिमये 1970-80 के दशक में कहा करते थे कि राज्यपाल का पद समाप्त कर देना चाहिए.

उनका कहना था कि 'राज्यपाल सफ़ेद हाथी है' जिस पर बहुत सरकारी पैसा बेवजह ख़र्च होता है.

राज्यपालों को महामहिम कहा जाता है लेकिन वे अपना विवेक दिल्ली में रखकर राज्यों के राजभवनों में रहते हैं. दिल्ली में उनके विवेक का इस्तेमाल वे लोग करते हैं जो उन्हें राज्यपाल के पद पर बिठाते हैं.

राज्यपालों की यह कहानी कोई आजकल की नहीं, बल्कि बहुत पुरानी है, जिसे आए दिन कोई न कोई राज्यपाल देश को याद दिलाता रहता है.

ताज़ा मामला महाराष्ट्र का है, जहां राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने नियम-क़ायदों को किनारे रखकर चुपके से देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.

आज़ाद भारत के इतिहास में यह पहला मौक़ा रहा जब आनन-फानन में इतनी सुबह किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन हटाकर किसी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई हो. बहरहाल, राज्यपाल के इस हैरतअंगेज कारनामे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

दरअसल, राज्यपालों की संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी और मनमानी का सिलसिला क़रीब चार दशक पुराना है जब केंद्र और राज्यों में कांग्रेस का सत्ता पर एकाधिकार टूटा और ग़ैर-कांग्रेसी दलों की सरकारें भी बनने लगीं.

इन चार दशकों के दौरान केंद्र में चाहे जिस दल या गठबंधन की सरकार रही हो, सभी ने अपने विरोधी दलों की राज्य सरकारों को परेशान किया. दलबदल को बढ़ावा देकर उन्हें गिराने में राज्यपालों का भरपूर इस्तेमाल किया गया.

राज्यपाल भी ख़ुशी-ख़ुशी इस्तेमाल हुए या केंद्र सरकार को ख़ुश करने के लिए अपने स्तर पर ही राज्य सरकारों को तरह-तरह से परेशान करते रहे या उन्हें अस्थिर करने का खेल खेलते रहे.

ऐसे हुई शुरुआत

इस सिलसिले में सबसे पहले और कुख्यात उदाहरण के तौर पर जीडी तपासे का नाम उल्लेखनीय है, जिन्होंने हरियाणा का राज्यपाल रहते हुए 1982 में चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल के विधायकों का बहुमत होते हुए भी अल्पमत वाली कांग्रेस के नेता भजनलाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी और बाद में भजनलाल ने लोकदल के कुछ विधायकों से दलबदल कराकर अपना बहुमत साबित किया.

इस सिलसिले में दूसरा नाम आता है ठाकुर रामलाल का, जिन्होंने आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के रूप में 1983 में तेलुगू देशम पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को उस समय बर्ख़ास्त कर उनके ही एक बाग़ी मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी, जब रामाराव अपने दिल का ऑपरेशन कराने अमेरिका गए हुए थे.

ठीक इसी तरह का एक काला अध्याय 1983 में ही जगमोहन ने जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल रहते हुए रचा था. उन्होंने मुख्यमंत्री फारुक़ अब्दुल्ला को बर्ख़ास्त कर उनके बहनोई गुल मुहम्मद शाह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी.

राज्यपालों की मनमानी के इस सिलसिले में 1989 कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई की बर्खास्तगी का मामला तो भारत के संसदीय इतिहास का एक अहम अध्याय है.

बोम्मई की सरकार को तत्कालीन राज्यपाल पी. वेंकट सुबैया ने मनमाने तरीक़े से यह कहते हुए बर्ख़ास्त कर दिया था कि सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है.

बोम्मई ने अपनी बर्ख़ास्तगी को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहरा दिया. बोम्मई ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

एसआर बोम्मई बनाम भारत सरकार के नाम से मशहूर हुए इस मामले में 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया वह अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल यानी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के संदर्भ में मील का पत्थर बन गया.

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बोम्मई सरकार की बर्खास्तगी असंवैधानिक थी और उन्हें बहुमत साबित करने का मौका मिलना चाहिए था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकार के बहुमत या अल्पमत में होने का फ़ैसला संबंधित सदन यानी लोकसभा या विधानसभा में ही हो सकता है.

नहीं रुकी मनमानी

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर सरकारों ने ज्या दा ध्यान नहीं दिया, नतीजा यह रहा कि राज्यपालों की कलंक-कथा में नए अध्याय जुड़ने का सिलसिला जारी रहा.

उत्तर प्रदेश में 1998 में कल्याण सिंह की अगुवाई में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकार थी, जिसे एक नाटकीय घटनाक्रम के बीच तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी.

हालांकि जदंबिका पाल एक दिन ही मुख्यमंत्री रह सके थे क्योंकि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कल्याण सिंह की बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार दे दिया था, कल्याण सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने.

इसी तरह 1998 में ही बिहार में राबड़ी देवी की सरकार को तत्कालीन राज्यपाल वीसी पांडे ने बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था. केंद्र में उस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी.

राष्ट्रपति शासन का फ़ैसला लोकसभा में पारित होने के बावजूद राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था, लिहाजा वाजपेयी सरकार को मजबूरन राबड़ी देवी की सरकार को फिर से बहाल करना पड़ा था.

इसके बाद 2005 में ऐसा ही खेल खेलते हुए झारखंड में राज्यपाल सैयद सिब्ते रज़ी ने अल्पमत के नेता शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री की पद की शपथ दिला दी थी, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें महज नौ दिन में ही इस्तीफा देना पड़ा था. बाद में अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी.

बिहार के राज्यपाल के रूप में ऐसी ही मनमानी सरदार बूटा सिंह ने की थी. फ़रवरी 2005 में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने लायक बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था, लिहाजा बूटा सिंह की सिफ़ारिश पर मई 2005 में विधानसभा भंग कर दी गई थी. उस समय केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार थी.

हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा भंग करने के फैसले को असंवैधानिक करार दिया था.

अब बात मौजूदा सरकार की

यह तो कुछ बड़े और महत्वपूर्ण उदाहरण मौजूदा सरकार के पहले के हैं, लेकिन 2014 में मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद के वर्षों में केंद्र सरकार और राज्यपालों के लिए सरकारें बनाने-गिराने के खेल में संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक परंपराओं की धज्जियां कुछ ज़्यादा ही बेरहमी से उड़ाई गई हैं.

हालांकि इस दौरान दो मामलों में केंद्र सरकार को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खानी पड़ी लेकिन उसने कोई सबक नहीं लिया, लिहाजा राज्यपालों के रवैये में भी कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया.

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद किसी राज्य सरकार को दलबदल के ज़रिए अस्थिर करने और फिर अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की शुरुआत दिसंबर 2014 में अरुणाचल प्रदेश से हुई.

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फ़ैसले में राज्यपाल के रवैये पर सख्त टिप्पणियां करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य की कांग्रेस सरकार को फिर से बहाल करने का आदेश दिया.

ऐसे ही मामले में मोदी सरकार को दूसरा झटका उत्तराखंड के मामले में नैनीताल हाई कोर्ट से मिला. मार्च 2016 में हरीश रावत की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार उस समय अल्पमत में आ गई थी, जब कांग्रेस के नौ विधायक बाग़ी होकर बीजेपी में शामिल हो गए थे.

मुख्यमंत्री हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए पांच दिन का वक़्त दिया गया था, लेकिन उनके बहुमत का परीक्षण होने से पहले ही केंद्र सरकार ने राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश कर दी थी, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार भी कर लिया था.

हरीश रावत ने राष्ट्रपति के फैसले को नैनीताल हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. हाई कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को असंवैधानिक करार दिया था. केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी लेकिन वहां भी उसे निराशा हाथ लगी और हरीश रावत सरकार फिर बहाल हो गई.

गोवा की मनमानी

दो-दो बार सुप्रीम कोर्ट में किरकिरी हो जाने के बावजूद राज्यपालों के ज़रिए राज्यों में सरकार बनाने और विपक्षी दलों की सरकार गिराने का खेल थमा नहीं.

गोवा विधानसभा के चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था. वहां 40 सदस्यीय विधानसभा में 17 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बडी पार्टी के रूप में सामने आई थी, जबकि भाजपा को 13 सीटें हासिल हुई थीं.

सबसे बडी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता देने की स्थापित परंपरा को नज़रअंदाज करते हुए राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने भाजपा के इस मौखिक दावे को स्वीकार कर लिया कि उसके पास बहुमत है, जिसे वह विधानसभा में साबित कर देगी.

मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई, बाद में भाजपा ने छोटे-छोटे स्थानीय दलों के विधायकों से दलबदल कराकर और उन्हें मंत्री पद देकर अपना बहुमत बना लिया, ठीक यही कहानी मणिपुर में भी दोहराई गई थी.

अब से एक साल पहले नवंबर महीने में ही जम्मू-कश्मीर में जब महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने नेशनल कांफ्रेन्स और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करने की सूचना फैक्स के जरिए राज्यपाल सत्यपाल मलिक को भेजी तो राज्यपाल ने अपने निवास पर लगी फैक्स मशीन ख़राब होने की हास्यास्पद दलील देते हुए महबूबा की ओर भेजी गई सूचना मिलने से इनकार कर दिया और विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश कर दी.

कर्नाटक में भी कुछ महीनों पहले जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस की साझा सरकार को अपदस्थ कर भाजपा सरकार बनाने के लिए वहां के राज्यपाल वजूभाई वाला ने जिस तरह का उतावलापन दिखाया, वह किसी से छिपा नहीं है.

यही नहीं, उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर जनता दल (एस) और कांग्रेस के दलबदलू विधायकों को दलबदल निरोधक कानून से बचाने के लिए विधानसभा स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में भी अनावश्यक दखलंदाजी की.

बहरहाल, इस सिलसिले में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने तो अपनी 'ऐतिहासिक' करनी से सभी राज्यपालों को पीछे छोड़ दिया है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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