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अपनी पहली और आख़िरी कश्मीर यात्रा में क्या बोले थे महात्मा गांधी
- Author, कुमार प्रशांत
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
आज़ादी दरवाज़े पर खड़ी थी लेकिन दरवाज़ा अभी बंद था. जवाहरलाल और सरदार पटेल रियासतों के एकीकरण की योजना बनाने में जुटे थे.
रियासतें क़िस्म-क़िस्म की चालों और शर्तों के साथ भारत में विलय की बातें कर रही थीं. जितनी रियासतें, उतनी चालें.
दूसरी तरफ़ एक और चाल थी जो साम्राज्यवादी ताक़तें चला रही थीं. इसकी बागडोर इंग्लैंड के हाथ से निकलकर अब अमरीका की तरफ़ जा रही थी.
इन ताक़तों का सारा ध्यान इस पर था कि भागते भूत की लंगोटी का वो कौन सा सिरा अपने हाथ में रहे कि जिससे एशिया की राजनीति में अपनी दख़लंदाज़ी बनाए रखने और आज़ाद होने जा रहे भारत पर नज़र रखने में सहूलियत हो.
पाकिस्तान तो बन ही रहा था, कश्मीर भी इस रणनीति के लिए मुफ़ीद था. 1881 से लगातार साम्राज्यवाद इसके जाल बुन रहा था. अब इसके दस्तावेज़ मिलने लगे हैं. कश्मीर इसलिए महत्वपूर्ण हो गया था.
वहां के नौजवान नेता शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह राजशाही के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे और कांग्रेस के साथ थे. वो जवाहरलाल के निकट थे.
स्थानीय आंदोलन की वजह से महाराजा हरि सिंह ने उन्हें जेल में डाल दिया तो नाराज़ जवाहरलाल उसका प्रतिकार करने कश्मीर पहुंचे थे. राजा ने उन्हें भी उनके ही गेस्टहाउस में नज़रबंद कर दिया था. इस तरह महाराजा के लिए जवाहरलाल भड़काऊ लाल झंडा बन गये थे.
अब, जब विभाजन और आज़ादी दोनों ही आ गई थी तो वहां कौन जाए कि जो मरहम का भी काम करे और विवेक भी जगाए? माउंटबेटन साहब ने प्रस्ताव रखा: क्या हम बापूजी से वहां जाने का अनुरोध कर सकते हैं ?
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जिन्ना पर कश्मीर में बरसे थे अंडे-टमाटर
महात्मा गांधी कश्मीर कभी नहीं जा सके थे. जब-जब योजना बनी, किसी-न-किसी कारण अटक गई. जिन्ना साहब भी एक बार ही कश्मीर गये थे, तब टमाटर और अंडों से उनका स्वागत हुआ था. ग़ुस्सा यूं था कि यह ज़मींदारों व रियासत के पिट्ठू हैं.
प्रस्ताव माउंटबेटन का था, जवाब गांधी से आना था. अब उम्र 77 साल थी. सफ़र मुश्किल था लेकिन देश का सवाल था तो गांधी के लिए मुश्किल कैसी? वो यह भी जानते थे कि आज़ाद भारत का भौगोलिक नक्शा मज़बूत नहीं बना तो रियासतें आगे नासूर बन जाएंगी. वो जाने को तैयार हो गये.
किसी ने कहा: इतनी मुश्किल यात्रा क्या ज़रूरी है? आप महाराजा को पत्र लिख सकते हैं. कहने वाले की आंखों में देखते हुए वे बोले, "हां, फिर तो मुझे नोआखली जाने की भी क्या ज़रूरत थी? वहां भी पत्र भेज सकता था. लेकिन भाई उससे काम नहीं बनता है."
आज़ादी से मात्र 14 दिन पहले, रावलपिंडी के दुर्गम रास्ते से महात्मा गांधी पहली और आख़िरी बार कश्मीर पहुंचे. जाने से पहले 29 जुलाई 1947 की प्रार्थनासभा में उन्होंने ख़ुद ही बताया कि वे कश्मीर जा रहे हैं.
उन्होंने कहा, "मैं यह समझाने नहीं जा रहा हूं कि कश्मीर को भारत में रहना चाहिए. वह फ़ैसला तो मैं या महाराजा नहीं, कश्मीर के लोग करेंगे. कश्मीर में महाराजा भी हैं, रैयत भी है. लेकिन राजा कल मर जाएगा तो भी प्रजा तो रहेगी. वो अपने कश्मीर का फ़ैसला करेगी."
'बस, पीर के दर्शन हो गए!'
1 अगस्त, 1947 को महात्मा गांधी कश्मीर पहुंचे. तब के वर्षों में घाटी में लोगों का वैसा जमावड़ा देखा नहीं गया था जैसा उस रोज़ जमा हुआ था. झेलम नदी के पुल पर तिल धरने की जगह नहीं थी.
गांधी की गाड़ी पुल से हो कर श्रीनगर में प्रवेश कर ही नहीं सकती थी. उन्हें गाड़ी से निकाल कर नाव में बिठाया गया और नदी के रास्ते शहर में लाया गया.
दूर-दूर से आए कश्मीरी लोग यहां-वहां से उनकी झलक देख कर तृप्त हो रहे थे और कह हे थे, "बस, पीर के दर्शन हो गए!"
शेख़ अब्दुल्लाह तब जेल में थे. बापू का एक स्वागत महाराजा ने अपने महल में आयोजित किया था तो नागरिक स्वागत का दूसरा आयोजन बेगम अकबरजहां अब्दुल्लाह ने किया था.
महाराजा हरि सिंह, महारानी तारा देवी तथा राजकुमार कर्ण सिंह ने महल से बाहर आकर उनकी अगवानी की थी.
उनकी बातचीत का कोई ख़ास पता तो नहीं है लेकिन बापू ने बेगम अकबरजहां के स्वागत समारोह में खुलकर बात कही.
उन्होंने कहा, "इस रियासत की असली राजा तो यहां की प्रजा है. वह पाकिस्तान जाने का फ़ैसला करे तो दुनिया की कोई ताक़त उसे रोक नहीं सकती है. लेकिन जनता की राय भी कैसे लेंगे आप? उसकी राय लेने के लिए वातावरण तो बनाना होगा न. वो आराम और आज़ादी से अपनी राय दे सके, ऐसा कश्मीर बनाना होगा. उस पर हमला कर, उसके गांव-घर जला कर आप उसकी राय तो ले नहीं सकते हैं. प्रजा कहे कि भले हम मुसलमान हैं लेकिन रहना चाहते हैं भारत में तो भी कोई ताक़त उसे रोक नहीं सकती है. अगर पाकिस्तानी यहां घुसते हैं तो पाक की हुकूमत को उनको रोकना चाहिए. नहीं रोकती है तो उस पर इल्ज़ाम तो आएगा ही."
कश्मीर पर फ़ैसला कौन लेगा?
बापू ने फिर भारत की स्थिति साफ़ की.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस हमेशा ही राजतंत्र के ख़िलाफ़ रही है. फिर चाहे वो इंग्लैंड का हो या यहां का. शेख़ अब्दुल्लाह लोकशाही की बात करते हैं, उसकी लड़ाई लड़ते हैं. हम उनके साथ हैं. उन्हें जेल से छोड़ना चाहिए और उनसे बात कर आगे का रास्ता निकालना चाहिए. कश्मीर के बारे में फ़ैसला तो यहां के लोग करेंगे.''
फिर गांधीजी यह भी साफ़ करते हैं कि 'यहां के लोग' से उनका मतलब क्या है.
उन्होंने कहा, "यहां के लोगों से मेरा मतलब है यहां के मुसलमान, यहां के हिंदू, कश्मीरी पंडित, डोगरा लोग और यहां के सिख."
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जब गांधी ने कश्मीर के लिए फ़ौजी अभियान का समर्थन किया
कश्मीर के बारे में भारत की यह पहली घोषित आधिकारिक भूमिका थी. गांधीजी सरकार के प्रवक्ता नहीं थे, क्योंकि स्वतंत्र भारत की सरकार अभी तो औपचारिक रूप से बनी नहीं थी. लेकिन वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों के जनक और स्वतंत्र भारत की भूमिका के सबसे बड़े आधिकारिक प्रवक्ता थे, इससे कोई इनकार कर भी कैसे सकता था?
गांधीजी के इस दौरे ने कश्मीर को विश्वास की ऐसी डोर से बांध दिया कि जिसका नतीजा शेख़ अब्दुल्लाह की रिहाई में, भारत के साथ रहने की उनकी घोषणा में, कश्मीरी मुसलमानों में घूम-घूम कर उन्हें पाकिस्तान से अलग करने के अभियान में दिखाई दिया.
जवाहरलाल-सरदार पटेल-शेख़ अब्दुल्लाह की त्रिमूर्ति को गांधीजी का आधार मिला और आगे कि वो कहानी लिखी गई जिसे आज सरकार रगड़-पोंछकर मिटाने में लगी है. जिन्होंने बनाने में कुछ नहीं किया, वो मिटाने के उत्तराधिकार की घोषणा कर रहे हैं!
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जब फ़ौजी ताक़त के बल पर पाकिस्तान ने कश्मीर हड़पना चाहा था और भारत सरकार ने उसका फ़ौजी सामना किया था तब महात्मा गांधी ने उस फ़ौजी अभियान का समर्थन किया था.
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