महाराष्ट्रः क्या बीजेपी का दांव उल्टा भी पड़ सकता है?

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार एक लंबा दिन था. इस दिन देश ने राजनीति का जो खेल देखा, वो शायद पहले नहीं देखा था.

शुक्रवार शाम को शिवसेना के उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बना रहे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजित पवार सुबह-सुबह भाजपा के देवेंद्र फणनवीस के साथ उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नज़र आए.

महाराष्ट्र की राजनीति की बिसात पर अजित पवार की इस चाल ने सबको चौंका दिया. उन लोगों को भी, जो उन्हें बेहद क़रीब से जानते हैं.

शाम होते-होते राजनीतिक की ये बाज़ी पूरी तरह बदली हुई नज़र आई.

अजित पवार को राजभवन में भाजपा की सरकार बना रहे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ लेते देखने वाले एनसीपी के कई विधायक शाम होते-होते पार्टी नेता शरद पवार के पास पहुंच गए और सत्ता के खेल के समीकरण फिर बदल गए.

हिसाब लगाने वाले हिसाब लगाते रह गए कि कौन फ़ायदे में रहा और कौन नुक़सान में. महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद चांचूवार को लगता है कि सबसे ज़्यादा नुक़सान में देवेंद्र फडणवीस रहेंगे.

'लूज़र' साबित होंगे फडणवीस और अजित पवार?

चांचूवार कहते हैं, "अभी के समीकरणों को देखते हुए लगता है कि सबसे बड़े लूज़र देवेंद्र फडणवीस ही रहेंगे क्योंकि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने अपने विधायकों को अपने पास रखा है और उनके लिए बहुमत साबित करना मुश्किल होगा."

चांचूवार कहते हैं, "दूसरे लूज़र होंगे अजित पवार. उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के साथ बग़ावत की और एनसीपी के विश्वास को ठेस पहुंचाई है. इससे उनकी साख़ को बहुत नुक़सान हुआ है. उन्हें शरद पवार के वारिस के तौर पर भी देखा जाता था. उन्होंने उनके साथ भी गद्दारी की है."

देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली है लेकिन उनके कई इम्तिहान अभी बाक़ी है.

वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स मानते हैं कि बीजेपी के फ़ेल होने के आसार ज़्यादा है.

'बीजेपी का दांव उल्टा पड़ सकता है'

समर खड़स कहते हैं, "25 नवंबर से विधायकों को शपथ लेनी है. उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष का मुद्दा आएगा. अगर बीजेपी को लगा कि वह अपना विधानसभा अध्यक्ष नहीं बना पाएगी तो वह विधानसभा में गड़बड़ कर सकती है. इस गड़बड़ी के दौरान सदन स्थगित हो सकता है और राज्य फिर से राष्ट्रपति शासन की ओर जा सकता है."

खड़स कहते हैं, "राज्यपाल मध्यावधि चुनावों की घोषणा भी इस तर्क के साथ कर सकते हैं कि वो सभी विकल्पों को आज़माया जा चुका है."

महाराष्ट्र की राजनीति के इस नए और चौंकाने वाले खेल की पहली चाल बीजेपी ने चली है. लेकिन क्या ये दांव उल्टा भी पड़ सकता है?

इसके जवाब में समर खड़स कहते हैं, "ये खेल बीजेपी ने खेला है. मुझे लगता है कि इस खेल में सबसे बड़ी लूज़र न तो एनसीपी है, न कांग्रेस और ना शिवसेना है बल्कि बीजेपी ही है क्योंकि उसके पास अभी संख्या नहीं है."

लेकिन खेल अभी पूरा नहीं हुआ है. प्रमोद चांचूवार कहते हैं कि अगले दिनों में कौन विधायक किसके साथ रहेगा, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है.

'कुछ भी हो सकता है...'

चांचूवार कहते हैं, "राजनीति का ये खेल क्रिकेट की तरह है और आख़िरी गेंद तक कुछ नहीं कहा जा सकता है. कभी भी कुछ भी हो सकता है. आज की राजनीति भी बदल गई है. राजनीति अब विचारधारा या नैतिकता के आधार पर नहीं होती है बल्कि कमाई और हिस्सेदारी बड़ा कारण हो गए हैं, ऐसे में किसी की गारंटी नहीं ली जा सकती है और किसी भी पार्टी के विधायक अपना हित साधने के लिए किसी के भी साथ जा सकते हैं."

चांचूवार कहते हैं, "जब अजित पवार जैसे बड़े नेता ही एनसीपी को छोड़कर जा सकते हैं तो आने वाले दिनों में कौन विधायक किसके साथ रहेगा इसकी क्या गारंटी ली जा सकती है? लेकिन चुने हुए विधायकों पर जनता का ये दबाव तो ज़रूर होगा कि वो बीजेपी के साथ न जाएं."

अगर देवेंद्र फडणवीस बहुमत नहीं साबित कर पाए और महाराष्ट्र मध्यावधि चुनाव की ओर बढ़ा तो फिर कौन नुक़सान में रहेगा?

समर कहते हैं, "बीजेपी अगर विश्वासमत हासिल नहीं कर पाएगी तो ये बीजेपी के लिए बहुत बड़ा नुक़सान होगा. अगर आने वाले चुनावों में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ती हैं तो बीजेपी को बहुत बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा और उसके लिए सौ सीटों का आंकड़ा पार करना भी मुश्किल हो जाएगा."

लेकिन क्या अपने आप को सेक्युलर पार्टी कहने वाली कांग्रेस घोषित तौर पर हिंदूवादी दल शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी?

इसके जवाब में समर खड़स कहते हैं, "कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मामले में समझौता न करने का दावा करती रही है. लेकिन वास्तव में वह कितनी धर्मनिरपेक्ष है इस पर सवाल उठ सकते हैं. कांग्रेस की कथनी और करनी में फ़र्क रहा है. कांग्रेस कितना साथ आएगी पता नहीं, लेकिन अगर शिवसेना और एनसीपी भी साथ आ पाए तो भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी."

खड़स के मुताबिक़, "बीजेपी आज धनबल और सत्ताबल में भले ही कितनी भी मज़बूत हो लेकिन अगर चुनाव हुए तो शिवसेना और एनसीपी के गठजोड़ के सामने उसे भारी राजनीतिक नुक़सान उठाना पड़ेगा."

विश्लेषकों के नज़रिए अपनी जगह हैं. लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति के खेल में जितने पत्ते खुले हैं उनसे ज़्यादा बंद है.

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