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मोदी ने RCEP में शामिल होने से मना करके किसका भला किया?: नज़रिया
- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ़ैसले की तारीफ़ और आलोचना दोनों हो रही है, लेकिन इसे क्या ठीक से समझा जा रहा है?
RCEP भारत में एकदम अंधों का हाथी हो गया है. खासकर सरकार और सरकारी एजेंसियों के बर्ताव से तो यही लगता है कि उन्हें इस किस्से का ओर-छोर समझ में नहीं आ रहा है.
किस्सा आसान भी नहीं है. खासकर खेती के सिलसिले में. कब कौन सी फसल अच्छी होगी, ख़राब होगी? कब किसके दाम मिलेंगे और कब अच्छी फसल वरदान की जगह अभिशाप साबित होने लगेगी?
ये सवाल पहले ही देश भर के कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों को चक्कर में डालने के लिए काफी थे. उसके ऊपर अब सवाल ये है कि अगर चीन से सस्ते सामान के साथ ही ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से फल, सब्जी, दूध और दही जैसी चीजें भी आने लगीं तो भारत के किसानों, बागवानों और जानवर पालनेवालों का क्या होगा?
बाज़ार में नया क्या?
सवाल तो बहुत अच्छा है. मगर अपने आसपास के बाज़ारों में टहलकर देख आइए. ऑस्ट्रेलिया के तरबूज, कैलिफ़ोर्निया के सेब और न्यूजीलैंड की किवी, अंगूर और संतरे भरे पड़े हैं. थाईलैंड के ड्रैगन फ्रूट, केले और अमरूद भी हैं. अब ये सब अगर बाज़ार में हैं तो नया क्या आनेवाला है?
ओपन जनरल लाइसेंस के तहत इंपोर्ट होने वाली चीजों की लिस्ट पर नज़र डाल लीजिए, सब पता चल जाएगा. दरअसल, अब लिस्ट है ही नहीं. एक नेगेटिव लिस्ट है जिसमें शामिल चीजों पर या तो रोक है या उनके लिए अलग से इजाज़त चाहिए. बाकी सबका इंपोर्ट खुला हुआ है.
दूसरी तरफ हाल देखिए किसानों का. प्याज का दाम इस वक्त सौ रुपए किलो के आसपास पहुंच रहा है. आपमें से कौन ऐसा है जो सिर्फ प्याज़ की सब्जी खाता है, या बिना प्याज के रह नहीं सकता?
दूसरी तरफ ये देखिए कि साल में या दो साल में ऐसा एक आध मौका ही आता है जब किसान को इस उपज की बहुत अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद जागती है. लेकिन ऐसा होते ही सरकार को महंगाई की चिंता सताने लगती है और वो प्याज का एमईपी यानी मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस तय कर देती है.
इसका असर किसान का प्याज विदेशी बाज़ारों में जा नहीं पाता जहां उस वक्त शायद मांग होती है और भारत में दाम काबू करने की कोशिश में किसान की बलि.
एकदम यही हाल गन्ने के किसान का होता है. वैसे तो समर्थन मूल्य हर बड़ी फसल पर तय है मगर ये मूल्य समर्थन कम, विरोध ज़्यादा करता है.
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की मांग बढ़ी नहीं कि सरकार की तरफ से पाबंदियां लगने लगती हैं. यहां भी वही सवाल है. क्या आप चीनी के बिना रह नहीं सकते? और इतनी ज़रूरी है तो ज़्यादा दाम क्यों नहीं दे सकते?
महंगा है... कुछ दिन नहीं खाओगे तो क्या बिगड़ जाएगा?
कई साल पहले, क़रीब सोलह-सत्रह साल पहले, पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम 'आपकी बात, बीबीसी के साथ' में मेहमान थे.
श्रोताओं के सवालों के जवाब दे रहे थे. पाकिस्तान से किसी परेशान आत्मा ने कहा -टमाटर 30 रुपये किलो हो गया है!
जनरल साहब भड़क गए और बोले- डॉक्टर ने कहा है कि टमाटर खाओ, दस दिन नहीं खाओगे तो क्या बिगड़ जाएगा!
तब हम सबको बहुत हंसी आई और बात बेतुकी लगी. लेकिन आज लगता है कि बात सटीक थी.
इस देश में प्याज और चीनी के दामों पर सरकार गिर जाती हैं इसलिए सरकार जी-तोड़ कोशिश में रहती है कि ये चीज़ें महंगी न हो जाएं. और इस चक्कर में पिस रहे हैं वो किसान जिनके हितों की रक्षा के लिए भारत ने RCEP समझौते पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया.
एक और उदाहरण देखिए. उत्तराखंड के जिन पहाड़ों पर रामगढ़ से लेकर हवलबाग तक और आगे पीछे भी बेहतरीन किस्म के सेब, आड़ू, खूबानी और आलूचे होते हैं वहां पहुंचने के लिए आखिरी रेलवे स्टेशन के बाहर मुझे मुंबई से महंगा सेब बिकता मिला.
जब मैंने कहा कि इससे सस्ता तो मुंबई में मिलता है, तो जवाब था- हां, मिलता ही होगा, वहीं से तो आ रहा है. ऊपर का माल कहां उतर पाता है? इससे बड़ी टिप्पणी क्या हो सकती है हमारे कृषि विकास, बागवानी और फल प्रसंस्करण के सपनों पर? तो अब कौन-सी जादू की छड़ी मिलने वाली है कि देश के बागवानों को RCEP से बचा लेगी सरकार?
RCEP पर केंद्र के बदलते सुर
केंद्र सरकार के रोज बदलते सुर तो सामने ही दिख रहे हैं. वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पहले RCEP के समर्थन में तर्क देते थे. फिर प्रधानमंत्री ने कह दिया कि समझौते पर दस्तखत करना उनकी अंतरात्मा को गवारा नहीं.
अब पीयूष गोयल फिर कह रहे हैं कि अच्छा ऑफ़र मिला तो अभी समझौते पर दस्तखत हो सकते हैं. दूसरी तरफ, वो ये भी कह रहे हैं कि भारत अब अमरीका और यूरोपीय यूनियन के साथ फ्री-ट्रेड यानी बेरोक-टोक कारोबार के समझौते पर विचार कर रहा है.
बरसों से भारत ऐसे किसी विचार के विरोध में रहा है. दूसरे मंत्रियों से पूछने जाइए तो वो अपने अपने तर्क दे देंगे. संघ परिवार ने स्वदेशी जागरण के नाम पर समझौते के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा है ये भी सरकार के गले की हड्डी है. लेकिन ये याद रखना ज़रूरी है कि यही स्वदेशी जागरण मंच पिछले तीस पैंतीस साल से देश में विदेशी निवेश की हर कोशिश के ख़िलाफ़ खड़ा रहा है.
और विरोध करने वालों के तर्क देखें. न्यूजीलैंड से सस्ता दूध आ जाएगा.
उत्तर प्रदेश के एक मंत्री ने कहा कि, "न्यूजीलैंड वाले ग्यारह-बारह रुपये लीटर दूध बेचेंगे, हमारा डेरी कोऑपरेटिव तो चालीस रुपये में ख़रीदता है, कैसे चलेगा?"
जवाब देने की ज़रूरत तक नहीं है. गूगल पर अभी देखा, न्यूजीलैंड में एक लीटर दूध का रिटेल भाव दो डॉलर के आस-पास था और उनका एक डॉलर करीब पैंतालीस रुपये का होता है. अब आप खुद सोचिए कि वो कितना सस्ता दूध या पनीर भारत में भर देंगे.
मजे की बात ये है कि समझौते का विरोध करने में कांग्रेस भी शामिल है और किसान मजदूर संगठन भी. कोई समझाए कि आर्थिक सुधार आने के बाद भारत में नौकरीपेशा लोगों की ज़िंदगी सुधरी है या बदतर हुई है.
शामिल होते तो आखिर किसे होता नुकसान?
मज़दूरों की हालत में सुधार है कि नहीं है. और फसल का दाम बढ़ेगा तो किसान को फायदा होगा या नुकसान?
तो नुकसान किसको होगा? उन बिचौलियों को जो किसानों का ख़ून चूसते रहे हैं. उन सरकारी अफसरों, नेताओं और मंडी के कारकुनों को जिन्होंने फसल और बाज़ार के बीच का पूरा रास्ता कब्जा कर रखा है. उन व्यापारियों और उद्योगपतियों को जो मुक़ाबले में खड़े होने से डरते हैं क्योंकि उनका मुनाफा मारा जाएगा और उनके यहां काम करने वाले अच्छे लोग दूसरी कंपनियों में जा सकते हैं, दूसरी दुकानों में जा सकते हैं.
ये दूसरी कंपनियां, दूसरी दुकानें कौन हैं? यहीं हैं जिन्हें RCEP के बाद भारत में माल बेचने या काम करने की छूट मिलेगी. अगर उपभोक्ता को सस्ता और अच्छा सामान मिलता है, कामगार को अच्छी तनख्वाह मिलती है और किसान को फसल का बेहतर दाम और बड़ा बाज़ार मिलता है, तो किसे एतराज है? क्यों एतराज है? समझना मुश्किल है क्या.
शामिल नहीं हुए तो किसका होगा नुकसान?
अगर 80 और 90 के दशक में भारत सरकार इसी तरह हिचक दिखाती तो आज हमारे बाज़ार में मौजूद आधे से ज़्यादा चीजें भी नहीं होतीं और देश में आधे से ज़्यादा रोज़गार भी नहीं होते.
फ़ैसले के मौकों पर हिम्मत दिखानी पड़ती है. किसी के हितों की रक्षा से ज्यादा जरूरी है एक देश के तौर पर आत्मविश्वास दिखाना.
(लेखक सीएनबीसी आवाज़ के पूर्व संपादक हैं. ये उनके अपने विचार हैं.)
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