मानवेंद्र सिंह को लगा 'कमल का फूल एक भूल थी'

    • Author, नारायण बारेठ
    • पदनाम, बीबीसी हंदी के लिए, जयपुर से

थार मरूस्थल में रेत के बवंडर तो उठते रहे हैं. मगर इस बार रेगिस्तान में यह बड़ा सियासी घटनाक्रम है.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सीनियर मंत्री रहे जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है. इसे बीजेपी के पारम्परिक राजपूत मतदाताओं की नाराज़गी के रूप में देखा जा रहा है.

बीजेपी ने इस नुक़सान को यह कह कर कम करने की कोशिश की है कि पूर्व मंत्री सिंह की पूरी राजनीति कांग्रेस विरोध की रही है. ऐसे में उनकी विरासत कांग्रेस के कुनबे तक नहीं जा सकती.

सीमावर्ती बाड़मेर ज़िले में शिव विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी विधायक मानवेन्द्र सिंह ने यह क़दम कोई यकायक नहीं उठाया है. इसके पहले राज्य में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और उनके परिवार बीच लंबी लड़ाई चली.

जानकार कहते हैं कि जिस दिन बीजेपी ने जसंवंत सिंह को पिछले लोकसभा चुनाव में टिकट देने से इनकार कर दिया था, इस कहानी की इबारत उसी वक़्त लिख दी गई थी.

राजपूत समाज के समाजिक कार्यकर्ता विक्रम सिंह तापरवाड़ा कहते हैं. "बीजेपी ने पूर्व मंत्री जसवंत सिंह का न केवल टिकट काटा बल्कि उनके स्थान पर कांग्रेस में लबे समय तक सांसद रहे कर्नल सोना राम को प्रत्याशी बना दिया."

इससे राजपूत समाज ने ख़ुद आहत और अपमानित महसूस किया. बीजेपी ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि राजपूत समाज शुरू से उनके साथ रहा है.

वो कहते हैं, "इससे बीजेपी को सीमावर्ती जिलों और मारवाड़ के पाली ,सिरोही ,जोधपुर और जालौर जिलों में नुक़सान होगा."

भाजपाई जसवंत सिंह

राज्य की बीजेपी सरकार में मंत्री अमराराम ख़ुद बाड़मेर ज़िले से ही हैं. अमराराम कहते हैं, "उनके पुत्र को अपना पुराना घर नहीं छोड़ना चाहिए था. मुझे लगता है उनके साथ कांग्रेस में बड़ा धोखा होगा."

लेकिन क्या इसका बीजेपी को ख़ामियाजा भुगतना होगा? इस पर वो कहते हैं, "यह तो वक़्त ही बताएगा."

बीजेपी नेता राजेंद्र सिंह भियाड़ कहते हैं, "मैं इतना ही कह सकता हूँ जसवंत सिंह जी की पूरी सियासत एंटी कांग्रेस रही है. उनकी विरासत कांग्रेस तक नहीं जा सकती.''

बाड़मेर में पत्रकार शंकर गोली कहते हैं, "सरहदी क्षेत्र में बीजेपी के लिए मुश्किल होगी."

हालाँकि बीजेपी ने इस घटनाक्रम को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी है. पार्टी यह जताने की कोशिश कर रही है कि यह कोई बड़ी घटना नहीं है.

सीमावर्ती क्षेत्र के कुछ ज़िलों में सिंधी मुसलमान भी बड़ी संख्या में आबाद है. कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे अमीन ख़ान कहते हैं, "हमारे इलाक़े में राजपूतों और मुसलमानों में अच्छे रिश्ते रहे हैं. इससे कांग्रेस को लाभ होगा."

वो कहते हैं, "मरुस्थल के इस भूभाग में अक्सर पूर्व जागीरदार और राजपूत ही बीजेपी की ताक़त थी. अब बीजेपी की शक्ति कम होगी.

लेकिन बाड़मेर के साहित्यकार आईदान सिंह भाटी को लगता है, "इसका मिलाजुला असर होगा."

पूर्व मंत्री सिंह के एक समर्थक कहते हैं, "जब विमान अपहरण के बाद किसी मंत्री को कंधार भेजने का मौक़ा आया तो जसवंत सिंह को भेजा गया. सिंह ने पार्टी के लिए तोहमत अपने नाम लिखवाई. मगर बीजेपी ने टिकट देते वक़्त उन्हें कंधे से उतार दिया."

राजस्थान में राजपूत बिरादरी के 26 विधायक हैं. सामाजिक कार्यकर्ता तापरवाड़ा कहते हैं, "बीजेपी ने पूर्व राजपरिवारों की भी उपेक्षा की. इसके पहले अजमेर चुनाव में भी राजपूत समाज ने बीजेपी को वोट न देने का ऐलान किया था.

कुछ समीकरण गड़बड़ाएंगे?

विश्लेषक कहते हैं, "कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राजस्थान में प्रभावशाली किसान वर्ग कांग्रेस के साथ रहा है. यह वर्ग इस घटनाक्रम को बहुत सावचेती से देख रहा है. हालाँकि कांग्रेस को भी इसका अहसास है और पार्टी नेतृत्व ने दोनों वर्गो में शक्ति संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है. लेकिन यह कितना कारगर होगा, अभी कहना कठिन होगा."

राज्य की राजनीति में एक वक्त वो भी था जब वर्ष 2003 में विधानसभा चुनावों में बीजेपी की प्रबल जीत के बाद पूर्व मंत्री जसंवत सिंह पार्टी के केंद्रीय प्रतिनिधि होकर आये और विधायकों से राय शुमारी के बाद मुख्यमंत्री के रूप में वसुंधरा राजे का नाम घोषित किया.

इसके तुरंत बाद राजे ने दंडवत कर सिंह से आशीर्वाद लिया. पर इसके बाद दोनों के रिश्तों में टूटन बढ़ती गई.

वर्ष 2007 में जसवंत सिंह की पत्नी शीतल कंवर ने जोधपुर में उस प्रकाशक और पुजारी पर बहुत नाराज हुई जिसने राजे को देवी अन्नपूर्णा बताकर कैलेंडर प्रकाशित किया.

शीतल कंवर ने उस प्रकाश के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. फिर 2012 में सुलह-सफाई भी हुई. मगर यह सुलह महज वक्ती ही साबित हुई.

पूर्व मंत्री जसंवत सिंह और उनके पुत्र मानवेन्द्र सिंह का फौज़ से वास्ता रहा है. उन्हें रक्षा मामलों की तो समझ थी

लेकिन प्रेक्षक कहते हैं, "सियासत में कुछ और ही दांव और सूत्र काम आते है."

पूर्व मंत्री सिंह एक दुर्घटना के बाद पिछले चार साल से बिस्तर पर हैं. उनकी गैर हाजरी में मानवेंद्र सिंह ने कुछ वक्त ख़ामोशी ओढ़े रखी. पर हाल में उन्होंने स्वाभिमान रैली आयोजित कर बीजेपी के प्रति आक्रोश का इज़हार किया.

बीजेपी में लम्बी डगर तय करने के बाद उन्हें लगा 'कमल का फूल एक भूल थी'. जसवंत सिंह की पुत्रवधु और मानवेन्द्र सिंह की पत्नी चित्रा सिंह मुख्यमंत्री राजे के ख़िलाफ़ काफी मुखर रही हैं. अब चित्रा सिंह के भी चुनाव लड़ने की चर्चा है.

विश्लेषक कहते है, "बीजेपी पहले ही सत्ता विरोधी रुझान से जूझ रही है. राज्य में जयपुर और बीकानेर के पूर्व राजपरिवार बीजेपी के साथ हैं. इनमें जयपुर के पूर्व राजपरिवार की एक होटल की मिल्कीयत को लेकर सरकार से विवाद के बाद राजपूत सड़कों पर आ गए थे."

"उदयपुर का पूर्व राजघराना सियासत से दूर है जबकि अलवर और कोटा के पूर्व राजपरिवार कांग्रेस के साथ हैं. से में बीजेपी के लिए अपने इस समर्थक वर्ग को साधे रखना मुश्किल होगा."

बीजेपी से सांसद रहे मानवेन्द्र सिंह के लिए यकायक पार्टी, परचम और प्रतीक बदल गए हैं. वो बीजेपी थी. अब, ये कांग्रेस है. लेकिन कुछ खूबियां और खामियां तो दोनों में एक जैसी हैं.

उनके एक समर्थक ने पार्टी छोड़ते वक्त जज्बाती लहजे में कहा था "कुछ तो मजबूरियां रही होगी ,यूँ कोई बेवफा नहीं होता."

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