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उत्तराखंड: सरकार और कॉलेजों के बीच पिसते आयुर्वेद के छात्र
- Author, रोहित जोशी
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए
'आयुष प्रदेश' बनने के राजनीतिक दावों के बीच उत्तराखंड में आयुर्वेद की पढ़ाई कर रहे सैकड़ों छात्र बेतहाशा फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ पिछले 48 दिनों से धरने पर हैं.
छात्र सीधे-सीधे आरोप लगा रहे हैं कि हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद इन निजी कॉलेजों में फ़ीस बढ़ोतरी इसलिए वापस नहीं ली जा रही क्योंकि ये कॉलेज सरकार के मंत्रियों, उनके रिश्तेदारों या दूसरे प्रभावशाली लोगों के हैं.
जबकि कॉलेजों का कहना है कि उन्होंने फ़ीस सरकार के आदेश पर बढ़ाई थी और बावजूद इसके छात्रों पर होने वाला ख़र्च ज़्यादा है.
देहरादून के परेड ग्राउंड में चल रहे धरने पर बैठे एक छात्र अजय ने बीबीसी से कहा, ''कोई आम इंसान हो तो वो हाईकोर्ट के आदेशों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता लेकिन प्राइवेट कॉलेज चूंकि प्रभावशाली लोगों के हैं, इसी वजह से फ़ीस वृद्धि वापस नहीं ली जा रही और इसलिए हाईकोर्ट की बात नहीं मानी जा रही. "
क्या है मामला
सरकार ने 14 अक्टूबर 2015 को एक आदेश जारी कर इन कॉलेजों में फ़ीस बढ़ाकर 80 हज़ार से सीधे 2 लाख 15 हज़ार रुपए कर दी थी.
मगर उत्तराखंड आयुर्वेद यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध इन निजी कॉलेजों का कहना है कि उन्होंने सरकार के आदेश के आधार पर ही फ़ीस बढ़ाई है. जबकि छात्रों का कहना है कि निर्धारित प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए ग़लत तरीक़े से फ़ीस वृद्धि की गई है.
इस मामले को लेकर नैनीताल हाइकोर्ट पहुंचे एक छात्र ललित तिवारी ने बीबीसी को बताया, ''सरकार ने असंवैधानिक तरीक़े से शासनादेश जारी कर तक़रीबन तीन गुना फ़ीस बढ़ा दी थी. शुल्क नियामक समिति की शिफ़ारिशों के बग़ैर शुल्क बढ़ाकर इसमें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन शुल्क नियामक एक्ट का उल्लंघन किया गया. मैं इस मामले को लेकर हाईकोर्ट गया. जहां हाइकोर्ट की सिंगल बेंच और फिर डबल बेंच ने हमारे पक्ष में फ़ैसला सुनाया और कॉलेजों को पुरानी फ़ीस लेने और बढ़ाई गई फ़ीस वापस करने के आदेश दिए. लेकिन कॉलेज इसे नहीं मान रहे."
इधर छात्रों का कहना है कि फ़ीस नहीं जमा करने पर उन्हें कॉलेज की एकैडमिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका जा रहा है और अटेंडेंस नहीं दी जा रही.
धरने पर बैठी एक छात्रा वोयामिका का कहना था, "हम लोग कॉलेज जाते हैं तो वहां हमें बैक के फ़ॉर्म्स नहीं भरने दिए जाते. हमें मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है और फ़ीस भरने का दबाव बनाया जाता है."
यूनिवर्सिटी असमर्थ
हालांकि, सरकार और उत्तराखंड आयुर्वेद यूनिवर्सिटी की ओर से तीन बार निजी कॉलेजों को लिखित निर्देश दिए गए हैं कि वे पुराने फ़ी स्ट्रक्चर के अनुरूप ही फ़ीस लें.
यूनिवर्सिटी के कुलपति सुनील जोशी निजी कॉलेजों पर इससे अधिक सख़्ती नहीं कर पाने की अपनी मजबूरी बताते हुए कहते हैं, ''हमने हाइकोर्ट के आदेशों के अनुरूप सभी कॉलेजों को निर्देश जारी किए हैं. इसके अलावा यह रास्ता हो सकता है कि इन कॉलेजों की मान्यता को रद्द कर दिया जाए. लेकिन इससे तक़रीबन 6 हज़ार छात्रों का नुक़सान होगा. वे कहां जाएंगे? सरकारी कॉलेज़ों में हम 6 हज़ार छात्रों की व्यवस्था नहीं कर सकते.''
दूसरी तरफ़ निजी कॉलेजों की अपनी दलील है कि 2004 के बाद से सरकार ने कोई फ़ीस वृद्धि नहीं की. ऐसे में फ़ीस नहीं बढ़ाई गई तो उनके लिए कॉलेज का संचालन संभव नहीं है.
निजी कॉलेजों के एसोसिएशन के सदस्य और हिमालय आयुर्वेदिक कॉलेज के सचिव बालकृष्ण चमोली ने बीबीसी को बताया, ''हमने सरकार के आदेशों के अनुरूप ही फ़ीस वृद्धि की. सरकारी कॉलेजों में सरकार ख़ुद 1.5 लाख रुपये फ़ीस ले रही है. फ़ीस कमेटी को सौंपी रिपोर्ट में डायरेक्टर ने स्वीकार किया है कि बीएमएस के हर एक छात्र पर सरकार 4.5 लाख रुपये ख़र्च कर रही है. ऐसे में हम 80 हज़ार रुपये सालाना फ़ीस में कैसे काम चला सकते हैं.''
चमोली का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुरूप अगर हर तीन साल में 15 से 20 प्रतिशत फ़ीस भी बढ़ाई जाती तो अब तक 3.5 लाख से 4 लाख तक फ़ीस पहुंच जाती.
वो कहते हैं, "हमें ना ही फ़ीस कमेटी ने सुना, ना ही कोर्ट सुन रहा है, ना छात्र सुन रहे हैं, ना सरकार सुन रही है और ना ही मीडिया. एसोसिएशन ने सरकार को लिखकर दिया है कि अगर आप यही फ़ीस रखते हैं तो हमारे लिए संभव नहीं है. इन 5 हज़ार छात्रों को सरकार अपने अनुसार पढ़ा ले."
हालांकि फ़ीस वृद्धि को लेकर इस विवाद का तुरंत हल निकलता नहीं दिखाई दे रहा लेकिन छात्र अपने आंदोलन को और उग्र बनाने की बात कर रहे हैं.
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