जसवंत सिंह जिन्हें अटल बिहारी वाजपेयी कहते थे अपना 'हनुमान'

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जसवंत सिंह उन गिने-चुने राजनेताओं में से थे जिन्हें भारत के विदेश, वित्त और रक्षा मंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ था.

विदेश मंत्री के रूप में उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी, 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद दुनिया के सामने भारतीय पक्ष को रखकर उनकी ग़लतफ़हमियाँ दूर करना.

जसवंत सिंह ने इस भूमिका को ठीक तरह से निभाया. जसवंत और अमरीकी उप-विदेश मंत्री स्ट्रोब टालबॉट के बीच दो सालों के बीच सात देशों और तीन महाद्वीपों में 14 बार मुलाक़ात हुई. एक बार तो दोनों क्रिसमस की सुबह मिले ताकि उनकी बातचीत का 'मोमेंटम' बना रहे.

बाद में टालबॉट ने अपनी किताब 'इंगेजिंग इंडिया डिप्लॉमेसी, डेमोक्रेसी एंड द बॉम्ब' में लिखा, "जसवंत दुनिया के उन प्रभावशाली इंसानों में से हैं जिनसे मुझे मिलने का मौक़ा मिला है. उनकी सत्यनिष्ठता चट्टान की तरह है. उन्होंने हमेशा मुझसे बहुत साफ़गोई से बात की है."

"भारत के दृष्टिकोण को उनसे ज़्यादा बारीकी से मेरे सामने किसी ने नहीं रखा. उनके ही प्रयासों की वजह से ही राष्ट्रपति क्लिन्टन की भारत यात्रा संभव हो सकी थी."

हालांकि 2004 में भारत के विदेश मंत्री नटवर सिंह ने उनकी ये कहकर आलोचना की कि उन्हें अमरीका के उप विदेश मंत्री के बजाए अपनी समकक्ष मेडलीन ऑलब्राइट के साथ बातचीत करनी चाहिए थी.

अंग्रेज़ी भाषा में पारंगत

तीन जनवरी, 1938 को बाड़मेर ज़िले के जसोल गाँव में जन्मे जसवंत सिंह भारतीय जनता पार्टी के उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो आरएसएस की पृष्ठभूमि से नहीं आते थे.

उनकी पढ़ाई अजमेर के मशहूर मेयो कॉलेज में हुई थी.

दिलचस्प बात ये है कि पूरी दुनिया में अपने अंग्रेज़ी ज्ञान के लिए मशहूर जसवंत सिंह ने जब इस कॉलेज में दाख़िला लिया तो उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थी.

जसवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा 'अ कॉल टू ऑनर' में लिखा, "अंग्रेज़ी न आना मेरे लिए बहुत शर्म की बात थी. लेकिन इसे सीखने में किसी की मदद लेना मेरी शान के ख़िलाफ़ था. इसलिए मैंने तय किया कि मैं ख़ुद ही न सिर्फ़ इस भाषा को सीखूंगा बल्कि इसमें पारंगत भी बनूंगा."

ईरान की महारानी का छाता पकड़ा

1954 में जसवंत सिंह का चयन एनडीए, देहरादून के लिए हो गया. वहाँ वो अकादमी के कमांडेंट मेजर जनरल हबीबुल्लाह के संपर्क में आए.

उन्होंने उन्हें एक तरह से गोद ले लिया. कुछ दिनों बाद एनडीए को पुणे के पास खड़कवासला शिफ़्ट कर दिया गया.

वहाँ जसवंत सिंह ने पहली बार जवाहरलाल नेहरू को देखा. वहीं, उन्हें सोवियत संघ के महान जनरल मार्शल ज़ुकोव से हाथ मिलाने का मौक़ा मिला.

उन्होंने वहीं पर वहाँ की यात्रा पर आए सोवियत नेताओं निकिता ख्रुश्चेव और बुल्गानिन को भी नज़दीक से देखा. वहीं पर जनरल हबीबुल्लाह ने उन्हें ईरान की महारानी सुरैया का छाता उठाने के लिए चुना.

इस घटना का बहुत ही मज़ेदार वर्णन जसवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा में किया, "महारानी सुरैया की कार मेरी तरफ़ बढ़ रही थी. तभी मैंने बड़े और रंगीन छाते को खोलने की कोशिश की. तभी हवा का इतना तेज़ झोंका आया कि छाता मेरे हाथ से क़रीब क़रीब उड़ ही गया. जनरल हबीबुल्लाह खुले मुंह से मेरी परेशानी को देख रहे थे."

"कार अभी मुझसे 20 मीटर दूर थी कि हवा के एक और तेज़ झोंके ने छाते को क़रीब क़रीब उल्टा ही कर दिया. जनरल हबीबुल्लाह के चेहरे पर ग़ुस्से, चिड़चिड़ाहट और मनोरंजन के भाव थे. किसी तरह छाता मेरे नियंत्रण में आया. बाद में जनरल ने मुझसे कहा, 'यू ब्लडी फ़ूल. तुम्हारे रेगिस्तान में क्या तुम्हें छाता खोलना भी नहीं सिखाया' गया?"

आरएसएस द्वारा मंत्री बनाने का विरोध

1966 में जसवंत सिंह ने 9 साल की नौकरी के बाद सेना के अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. कुछ समय के लिए वो जोधपुर के महाराजा गज सिंह के निजी सचिव रहे. 1980 में वो बीजेपी के टिकट पर पहली बार राज्य सभा के लिए चुने गए.

1996 में वो वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में वित्त मंत्री बनाए गए. जब वाजपेयी दोबारा सत्ता में आए तो वो जसवंत सिंह को फिर वित्त मंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन आरएसएस ने उनके मंत्री बनाए जाने का विरोध किया. वाजपेयी को इससे बहुत दुख पहुंचा लेकिन उन्होंने उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बना दिया.

उस समय जसवंत सिंह से पूछा गया था कि क्या आरएसएस द्वारा उन्हें मंत्री बनाए जाने का विरोध करने से आप निराश हुए हैं, तो जसवंत सिंह का जवाब था, "दुनिया उन लोगों की क़ब्रों से भरी पड़ी है जो ये समझते थे कि उनके बिना दुनिया का काम नहीं चल सकता है. मेरा मानना है कि मेरे बिना इस देश का काम चल सकता है."

कुछ दिनों बाद वाजपेयी ने उन्हें विदेश मंत्री बना दिया और वो 2002 तक भारत के विदेश मंत्री रहे. इसके बाद उन्हें दोबारा वित्त मंत्री बनाया गया. आडवाणी की रथ यात्रा और अयोध्या आंदोलन में उनकी कभी दिलचस्पी नहीं रही. भारतीय जनता पार्टी के एक वर्ग ने अपने आप को कभी भी जसवंत सिंह के साथ सहज नहीं महसूस किया.

लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और भैरों सिंह शेखावत जैसे कुछ ख़ैर- ख़्वाहों की वजह से वो न सिर्फ़ पार्टी में बने रहे बल्कि फले फूले भी. कहा जाता है कि वाजपेयी उनकी अंग्रेज़ी भाषा, ख़ासकर क्वींस इंग्लिश पर उनकी महारत के कारण उनके मुरीद थे. भैरों सिंह शेख़ावत के साथ उनका ठाकुर और मिट्टी का 'कनेक्शन' था.

वाजपेयी से नज़दीकी

जो लोग जसवंत सिंह को नज़दीक से जानते हैं, उनका मानना है कि वो बहुत ही सुसंस्कृत, ज्ञानी और लचीले शख़्स थे.

बात करने की जो कला उनके पास थी, कम लोगों के पास थी. वो बहुत सोच-समझकर ही कुछ कहते थे.

उनसे कई बार मिल चुके वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला कहते हैं, "उन जैसे शालीन और भद्र व्यक्ति भारतीय राजनीति में कम हुए हैं. अपने पूरे करियर में उन्होंने कभी भी सैनिक अनुशासन का त्याग नहीं किया. हालांकि उन्होंने सैनिक अफ़सर की अपनी वर्दी 53 साल पहले छोड़ दी थी."

"वाजपेयी के साथ उनकी नज़दीकी का कारण था कि वो उनके विश्वासपात्र थे, उनकी विश्व-दृष्टि से पूरी तरह सहमत थे और सबसे बड़ी बात वाजपेयी को उनसे किसी तरह का कोई राजनीतिक ख़तरा नहीं था."

जन-राजनीति से कोई सरोकार नहीं

जसवंत सिंह के राजनीतिक जीवन की एक ख़ामी ये थी कि वो अपने आप को जन राजनीति के साँचे में कभी नहीं ढाल पाए.

उन्होंने अपने क्षेत्र को 'नर्स' करने की कला कभी नहीं सीखी. 1989 में उन्होंने जोधपुर और 1991 और 1996 में चित्तौड़गढ़ और फिर 2009 में दार्जिलिंग में जीत ज़रूर दर्ज की लेकिन उनके मतदाताओं को हमेशा शिकायत रही कि जीतने के बाद उन्होंने उनकी सुध नहीं ली.

और वो लेते भी कैसे. वो तो अपने नेता अटल बिहारी वाजपेयी के 'ट्रबल शूटर' के रूप में कभी जयललिता को मनाने निकल रहे थे तो कभी जनरल मुशर्रफ़ के चेक मेट करने की रणनीति बना रहे थे.

यही कारण है कि अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें मज़ाक में अपना 'हनुमान' कहते थे.

कंधार विमान अपहरण प्रकरण में आलोचना

जसवंत सिंह की सबसे बड़ी आलोचना तब हुई जब 1999 में कंधार विमान अपहरण के बाद तीन आतंकवादियों को अपने विमान में कंधार ले गए. हालांकि बाद में उन्होंने अपनी सफ़ाई में कहा कि ऐसा उन्होंने अपने अधिकारियों की सलाह पर किया था.

उन्होंने अपनी आत्मकथा 'अ कॉल ट्रू ऑनर' में लिखा, "कंधार में मौजूद हमारे तीनों अधिकारियों अजीत डोवाल, सीडी सहाय और विवेक काटजू ने मुझसे कहा कि किसी ऐसे शख़्स को कंधार भेजिए जो वहाँ ज़रूरत पड़ने पर बड़ा निर्णय लेने में सक्षम हो."

"हालांकि पहले आतंकवादी 40 लोगों की रिहाई की माँग कर रहे थे, हम 3 लोगों को रिहा करने पर राज़ी हुए. अगर इस तरह के हालात आख़िरी मिनट में दोबारा पैदा होते हैं, तो उस शख़्स को दिल्ली से पूछने के बजाए उसी जगह पर फ़ैसला लेना होगा. इस वजह से मैंने कंधार जाने का फ़ैसला लिया."

जसवंत सिंह के ज़माने में विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे विवेक काटजू बताते हैं, "इस संबंध में जसवंत सिंह की जो आलोचना हुई, वो उनके साथ नाइंसाफ़ी है. जसवंत सिंह ने जो क़दम उठाया था वो उनका अपना फ़ैसला नहीं था. उसकी मंत्रिमंडल ने बाकायदा मंज़ूरी दी थी."

"इसका एक मक़सद था. वो ये था कि वहाँ फंसे हुए भारतीय हर हालत में सुरक्षित वापस लौटें. आलोचना करने वाले लोगों ने उस मक़सद को नज़रअंदाज़ कर दिया."

जसवंत ने दी थी आगरा शिखर सम्मेलन की सलाह

जसवंत सिंह की सलाह पर अटल बिहारी वाजपेयी ने 14 से 16 जुलाई, 2001 के बीच जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को शिखर वार्ता के लिए आगरा बुलाने का फ़ैसला किया.

लेकिन संयुक्त वक्तव्य के दस्तावेज़ के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई और मुशर्रफ़ को ख़ाली हाथ पाकिस्तान वापस जाना पड़ा.

विवेक काटजू कहते हैं कि "मुशर्ऱफ़ आगरा समिट के 'पोटेनशियल' को नहीं समझ पाए. जसवंत सिंह ने वहाँ अपनी दूर की सोच का इज़हार किया, लेकिन मुशर्रफ़ कमांडो के कमांडो ही रहे."

"मुशर्रफ़ की यात्रा के बाद जब पाकिस्तानी संवाददाताओं ने जसवंत सिंह से सवाल पूछा कि आपने मुशर्रफ़ को अजमेर में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर क्यों नहीं जाने दिया तो जसवंत सिंह ने जवाब दिया, "ग़रीब नवाज़ की दरगाह पर वही जाते हैं, जिन्हें वो वहाँ बुलाते हैं."

प्रखर सांसद

जसवंत सिंह की छवि हमेशा एक जागरूक और प्रखर सांसद की रही. अपनी काँपती हुए बैरी-टोन आवाज़ में जब वो बोलने खड़े होते थे तो सारा सदन उन्हें ध्यान से सुनता था.

जब वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अपने बजट में बुज़ुर्गों को कुछ कर छूट दी तो जसवंत सिंह ने टिप्पणी की, "आपके द्वारा दी गई छूट से व्हिस्की की एक बोतल तक नहीं ख़रीदी जा सकती."

भारतीय जनता पार्टी से निष्कासन

शायद जसवंत सिंह के राजनीतिक करियर का सबसे तकलीफ़देह दिन तब था जब उनकी पुस्तक 'जिन्ना-इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस' प्रकाशित होने के सिर्फ़ दो दिन बाद भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था.

उस समय शिमला में पार्टी की चिंतन बैठक चल रही थी और जसवंत सिंह बैठक-स्थल से कुछ ही दूर एक होटल में ठहरे हुए थे. उनके पास फ़ोन आया कि वो सभा-स्थल पर पहुंचने की ज़हमत न करें.

थोड़ी देर में उनके पास पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का भी फ़ोन आ गया कि उन्हें पार्टी से निष्कासित किया जाता है.

बाद में नम आँखों से जसवंत सिंह ने कहा कि उन्हें दुख इस बात का है कि पार्टी नेतृत्व ने उनसे आमने-सामने भी बात करना गवारा नहीं किया. पार्टी का संस्थापक सदस्य होने के नाते मैं उनसे इतनी शिष्टता की उम्मीद तो रखता ही था.

कई सालों से कोमा में

घुड़सवारी, संगीत, किताबों, गोल्फ़ और शतरंज के शौकीन जसवंत सिंह हमेशा अपने को 'लिबरल डेमोक्रेट' कहते रहे.

2014 चुनाव से एक दिन पहले वो अपने बाथरूम में गिर पड़े जिससे उनके सिर में गहरी चोट लगी. वो पिछले छह सालों से लगातार कोमा में रहे और अब वो दुनिया को अलविदा कह गए.

इन छह सालों के बीच उनके कई क़रीबी साथी जैसे जार्ज फ़र्नांडिस और अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें छोड़ कर इस दुनिया से चले गए लेकिन उन्हें कभी इसके बारे में नहीं बताया गया.

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