सरकार को मुस्लिम समाज के लिए मस्जिद बनाकर देनी चाहिएः जस्टिस सावंत

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सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या मामले पर अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुना दिया.
शीर्ष अदालत ने अपने फ़ैसले में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में हिंदू पक्ष में फ़ैसला देते हुए विवादित भूमि मंदिर के लिए दी और मस्जिद के लिए अलग से पाँच एकड़ ज़मीन की व्यवस्था की है. यानी जहाँ बाबरी मस्जिद थी वहां अब राम मंदिर बनने का रास्ता साफ़ हो गया है.
अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साल 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने को भी अपराध माना. यह मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है.
अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मद्देनज़र बीबीसी मराठी की संवाददाता हलीमा क़ुरैशी ने पुणे में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस पी बी सावंत से बात की. पढ़िए उस बातचीत के प्रमुख अंश.

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अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को किस तरह देखते हैं?
इस फ़ैसले को इस दृष्टि से देखना चाहिए कि इसके ज़रिए दो धर्म के लोग नज़दीक आएंगे. इस फ़ैसले के साथ ही इन दोनों पक्षों के बीच मौजूद मुश्किलें भी ख़त्म हुई हैं.
इस फ़ैसले में सरकार को यह भी कहा गया है कि वह मुस्लिम समाज को पाँच एकड़ ज़मीन दे ताकि वह उसमें मस्जिद का निर्माण कर सके. यह ज़मीन विवादित भूमि से लगभग दोगुनी है.
सरकार को मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम समाज को पैसों की मदद भी करनी चाहिए. यहां तक कि सरकार को यह मस्जिद ख़ुद बनाकर देनी चाहिए. क्योंकि मस्जिद को गिराने में अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का भी हाथ था.
मस्जिद गिराने में जो लोग ज़िम्मेदार हैं सरकार ने सबक़ सिखाने का कभी प्रयास ही नहीं किया.
इसलिए सरकार और हिंदू समाज दोनों को मिलकर यह मस्जिद बनाने में मदद करनी चाहिए. इससे हमारे संविधान में मौजूद धर्मनिरपेक्षता की बात आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी.

इसी तरह के अन्य मामलों पर क्या इस फ़ैसले का असर पड़ेगा?
इस फ़ैसले का दूसरे मामलों में कोई असर पड़ता नहीं दिखता. इस मामले में रामजन्म जैसा संवेदनशील मसला शामिल था, इस तरह का संवेदनशील मसला दूसरे मामलों के साथ जुड़े हुए नहीं है. दूसरे मामलों को क़ानूनी तौर-तरीक़ों से ही निपटना चाहिए.
इसके साथ ही न्यायालय को लिमिटेशन एक्ट (मुक़दमा दायर करने के लिए तय समयसीमा से जुड़ा क़ानून) का ख्याल भी रखना चाहिए.
रामलला को दावेदार कैसे माना गया?
क़ानून में देवताओं को एक क़ानूनी व्यक्ति के तौर पर माना जाता है. इसी नियम के तहत रामलला को एक व्यक्ति माना गया और इसलिए उनके हक़ में यह फ़ैसला सुनाया गया.

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क्या इस फ़ैसले के वक़्त श्रद्धा को भी ध्यान में रखा गया?
पहली बात तो यह है कि उस जगह में ही राम का जन्म हुआ था या नहीं हुआ था इस बारे में कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं हुआ. मैंने जितना पढ़ा है, उसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि यह सिद्ध होता है कि विवादित जगह पर ही राम का जन्म हुआ था.
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा मान लिया कि इस जगह पर राम का जन्म हुआ होगा, क्योंकि बहुसंख्य समाज कई सालों से इसी बिंदू पर अपनी बात रखता रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार भी किया कि श्रद्धा से जुड़े इस बिंदू को मान लेने से बरसों पुराना झगड़ा सुलझाया जा सकता है.

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अयोध्या विवाद पर होने वाली राजनीति क्या अब भी होगी?
इस मुद्दे पर धर्म से जुड़े लोगों ने ही राजनीति की. इन लोगों ने आज तक राजनीति को धर्म के नाम पर आगे बढ़ाने की कोशिश की है.
राजनीति और धर्म का संबंध टूटना चाहिए और यह अलग होना चाहिए. मैं चाहता हूं कि यह फ़ैसला राजनीति और धर्म को अलग करने में कामयाब हो सके.
इसके साथ ही न्यायालयों को भी धर्म आस्था से परे हटकर सिर्फ़ क़ानून के मुताबिक़ जो न्याय बन सके वह देना चाहिए.
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