महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019: शिवसेना-बीजेपी गठबंधन में देरी यूँ ही नहीं हो रही

    • Author, नामदेव अंजना
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

"गठबंधन की जितनी चिंता आपको है उतनी ही मुझे भी है. हम सही समय पर सही फॉर्मूले की घोषणा करेंगे. नारायण राणे के बारे में भी हम फ़ैसला लेंगे. थोड़ा इंतज़ार कीजिए."

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 23 सितंबर को संवाददाता सम्मेलन में ये बातें कहीं. उनके इस बयान के बाद से कई सवाल खड़े हो गए हैं.

लोकसभा चुनावों के लिए शिवसेना-बीजेपी गठबंधन के बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन होगा, यह बयान दोनों पार्टियों की तरफ से दिया जा रहा है लेकिन विधानसभा चुनाव की तारीख़ों की घोषणा की जा चुकी है, आचार संहिता भी लागू हो गई हैं लेकिन गठबंधन की घोषणा अब तक नहीं हुई है.

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील ने मंगलवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा कि "गठबंधन चर्चा के अंतिम चरण में है. जल्द ही सभी सीटों पर सहमति बन जाएगी और घोषणा की जाएगी. कुछ लोग चाहते हैं कि यह गठबंधन न हो. लेकिन गठबंधन हो कर रहेगा."

उन्होंने कहा, "हमारी पार्टी सहयोगियों को साथ लेकर चलने वाली पार्टी है. मुख्यमंत्री फडणवीस उद्धव ठाकरे से बात कर रहे हैं."

दूसरी ओर, शिवसेना सांसद संजय राउत ने दिल्ली में मीडिया से कहा कि अगले 24 घंटे गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं.

उन्होंने कहा, "288 सीटों का बंटवारा आसान नहीं है. हिंदुस्तान-पाकिस्तान का विभाजित आसान है, लेकिन इन दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा आसान नहीं है. संपत्ति इधर उधर जा सकती है, ज़मीनें जा सकती हैं लेकिन 288 सीटों के लिए बंटवारे को लेकर कुछ अड़चने आती हैं. किसके हिस्से में क्या आएगा, ये बता नहीं सकते और प्रत्येक कार्यकर्ता का दिल रखना भी पड़ता है."

दैनिक लोकमत के कार्यकारी संपादक विनायक पात्रुडकर बताते हैं कि, "मुख्यमंत्री की बातें ध्यान से सुने तो यह पता चलता है कि वे गठबंधन को लेकर न तो नकारात्मक हैं और न ही पूरी तरह से सकारात्मक. लेकिन बयान का सकारात्मकता की तरफ झुकाव ज़्यादा दिखता है."

आखिर क्या कारण है कि अब तक यह गठबंधन नहीं हुआ? गठबंधन की घोषणा करने में इतना वक्त क्यों लग रहा है? यह सवाल लगातार बना हुआ है. इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश बीबीसी मराठी ने की.

सीटों के बंटवारे का साइकोलॉजिकल गेम

क्या सीटों के बंटवारे को लेकर गठबंधन में देरी हो रही है? यह सवाल सभी के जेहन में उठ रहा है. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दीक्षित बताते हैं कि सीटों के बंटवारे पर गठबंधन अटका हुआ दिख रहा है. यहां सीटों के बंटवारे से ज़्यादा साइकोलॉजिकल गेम का मामला दिखता है.

प्रशांत दीक्षित बताते हैं कि बीजेपी को उनकी सीटें इस तरीके से चुननी है कि यदि बहुमत नहीं भी मिला तो सरकार बनाने में कम अड़चन आए.

इसके बारे में विनायक पात्रुडकर कहते हैं कि गठबंधन की ज़रूरत बीजेपी से ज़्यादा शिवसेना को है. वे कहते हैं, "बीजेपी के पास दूसरे दलों से आए विधायकों को मिला लें तो उनकी संख्या 130 से 133 विधायकों की होती है. और 10-12 विधायक इकट्ठा कर लें तो अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आ जाएगी. यही कारण है कि चुनाव को लेकर बीजेपी को आत्मविश्वास ज़्यादा है."

विनायक पात्रुडकर कहते हैं कि "शिवसेना के पास अभी 63 विधायक हैं. मीडिया में चल रही बातों को देख कर अगर बीजेपी की तरफ से उन्हें 120 सीटों का ऑफर भी दिया जाता है तो वर्तमान विधायकों की संख्या के मामले में यह दोगुनी है. यानी शिवसेना को इस पर मानना ही पड़ेगा. तो सीटों की वजह से गठबंधन रुका है, ऐसा लगता नहीं है."

पत्रकार अल्का धुपकर बताती हैं, "शिवसेना के पास हुकुम का कोई इक्का नहीं है. वो ऐसी ज़िद नहीं कर सकते कि हमकों इतनी सीटें दो. यह पॉलिटिकल स्टैंड शिवसेना के पास नहीं है. बीजेपी का वर्चस्व शिवसेना से अधिक है. हम जितनी सीटें देंगे वो ले लो, ऐसी बीजेपी की भूमिका है. वैसे ही बीजेपी को ज़्यादा सीटें चाहिए क्योंकि जितना अधिक उनके विधायक होंगे शिवसेना पर उसकी निर्भरता उतनी ही कम होगी."

अन्य पार्टियों से आए विधायकों की वजह से खींचतान की संभावना

पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस-एनसीपी से शिवसेना और बीजेपी में बड़ी संख्या में नेता शामिल हुए हैं. इनमें हर्षवर्धन पाटिल, गणेश नाइक जैसे दिग्गज शामिल हैं.

इन नेताओं की सीटों के बारे में शिवसेना-बीजेपी में क्या बातें हो रही हैं. इस पर विनायक पात्रुडकर कहते हैं, "बीजेपी में शामिल हुए 10 से 15 विधायक शिवसेना के पारंपरिक सीटों से जीत कर आए थे. चूंकि अब वो बीजेपी में शामिल हो गये हैं तो इन सीटों पर खींचातानी हो सकती है. शिवसेना को कौन-कौन सी सीटें दी जाती हैं यह भी एक मुद्दा है."

प्रशांत दीक्षित कहते हैं, "कांग्रेस-एनसीपी से आने वाले विधायकों की वजह से बीजेपी को अपनी सीटों के चयन का प्रबंधन अच्छे से करना होगा."

वरिष्ठ पत्रकार उदय तानपाठक कहते हैं, "दोनों पक्षों में बड़ी मात्रा में दूसरे दलों से नेता शामिल हुए हैं. ऐसी स्थिति में सीटों की अदला बदली कैसे करें यह भी एक मुद्दा हो सकता है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता."

क्या गठबंधन में देरी का कारण उठापटक को रोकना भी है?

उदय तानपाठक कहते हैं, "गठबंधन की घोषणा के लिए जो वक्त लिया जा रहा है उसके पीछे यह भी हो सकता है कि पार्टी के नेताओं में असंतोष न पैदा हो.

तानपाठक बताते हैं कि यह भी रणनीति हो सकती है कि पर्चा भरे जाने से ठीक दो-तीन दिन पहले गठबंधन की घोषणा हो ताकि असंतुष्ट नेताओं को पार्टी छोड़ने का मौका ही न मिले."

लेकिन, अलका धुपकर कहती हैं, "किसी भी स्थिति में, उम्मीदवारों की आधिकारिक सूची की घोषणा होते ही पार्टी में विद्रोह हो जाएगा. उदाहरण के लिए, नवी मुंबई की विधायक मंदा म्हात्रे नाराज़ हैं क्योंकि उनकी जगह पर अन्य पार्टी से आए विधायक को उतारा जा सकता है. उनकी ही तरह कई अन्य विधायकों में नाराज़गी बताई जा रही है."

विनायक पात्रुडकर कहते हैं, "एक से दूसरे दल में विधायकों का जाना प्रत्येक पार्टी में होता है. पहले यह कांग्रेस-एनसीपी में हुआ करता था अब यह बीजेपी और शिवसेना में हुआ करता है. लेकिन बीजेपी का बढ़ता प्रभाव देखते हुए उनकी पार्टी ऐसी घटनाओं का प्रमाण कम ही मिलता है. लेकिन शिवसेना में ऐसा होने की आशंका पक्की है."

क्या शिवसेना फंस गई है?

ऐसी चर्चा है कि शिवसेना प्रमुख भी बीजेपी में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं और महाराष्ट्र में हर तरफ बीजेपी के बढ़ते प्रभाव के बीच मझधार में फंस गए लगते हैं.

इस पर अलका धुपकर कहती हैं, "शिवसेना की यह अस्तित्व की लड़ाई है. शुरुआत में यह दक्षिण भारतीयों के विरुद्ध अस्मिता की लड़ाई फिर अभी राम मंदिर का मुद्दा, ऐसी शिवसेना की नीति रही है. मुंबई जैसे शहर को अच्छे से संभाल कर दिखाया होता तो आज बीजेपी के सामने घुटने नहीं टेकने पड़ते. शिवसेना ने खुद ही अपनी नब्ज बीजेपी के हाथों में दे दी है."

अलका धुपकर कहती हैं, "अगर बीजेपी को अपने दम पर 145 सीटें मिलती हैं, तो शिवसेना सत्ता में रह कर भी नहीं रहेगी. यह शिवसेना को भी पता है. दूसरी तरफ, गठबंधन रहे या नहीं बीजेपी को फायदा ही दिखता है."

संजय राउत ने हाल ही में कहा है कि अगर हम 2014 में विपक्ष में रहते तो आज स्थिति अलग होती. राउत ने कहा कि यह उनका मानना है पार्टी का नज़रिया नहीं.

राउत कहते हैं, "अगर हम 2014 में सत्ता में नहीं आते, तो हम अगले चार साल तक विपक्ष में रहते. ऐसी स्थिति में आज महाराष्ट्र में शिवसेना सत्ता की प्रबल दावेदार होती या उसका विकल्प होती. लोग देखते हैं कि सत्तारूढ़ सरकार का विकल्प क्या है. सरकार के विरुद्ध लड़ने वाली पार्टी विरोधी पार्टी होती है उसको विकल्प माना जाता है. कई बार ऐसा हुआ भी है."

राउत कहते हैं, आज की तस्वीर कुछ अलग दिखती है. हम मातोश्री (शिवसेना मुख्यालय) में बैठे होते और बाहर लोगों की कतार लगी हुई होती."

इस पर चंद्रकांत पाटील कहते हैं, "अभी इस पर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है. अगर उन्हें विपक्ष में बैठना था तो तभी यह फ़ैसला लेना चाहिए था."

तो कब होगी गठबंधन की घोषणा?

विनायक पात्रुडकर कहते हैं, "बीजपी और शिवसेना दोनों ही पार्टियां पितृ पक्ष में विश्वास करती हैं लिहाजा गठबंधन की घोषणा इस हफ़्ते के अंत में और नवरात्रि शुरू होने के ठीक बाद किया जा सकता है."

लेकिन रिपाई आठवले गुट के नेता और राज्य मंत्री अविनाश महातेकर ने बीबीसी मराठी से कहा, "शिवसेना-बीजेपी गठबंधन की गाड़ी सही मुहूर्त के लिए रुकी हुई है."

'गठबंधन होगा ही, ऐसा मान लिया है'

शिवसेना-बीजेपी महागठबंधन में रिपाई, रासप जैसी पार्टियां भी हैं. इसलिए उनकी सीटों का मुद्दा भी है.

रिपाई के नेता राज्य मंत्री अविनाश महातेकर ने कहा, "शिवसेना-बीजेपी के साथ प्राथमिक स्तर पर हमारी बातचीत हो चुकी है, जिसे अंतिम रूप दिया जाना है. लग रहा है कि जल्द से जल्द गठबंधन हो जाए."

वे कहते हैं कि गठबंधन अभी हुआ नहीं है लेकिन माना जा रहा है कि यह जल्द ही हो जाएगा.

महातेकर कहते हैं कि अगर गठबंधन नहीं हुआ तो हमारी रणनीति तैयार है लेकिन गठबंधन हो यह हमारी कोशिश है और हम इस पर जोर दे रहे हैं.

साथ की पार्टियों के मुद्दे पर विनायक पात्रुडकर कहते हैं, "सहयोगियों के पास 18 सीटें हैं. वो इन सीटों को बनाए रखने की कोशिशें कर रही हैं."

सहयोगी कोशिश कर रहे हैं कि वे शिवसेना-बीजेपी के झगड़े की बलि न चढ़ जाएं.

इस बीच शिवसेना अनिल परब कहते हैं, "नामांकन भरने के लिए 4 अक्टूबर तक की समय सीमा है. अभी बहुत देर नहीं हुई है. लिहाजा गठबंधन की घोषणा सही समय पर होगी."

परब ने बीबीसी को बताया, "शिवसेना की तरफ से उद्धव ठाकरे और बीजेपी के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीत अंतिम बातचीत के बाद गठबंधन की घोषणा होगी."

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